गुनाहों का देवता

कंचन बाला रामटेके1 एवं आभा तिवारी2

1शोध छात्रा, हिन्दी, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)

2प्राध्यापक, हिन्दी, शा.दू...स्ना. महाविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)

 

 

1. प्रस्तावनारू

उपन्यास में घटनाएँ होती हैं, जो कि उपन्यास के शरीर का निर्माण करती हैं। यही घटनाएँ उपन्यास के जिस अंश में सम्पादित की जाती हैं, उन्हें कथावस्तु कहते हैं। यह कथावस्तु और घटनाएँ मनुष्यों पर आश्रित होती है, यही मनुष्य पात्र कहलाते हैं।

कथावस्तु उपन्यास का प्राण हैं। उपन्यास का कथानक, इतिहास, पुराण, जीवनी, अनुश्रुति विज्ञान, राजनीति आदि से कहीं से भी ग्रहण किया जा सकता है।1

कथानक में मार्मिकता के साथ-ही-साथ जीवन का एक स्वच्छ दृष्टिकोण भी निहित है। जिस धरातल पर आज समाज खड़ा हुआ है, वहाँ उसने पुरानी मान्यताएँ तो समाप्त कर दी है परन्तु जीवन के नये आदर्शों को ढालने में यह असफल रहा है। उपन्यास का मुख्य उद्देश्य ऐसे ही समाज में एक स्वस्थ प्रेम की भावना को विकसित होते हुए दिखाना है।

धर्मवीर भारती जी के गुनाहों का देवता का कथानक इतना सजल, इतना स्निग्ध और इतना मार्मिक है। इसमें गुलाब की सुकुमार पंखुरियों की भांति ही जीवन का विकास और विनाश होता है। और हम सोच ही नहीं पाते कि इसे कैसे रोका जाएं। बिनती और चन्दर के विवाह की शहनाइयां हम नहीं सुनते। सुनते हैं केवल सुधा की मचलती हुई आह, जो कि गंगा की शान्त एवं पावन धारा में विलीन हो जाती है। भारती जी का कथानक साफ-सुथरा, सुष्ठु और सन्तुलित है। यहाँ सबसे बड़ी सफलता भारती जी को इस बात में मिली है कि उन्होंने घटनाओं और अन्तद्र्वन्द का सामंजस्य बड़े सुन्दर ढंग से किया है।2

उपन्यास का नायक चन्दर अपने संरक्षक डाॅ. शुक्ला की लड़की सुधा से प्रेम करता है - ऐसा प्रेम जिसको कि देखकर देवता भी शरमा जाएं। किन्तु वह अपनी भावनाओं में ऐसा उलझ जाता है कि बौद्धिक एवं ठोस धरातल पर ही नहीं पाता। और यही भावात्मक उलझन उसके विकास में घुन की तरह लग जाती है। दूज के चाँद सी मासूम सुधा की क्वांरी सांसों का देवता चन्दर उससे विलग हो जाने पर अपनी एकांकी आत्मा के साथ भयानक चक्रवात में जा गिरता है, जिसके हर झोंके में गुनाह था और हर आघात में एक भयानक मानसिक दर्द। लेकिन उस तूफान में पड़कर भी चन्दर डूबा नहीं, उसके पंख टूटे नहीं। वह हवाओं को चीरकर बाहर निकल आया, लेकिन तूफान के गुजर जाने के बाद उसने देखा कि आत्मा के गुलाब की पंखुरी बिखर चुकी है।3

पात्र उपन्यास के कथा-रूपी शरीर को गति प्रदान करने वाले अवयव हैं। उपन्यास के पात्रों के क्रिया-कलाप द्वारा ही कथावस्तु का निर्माण होता है, अतः पात्र जितने अधिक सक्रिय और सजीव होंगे, उपन्यास उतना ही प्रभावशाली और रोचक सिद्ध होगा।

 

 

 

2. पात्र एवं चरित्र-चित्रण -

पात्र समाज के गुण-दोषादि से संचालित होता है। उपन्यास का पात्र भी मानवता के नाते इसी उधेड़बुन में पड़ा हुए एक सांसारिक जीव है। इसका हृदय एक छोटा संसार है, जिसमें गुण-दोषादि द्वन्द्वों को हृदय तथा मस्तिष्क रूपी दो चक्की के पाटों में पीसकर चटनी तैयार की जाती है। ..... पात्रों के चरित्र में उत्थान पतन और परिवर्तन करने वाली और परिवर्तन करने वाली अन्तस की इस अटूट श्रृंखला का नाम ही अन्र्तद्वन्द्व है। इस प्रकार चरित्रों के माध्यम से लेखक मानव-जीवन के अनेक रूपों का चित्रण करता है, उनके निर्माण में भी उसे एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है तभी कहीं जाकर चरित्र निर्मित होते है। अपनी अनुभूति एवं जानकारी के आधार पर रचनाकार कृति के अंत तक चरित्रों की एक जीवनी प्रस्तुत करता है, जिसमें वह चरित्र के सारे कारनामों और व्यापारों का लेखा-जोखा रखता है।4

 

भारती जी के गुनाहों के देवता में चरित्र-चित्रण उच्च कोटि का है। उसके पात्र सजीव हैं और सहसा ही मानवीय अस्थिमज्जा में पाठक के सम्मुख खड़े होते हैं। चन्दर, सुधा, पम्मी और डाॅ. शुक्ला के चरित्र का विकास और उतार-चढ़ाव बहुत ही स्वाभाविक है। किन्तु इन सब में सजीव और सुपुष्ट चरित्र गेसू और बिनती शायर होते भी कल्पना लोक की थी। और यही अन्तर बिनती और सुधा में है - बिनती कितनी व्यावहारिक, कितनी सूक्ष्म, कितनी ऊँची, कितनी सुकुमार और पवित्र। नारी पात्रों में पम्मी सबसे अलग है। एक ऐग्लों-इण्डियन की भांति यह व्यवहार से विलग हो जाने पर वह चन्दर को अपनी वासना के जाल में फंसा लेती है, जिससे कि वह अन्त तक नहीं उबर पाता। चरित्र उसका भी मोहक है, इसमें कोई सन्देह नहीं। चन्दर उपन्यास का नायक है, इसलिए स्वभावतः ही उसका चरित्र अधिक उभर कर आया है। हम चाहें तो उसे एक अव्यावहारिक आर्दशवादी कह सकते हैं और इसीलिए उसमें स्थिरता की मात्रा कम है। अपने अपूर्व त्याग एवं प्रेम की गहराई के कारण गेसू का चरित्र सबसे अधिक मर्मस्पर्शी है। इन साधारण चरित्रों के बीच में एक साधारण चरित्र बढी का है। इस प्रकार भारती जी ने अपने उपन्यास में पात्रों के व्यक्तित्व और चरित्र को अपने आप उभारने देना और उसके सामने खुद अपने को बिल्कुल पारदर्शी बना लेना, कहीं भी अपने पात्रों के नैसर्गिक व्यक्तित्व के विकास में अपनी निजी धारणाओं, पूर्वग्रहों, इच्छाओं, कल्पनाओं, कुण्ठाओं, सिद्धान्तों या मतवादों को कतई आड़े आने देना - यह शायद कथा सृजन की प्रक्रिया में सबसे जटिल, सबसे दुस्साध्य काम होता है। लेकिन लेखक समूह ने पात्रों को सप्राण बनाया है।

 

3. संवाद -

उपन्यास की सारी कथा किसी इति वृत्त की भांति ही वर्णात्मक नहीं होती। पात्र यथावसर अपने वार्तालाप, स्वकथन अथवा कथोपकथन द्वारा उसे गति देते हैं। पात्रों को इस आलाप-संलाप को ही संवाद का नाम दिया गया है।

 

कथोपकथन द्वारा कथावस्तु में नाटकीयता और सजीवता जाती है। कथोपकथन द्वारा पात्रों की आंतरिक मनोवृत्तियों का प्रदर्शन होता है। कथोपकथन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उपन्यासकार पाठक और पात्र के बीच से निकलकर पात्रों और पाठकों पर स्वयं खुलने का अवसर दे देता है, जिससे उपन्यास में अधिक स्वाभाविकता जाती है। कथोपकथन से वातावरण के निर्माण में भी योग मिलता है। यह विशेषतया आँचलिक उपन्यासों से स्पष्ट हो जाती है। कथोपकथन का उपयोग सोद्देश्य, विवेकपूर्ण और उपयुक्त अवसर पर ही होना चाहिए।

 

इस प्रकार कहा जा सकता है कि कथोपकथन द्वारा घटनाओं को गतिशीलता प्रदान की जाती है और बहुत सी नवीन घटनाओं का प्रादुर्भाव होता है। दो परस्पर विरोधी विचारों के संघर्ष से कोई भी घटना घटित हो सकती है। यह संघर्ष वार्तालाप द्वारा ही मुखरित होता है।

 

लेखक की स्वयं की टिप्पणी संकेत तथा पात्रों के कथन भी इस दृष्टि से उल्लेख्य हैं। संबंध विच्छेद तथा पात्रों के कथन भी इस दृष्टि से उल्लेख्य है। संबंध विच्छेद अथवा पारिवारिक जीवन में जो एक प्रकार की खण्डनात्मक स्थिति पनप रही है उसके लिए काफी अर्थों में समाज को दोषी ठहराया गया है - पर्याप्त समय में प्रचलित मान्यताएँ जीर्ण-शीर्ण (समय-स्थिति विपरीत) होने पर उनका अंधानुकरण कहाँ तक न्यायसंगत है, विचारणीय समस्या है। डाॅ. शुक्ला का भी इसी प्रकार का अभिमत है - सुधा का विवाह कितनी अच्छी जगह किया गया, मगर सुधा पीली पड़ गई है। कितना दुख हुआ देखकर और बिनती के साथ यह हुआ।5

 

भारती जी ने गुनाहों के देवता में प्रसंगों की चित्रमयता का बहुत ही अच्छे ढंग से चित्रण किया है। और चन्दर का हाथ तेश में उठा और एक भरपूर तमाचा सुधा के गाल पर पड़ा। सुधा के गाल पर नीली उंगलिया उभर आयी। वह स्तब्ध; पत्थर बन गयी हो। आँख में आंसू जम गयी और सीने में सिसकियां जम गयीं। सुधा के शादी के बाद जब वह पहली बार मायके आती है तब वह चन्दर से सुधा मर्माहित सी होकर बोली - चन्दर मैं किसी की पत्नी हूँ। यह जन्म उनका है। यह मांग का सिन्दूर उनका है। मुझे गला घोट कर मार डालो। मैंने तुम्हें बहुत तकलीफ दी है। लेकिन लेकिन चन्दर हंसा और सुधा को छोड़ दिया।

 

4. वातावरण -

देशकाल या वातावरण का सम्बन्ध घटनाओं या पात्रों से होता है। कथानक को स्वाभाविक एवं प्रभावशाली बनाने के लिए इसका उपयोग लेखक करता है।

 

देशकाल तथा वातावरण के अन्तर्गत आचार-विचार, वातावरण, रीति-रिवाज, रहन-सहन और राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों का वर्णन किया जाता है। सामाजिक उपन्यासों में विभिन्न समस्याओं का चित्रण अवश्य रहता है। इन सब समस्याओं का चित्रण करते हुए भी उपन्यासकार को पात्रों की और घटनाओं के घटित होने की परिस्थिति, काल और वातावरण का चित्रण करना पड़ता है।

वातावरण का सम्बन्ध वस्तु-वर्णन या प्रकृति-चित्रण से तो है ही, मानव की अन्तः प्रकृति अर्थात् उसके मानसिक वातावरण के प्रति भी लेखक को जागरुकता अपेक्षित है। जिस प्रकार वह किसी स्थान के वन, पर्वत, नदी, गाँव, नगर, बाजार, सागर तट आदि का वर्णन करता है, उसी प्रकार उस वातावरण में उपस्थित पात्र की अन्तः स्थिति का विश्लेषण करना भी आवश्यक है। उपन्यास वर्ग संघर्ष तथा आर्थिक विषमता के उद्देश्य को लेकर चलता हुआ भी लोकथात्मक शैली में कथित होने के कारण वातावरण का चित्रण हुआ है, किन्तु कम ही मात्रा में भारती जी का पूरा ध्यान विषय और शैली पर ही केन्द्रित है। फिर भी भारती जी ने मूल कथ्य के अनुकूल ही रुमानी वातावरण की निर्मिति की गई है। उपन्यास के वातावरण के अन्य भाव-भूमि तैयार करने में सहायक बनते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप पाठक कथा के साथ समरस हो जाता है। वातावरण का चत्रिण यद्यपि बहुलता से नहीं हुआ है, किन्तु जितना हुआ है वह निरर्थक और अकारण नहीं, अपितु कथ्य को यथार्थता प्रदान करता है।

 

गुनाहों का देवता उपन्यास में वर्णन एवं वातावरण की सृष्टि भी अत्यन्त प्रभावोत्पादक है। और इसका कारण है भाषा की अपूर्व-व्यंजना शक्ति जब लेखक किसी बात का वर्णन करता है ,तो वह सीधे हमारे हृदय का स्पर्श करता है। सुधा के विवाह के कुछ वर्णन तो अत्यन्त मार्मिक हैं ....... लेकिन यह जिन्दगी भी जहाँ प्यार हार जाता है मुस्काने हार जाती हैं, आँसू हार जाते हैं ..... तश्तरी, प्याले, कुल्हड़, पत्तलें, कालीनें, दरियाँ और बाजे जीत जाते हैं ..... और जहाँ दो आँसुओं में डूबते हुए व्यक्तियों की पुकार शहनाइयों की आवाज में डूब जाती है। और इससे भी करुण दृश्य आते हैं सुधा को विदा होते समय उस स्थल पर पहुँचकर तो कौन ऐसा सहृदय होगा जिसका कि हृदय भर आता हो। नारी जीवन का वह परम सत्य, जिसे महादेवी जी ने कहा है - हो गयी कलिका विरानी आँखों के सामने साकार हो जाता है। वर्णनों के अतिरिक्त लेखक ने वातावरण की सृष्टि भी बहुत मनोहर की है। पम्मी के घर का वह दृश्य जहाँ कि चन्दर सुधा और बिनती के सामने लेडी नार्टन का गीत मैं तुम्हें प्यार नहीं करती हूँ ! गाती है, जो कि अत्यन्त करुणाजनक एवं मार्मिक है। भारती जी के सफलता का श्रेय प्रांजल एवं प्रसाद पूर्ण भाषा का है। सुलझे हुए विचार लचीली एवं सजीव भाषा के माध्यम से व्यक्त होकर पाठक के हृदय और मस्तिष्क को एक साथ प्रभावित कर देते हैं।

 

भारती की अद्भुत भाषिक व्यंजना सामथ्र्य में भी गुनाहों का देवता के कथ्य एवं वातावरण को प्रभावोत्पादक बनाया है।

 

5. उद्देश्य -

साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा जीवन और जगत की विविध स्तरीय अनुभूतियों को चित्रित करने का माध्यम उपन्यास ही है। हर उपन्यास की सर्जना के पीछे उसके रचनाकार विशिष्ट उद्देश्य अथवा दृष्टिकोण अवश्य निहित रहता है, चाहे वह उद्देश्य मनोरंजन करने का हो या अस्तित्व का बोध कराने का हो। उपन्यासकार का उद्देश्य कल्पनानुसारी, भावनापरक, प्रयोगाधिष्ठित अथवा बौद्धिक आदि किसी भी प्रकार का हो सकता है। उस पर कोई भी पाबन्दी नहीं हो सकती। किन्तु चाहे जिस प्रकार का क्यों हों, उपन्यास में उद्देश्य तत्व अवश्य उपस्थित रहता है।6

उपन्यास का अन्तिम तथा महत्वपूर्ण उपकरण है - विचार और उद्देश्य यह तथ्य आज सुविदित है कि विचार और उद्देश्य की पूर्व-योजना से उपन्यास की कला एवं स्वाभाविक भावधारा जड़ित बन्धनबद्ध एवं निजत्वहीन अन्तः निर्जीव हो जाती है। इस प्रकार भारती जी के उपन्यास का प्रमुख उद्देश्य यह रहा है - अर्थ और काम की धुरी के इर्द-गिर्द घूमने वाले निम्न-मध्यमर्गीय जीवन का विडम्बनात्मक चित्रण। अतः सभी पात्र, कहानियाँ और शिल्पगत विशेषताएँ उद्देश्य के सहायक रूप में ही चित्रित हुई है। गुनाहों का देवता उपन्यास में भारती जी ने बहुत कुछ कहने का प्रयास किया है। निम्न मध्य वर्ग के युवक-युवतियों की कुंठा निम्न मध्य वित्त के लोगों का खोखला वैवाहिक जीवन झूठा धर्माचार, नैतिकता और आधे इंच जमी बर्फ़ की सफ़ेदी के नीचे गंदे पानी की अथाह गहराइयाँ - इन्हीं के साथ भारती जी ने समाज को नया सन्देश दिया है।

 

गुनाहों का देवता का मुख्य उद्देश्य भारती जी के द्वारा मध्यमवर्गीय जनमानस के दर्शन होते हैं। घर परिवार में चारों तरफ विभिन्न घटनाओं का वर्णन मिलता है। लेखक ने अपनी भूमिका में स्वयं लिखा है मेरी निगाह में तो समाज की वर्तमान मान्यतायें और व्यवस्था एक बहुत बड़ा गुनाह है, क्योंकि वह आधुनिक तरुण के स्वस्थ विकास की हत्या अन्तर्विकारों और उलझनों से उबरकर एक स्वस्थ सामाजिक धरातल पर नहीं पाते ...... ऐसी नैतिकता के खिलाफ विद्रोह करता हूँ।7

 

इस प्रकार समाज-व्यवस्था के कारण आज का युवक पंगु, निःसत्व और कायर है, किन्तु समाज किस प्रकार और कहाँ उसकी मानिसक शक्तियों को कुंठित करता है, इसका पता नहीं लगता। इस विकृति को समाज से दूर करना ही गुनाहों का देवता उपन्यास का मुख्य उद्देश्य रहा है।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. झेमचन्द्र, मल्लिक सुमन योगेन्द्र कुमार, साहित्य-विवेचन, आत्माराम एन्ड संस, दिल्ली, 1952, पृ. 153, पैरा. 2

2. राजेन्द्र यादव के अठारह उपन्यास, अझर प्रकाशन प्रा.लि., दरियागंज, 1981, पृ. 97, पैरा. 2

3. श्रीवास्तव शिव नारायण, सरस्वती मंदिर, वाराणसी, पृ. 117, पैरा. 2

4. डाॅ. प्रसाद अमर, जायसवाल गणेश प्रसाद, हिन्दी लघु उपन्यास, विद्याविहार गाँधी नगर, कानपुर, 1984, पृ. 58, पैरा अन्तिम

5. डाॅ. राजपाल हुकुमचंद, धर्मवीर भारती, साहित्य के विविध आयाम, भूमिका प्रकाशन, नई दिल्ली, 1991, पृ. 141, पैरा. 2

6. डाॅ. झाल्टे दंगल, उपन्यास समीक्षा के नये प्रतिमान, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1987, पृ. 78, पैरा. 2

7. त्यागी साधना, धर्मवीर भारती समग्र, वैभव प्रकाशन, रायपुर, 2008, पृ. 147, पैरा. 2

 

 

 

Received on 16.01.2012

Revised on 20.01.2012

Accepted on 01.03.2012

A&V Publication all right reserved

Research J. Humanities and Social Sciences. 3(1): Jan- March, 2012, 87-89