वर्तमान परिपे्रक्ष्य में नक्सली वारदात की गूँजः मानवाधिकार के लिए चुनौती

 

 

Dr. (Mrs.) Vrinda Sengupta

Asstt. Prof., Deptartment of Sociology, Govt.T.C.L.P.G. College, Janjgir (C.G.)

सारांश

आज पूरा विश्व सुरसारूपी आतंकवाद के मुँह मंे समाया हुआ है। दुर्दान्त आतंकवादियों के भयावह क्रियाकलापों से पूरी दुनिया थर्रा उठी है। इस विकराल समस्या से जन-सामान्य ही नहीं, सरकारें भी अस्त-व्यस्त एवं त्रस्त हैं। 21 वीं शताब्दी में मानवता के इतिहास में क्रमशः 11 सितम्बर 2001, 1 अक्टूबर 2001, 13 दिसम्बर 2001 तथा 22 जनवरी 2002 की तिथियाँ काले अध्यायों का सृजन करती है। ये चार तिथियाँ मानवता के क्रूरतम एवं जघन्यतम कृत्यों को उद्घाटित करती है। 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका के विश्व व्यापार केन्द्र तथा पेंटागन पर हमला, 1 अक्टूबर 2001 को भारत स्थित जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर हमला, 13 दिसम्बर 2001 को भारत के संसद भवन पर हमला तथा 22 जनवरी 2002 को कोलकाता स्थित अमेरिकी सेन्टर पर हमले ने विश्व में बढ़ते हुए आतंकवाद के खतरे को नये सिरे से रेखाँकित किया है।

प्रस्तावना

इन घटनाओं ने मानव जाति के सम्मुख एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। मानव जीवन में दो घटनाएँ सत्य मानी जाती है, उसका जन्म एवं मरण किन्तु आज सम्पूर्ण विश्व में इन दो घटनाओं में एक तीसरी घटना भी जुड़ गई है। यह घटना है आतंकवाद की छाया में पल रही अकाल मृत्यु।

 

विगत वर्षों में आतंकवादियों का एक नया वर्ग समाज में प्रभावशाली हो गया है और सम्पूर्ण विश्व में एक जीवन दर्शन एवं आन्दोलन के रूप में मान्यता पर रहा है। एक वैश्विक चिन्ता सर्वत्र है, किन्तु शायद ही कोई ऐसा देश होगा, जहाँ आतंकवाद किसी किसी रूप मंे विद्यमान हो।

 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

नक्सलवादी आन्दोलन का नाम एक गाँव नक्सलवाड़ी के नाम से जुड़ा हुआ है, जो भारत, नेपाल और तब के पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पर स्थित है। 1967 मंे यहाँ आदिवासियों ने भू-स्वामियों के खिलाफ हथियार उठा लिए थे, उसके बाद यह आन्दोलन जंगल की आग की तरह देश के अन्य भागों में फैल गया। मार्च से मई 1967 के बीच पुलिस को इस प्रकार की लगभग 100 वारदातों की खबरें मिली। कुछ हिचकिचाहट के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने पुलिस को कार्यवाही करने के निर्देश दिए। 1970 के मध्य और 1971 के बीच नक्सलवादी हिंसा अपने चरम पर थी। सरकार ने देश के सीमावर्ती राज्यों, खासतौर से पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सेना की सहायता से संयुक्त अभियान शुरू किया। ये अभिमान 01 जुलाई से 15 अगस्त 1941 तक चला और इन्हें आपरेशन स्टीपल चेज का कोड नाम दिया गया। इस कार्यवाही के अच्छे परिणाम मिले। सन् 1980 में आन्ध्रप्रदेश में कोंडापल्ली सीतारमैया के नेतृत्व में पीपुल्स वार ग्रुप के गठन के साथ इस आन्दोलन में फिर जान गई।

 

 

 

ाीसगढ़ में स्थिति

ाीसगढ़ में नक्सलवादी हिंसा का ज्यादा जोर बस्तर में है। राजनाँदगाँव, जशपुर और सरगुजा जिलों में भी नक्सलवादी सक्रिय है। राज्य सरकार सलवा जुडूम (शांति मिशन) के जरिये आदिवासियों को एकजुट करने की कोशिश करती है। नक्सलवादी उसका विरोध करते हैं और वह जुडूम कार्यकर्ताओं की निर्ममता से हत्या कर देते हैं।

 

हिंसा ताजा घटना 12 जुलाई 2009 को राजनाँदगाँव जिले के मदनवाड़ा में तथा 20 जुलाई 2009 को बीजापुर जिले में घटित हुई।

 

 

आँकड़े की बात करें तो पिछले कुछ सालों में प्रदेश में नक्सली हिंसा का केवल विस्तार हुआ है, बल्कि हिंसा में मरनेवालों की संख्या में भी काफी इजाफा हुआ है। समस्या से निपटने को लेकर केन्द्र और राज्यों के बीच भी एक-दूसरे के पाले में गेंद डालने का खेल चल रहा है।

 

दरअसल, नक्सली हिंसा मुख्य रूप से सुदूर जंगलों में होने के कारण उसकी गंभीरता महानगरों में होनेवाली हिंसा की तुलना में कमजोर हो जाती है। नक्सली हिंसा के शिकार सुरक्षाकर्मियों के अलावा आदिवासी ही अधिक होते हैं, जिनकी कोई आवाज नहीं होती है। पिछले कुछ समय से नक्सली गतिविधियों का विस्तार शहरों तक होने लगा है। यह भी विसंगति है कि देश के आधे से अधिक राज्यों तक सक्रिय विस्तार पाने के बाद भी नक्सली समस्या सरकारांे को ही नहीं, राजनीति और चुनावों में भी अब तक कोई मुद्दा नहीं हो सकी।

 

नक्सलियों की वजह से विकास पूरी तरह ठप्प पड़ गया है। नक्सलवाद दिनों-दिन मजबूत हो रहा है। प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों को बुनियादी सुविधाओं के साथ मौलिक अधिकारों से भी वंचित होना पड़ रहा है। लोग नक्सलियों और सुरक्षाबलों के बीच पीस रहे हैं।

अध्ययन का उद्देश्य

1. आतंकवाद/नक्सलवाद को जड़ से समाप्त करना।

2. राष्ट्र/समाज के सभी नागरिकों को शांतिपूर्ण माहौल में जीने के लिए प्रेरित करना।

3. राष्ट्र के सभी नागरिकों को स्वच्छन्द घूमने-फिरने की आजादी हो।

4. मानव के आत्मरक्षा के अधिकारों का संरक्षण।

5. कानून की दृष्टि से सभी व्यक्तियों द्वारा प्रद अधिकारों के प्रति संरक्षण् प्रदान करना।

 

शब्द कुँजी

नक्सलवाद/आतंकवाद

मानवाधिकार

राष्ट्रीय/अन्तर्राष्ट्रीय समस्या

आतंकवाद से जन-धन की हानि राष्ट्र के लिए

 

उपकल्पना

नक्सलवाद का जड़ से खात्मा समाज/परिवार/राष्ट्र के लिए लाभप्रद होगा।

नक्सलवाद का सफाया से राष्ट्र पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

नक्सली वारदात मानवाधिकार के लिए गंभीर चुनौतीपूर्ण कार्य है।

 

शोध प्रविधि

प्रस्तुत शोध पत्र में वास्तविक घटना को लिया गया है। समाचार पत्र एवं आँखो देखा हाल को शोध पत्र में द्वैतीयक समंकों के द्वारा तैयार किया गया है। विवरणात्मक पद्धति का उपयोग किया गया है।

 

.. में सबसे बड़ा नक्सली हमला

76 जवान शहीद, 5 जवान घायल, 81 जवान निकले थे सर्च के लिए जंगल में। 615 बजे सुबह नक्सलियों ने किया अटैक ताड़मेटला (दंतेवाड़ा) में हुआ हमला। 1000 नक्सलियों ने दिया वारदात को अंजाम। सर्चिंग से लौट रही सी.आर.पी.एफ. सर्च पार्टी को कैम्प के पास निशाना बनाया।

 

अब तक के बड़े हमले

उत्पलमेटा (दंतेवाड़ा में पीछा कर रही पुलिस पार्टी को फाँसकर हमला किया 22 जवान शहीद।

रानी बोदली स्थित पुलिस कैम्प पर हमला, 55 जवान शहीद।

धमतरी के रिसगाँव इलाके में पुलिस पार्टी पर हमला किया, 13 शहीद।

राजनाँदगाँव के मदनवाड़ा इलाके में एम्बुश लगाकर हमला किया, एस.पी. विनोद कुमार चैबे समेत 29 लोग शहीद।

ताड़मेटला (दंतेवाड़ा) में हुआ ताजा हमला।

केन्द्र राज्य सरकार की साझा राजनीति के तरह अति नक्सल प्रभावित .. के धुर नक्सली इलाका दक्षिण बस्तर जिले में पुलिस जवानों ने नक्सलियों के सफाए के लिए निर्णायक लड़ाई शुरू कर दी है। पिछले दिनों जिले में आपरेशन हंट की शुरूआत की गई, जिसके तहत् अब तक जवानों ने दर्जनों नक्सलियों को मार गिराने में सफलता पाई है। संयुक्त रूप से चलाए जा रहे एण्टी वाइंट नक्सली आपरेशन के तहत् बुधवार को एस.टी.एफ., डी.एफ., सी..एफ. सी.आर.पी.एफ. कोबरा बटालियन थाना क्षेत्र के समीपस्थ ग्राम पालमचलमा के जंगलों पहाड़ियों के बीच नक्सलियों द्वारा अवैध रूप से चलाए जा रहे हथियारों की फैक्ट्री पर धावा बोलकर भारी मात्रा में हथियार गोला बारूद जब्त किया।

नक्सलियों पर ताबड़तोड़ फायरिंग।

हथियार और गोला बारूद बरामद।

आपरेशन ग्रीन हंट को मिली सफलता।

 

नक्सली समस्याः सबकी समस्या

दृष्टिकोण

हम पड़ोस में श्रीलंका से भी सीख ले सकते हैं, जो दो दशक से ज्यादा समय तक लिबरेशन टाईगर से लड़ते रहे। उन्होंने अपने देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन प्रतिनिधियों को खोया, हजारों निर्दोष नागरिकों की हत्याओं को सहन किया, परन्तु देश विरोधियों के सामने घुटने नहीं टेके, फिर भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता।

 

ग्रीन हंट आपरेशन से हलाकान नक्सलियों ने एक तरह से अपनी बौखलाहट को जाहिर करने के लिए रणनीति तय ही कर लिया है, ऐसा दंतेवाड़ा की घटना से जाहिर होता है। सी.आर.पी.एफ. के जवानों के विरूद्ध नक्सलियों के कायराना हरकत की जितने कड़े शब्दों में निन्दा की जाये कम है। एक तरह से नक्सलियों ने देश और राज्य की सरकार को विचलित करने की असफल कोशिश को अंजाम दिया है, किन्तु एक अरब बीस करोड़ आबादी देश में 76 जवानों की शहादत से नक्सलियों के प्रति राष्ट्रव्यापी विरोध के स्वर मुखर होंगे। इसका भी अंदाजा नक्सलियों की लगाना चाहिए। इतने जवानों की सामूहिक हत्या से देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए तत्पर लाखों जवानों के शौर्य को सामने कुछ एक हजार नक्सली भले ही दंतेवाड़ा जैसी जघन्य घअना को अंजाम देकर खुश हो सकते हैं, परन्तु उन्हें यह भी सोचना और समझना चाहिए कि समूचे विश्व में आतंकवाद कुछ समय के लिए सर उठा सकता है।

 

नक्सलवाद का खात्मा विकास से

केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम की संसद में यह स्वीकारोक्ति कि पिछले कई वर्षों से बढ़ रहे नक्सलवाद के खतरे को देश में कम करके आँका गया, यह आशा जगाती है कि अब सरकारें नक्सली समस्या के हल के प्रति गंभीर और योजनाबद्ध ढंग से पहल कर सकेंगी। स्वीकारोक्ति के साथ यह भी समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री द्वारा एकाधिक बार नक्सली हिंसा को देश की आँतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा निरूपित करने के बाद भी इस खतरे का सही-सही मूल्याँकन करने मंे कहाँ और किस स्तर पर चूक हुई? अब जबकि गृहमंत्री सरकारों की चूक को स्वीकार कर रहे हैं तो पाया जाना चाहिए कि समस्या के हल की दिशा में कारगर कदम उठाये जायेंगे।

 

नक्सली एक विचारधारा है, अतः उससे लोकताँत्रिक तरीके से बातचीत करके हल निकाला जाना चाहिए।

 

 

समस्या का निराकरण

आतंकवाद का स्वरूप, इतिहास एवं कारण प्रत्येक देश में अलग-अलग है। अतः पहले तो एक अंतर्राष्ट्रीय नीति तय हो फिर देश की परिस्थितियों के अनुकूल उसका क्रियान्वयन हो।

संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में आतंकवाद की समाप्ति के लिए व्यापक कार्यक्रम बनाये जाने चाहिए।

आतंकवादी संगठनों को धन एवं हथियारों की पूर्ति तस्करी से की जाती है। मादक दवाओं के अवैध व्यापार को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में परिवर्तन किया जाना चाहिए।

आतंकवाद से प्रभावित प्रत्येक राष्ट्र को आतंकवाद से लड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उच्च स्तरीय प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।

आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त युवकों की सामाजिक, आर्थिक स्थिति में सुधार तथा उनकी समुचित शिक्षा, रोजगार की व्यवस्था कर उन्हें इस जघन्य अपराध से विरत किया जा सकता है।

 

उपरोक्त सकारात्मक उपायों से आतंकवादी गतिविधियांे पर अंकुश लगाकर विश्व मानवता की रक्षा की जा सकती है। साथ ही मानव सभ्यता भयविहीन होकर वसुधैव कुटुम्बकम् के अपने सपने को साकार कर सकती है।

 

निष्कर्ष:

मानवाधिकार का मुद्दे भले ही वैश्विक महत्व का हो पर व्यवहारिक स्तर पर भारत और तीसरी दुनिया के लिए यह एक जटिल समस्या है, इसलिए भारत में इस मुद्दे को लोकतंत्र, धर्म निरपेक्षता और सामाजिक न्याय से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारत में सामाजिक स्तर पर भी यह एक मुश्किल मामला है, जो केवल सरकारी मशीनरी की असफलता या पक्षपात के कारण नहीं, बल्कि स्वास्थ्य लोकताँत्रिक चेतना के अभाव और सामंती पूर्वाग्रहों के कारण भी है। देश की आजादी से पहले अँगे्रजी हुकूमत जितनी निहत्थे गाँधीजी से डरी हुई थी। उतनी किसी सेना से नहीं, क्योंकि गाँधीजी भी अहिंसावादी विचारधारा किसी भी सैनिक हिंसा से बड़ी थी। मानव समुदाय में प्रत्येक मानव को गौरवपूर्ण ढंग से जीने का हक है और यह अधिकार प्रकृति प्रद है। मानवाधिकार मूलभूत आजादी के अधिकार है, जो मानव के पूर्ण व्यक्तित्व विकास में आनेवाली बाधाओं को दूर करने के लिए आवश्यक है।

 

यदि निष्ठापूर्वक और ईमानदारी के साथ मानवाधिकार संरक्षण के लिए सही प्रयास किए जाये तो निश्चय ही सफलता के किसी किसी पड़ाव पर अवश्य पहुँचा जा सकता है। ऐसा नहीं है कि इस दिशा में प्रयास ही नहीं हुए है, प्रयास किए गए हैं। किन्तु अभी तक अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए हैं। एकमात्र पुलिस प्रशासन दोषी नहीं है अपितु जन सामान्य भी समान रूप से भागीदार है, जो अपने हक के प्रति जागरूक नहीं है। बिना शिकायत के पुलिस प्रशासन मदद करने के लिए चाहते हुए भी आगे नहीं सकता। मानवीय अधिकार सभी व्यक्ति के लिए समान है। जन जागरण से जनता पुलिस के मध्य संवाद कायम हो सकेगा, तभी पुलिस मानवाधिकार संरक्षण में अपनी भूमिका को बखूबी अंजाम दे सकेगी।

 

अंततः यह कहा जा सकता है कि सही प्रश्न शायद यह नहीं कि इन मानवाधिकारों के संरक्षण में पुलिस की भूमिका यह है कि इन मानवाधिकारों के संरक्षण में पुलिस की भूमिका को किस प्रकार और अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है।

 

नक्सलवाद के उदय के कारण:

ाीसगढ़ का नासूर एवं देश की अशांति रूपी पौधे का बीज नक्सलवाद के फलने एवं फूलने के कारण इस प्रकार है:-

 

1. गरीबी:

देश की अनेक समस्याओं की तरह नक्सलवाद भी गरीबी के गर्भ से जन्म लिया है। यद्यपि गरीबी उन्मूलन के नाम पर केन्द्र एव ंराज्य सरकार अरबांे रूपये खर्च कर रही है, किन्तु इन दुर्गम स्थानों की गरीबी दूर नहीं हो रही है। ऐसे गरीबों को नक्सली अपने प्रभाव में लेने में सफल हो जाते हैं।

 

2. अशिक्षा:

दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा की समुचित व्यवस्था होने से लोगों मंे जागरूकता एवं समझ का अभाव है, जिसके कारण नक्सली आसानी से उनका विश्वास अर्जित करने में सफल होते हैं।

 

3. बेरोजगारी:

गरीबी के कारण वे स्व-रोजगार स्थापित नहीं कर पाते तथा अशिक्षा के कारण उन्हें रोजगार नहीं मिल पाता, जिसके कारण वे बेरोजगार हो जाते हैं। बेरोजगारी की यह दशा उनमें असंतोष उत्पन्न करती है। ऐसे असंतुष्ट व्यक्तियों को गुमराह करने में नक्सलवादियों को विशेष मेहनत नहीं करनी पड़ती।

 

4. विकास योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं:

सामान्य रूप से नक्सलवादी गतिविधियों का जन्म दुर्गम एवं वन प्रदेशों में होता है, क्योंकि प्रजाताँत्रिक सरकार इन क्षेत्रों में शिक्षा, चिकित्सा, आवास, यातायात एवं संचार जैसी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं करा पाती, जिसके कारण वनवासी एवं आदिवासी क्षेत्रों के लोगों में असंतोष एवं शासन के प्रति दुराग्रह उत्पन्न होता है, इस दशा का उपयोग नक्सलवादी अपने आन्दोलन के विस्तार के लिए करते हैं।

 

5. प्रशासनिक शिथिलता:

नक्सलवादियों का कार्य क्षेत्र वन, पहाड़ या दुर्गम स्थल होते हैं, जहाँ प्रशासनिक व्यवस्था इतनी चुस्त-दुरूस्त नहीं होती, जिसके कारण नक्सलवादियों को वृहद् होने में मदद मिलती है।

6. क्षेत्रीय समस्याओं का राजनैतिककरण:

वर्तमान प्रजाताँत्रिक शासन व्यवस्थाओं में ाा प्राप्त करने के लिए क्षेत्रीय समस्याओं का केवल राजनैतिककरण किया जाता है, वरन् अनुचित लाभ लेने की कोशिश की जाती है। इससे नक्सलवादियों को वृहद् स्वरूप प्राप्त करने में मदद मिलती है।

 

7. विभिन्न राज्यों में समन्वय का अभाव:

वर्तमान समय में हमारे देश में पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, आन्ध्रप्रदेश, ाीसगढ़ आदि नक्सलवादियों के प्रहारों से पीड़ित हैं, किन्तु पारस्परिक समन्वय एवं तालमेल होने के कारण ये राज्य संयुक्त रूप से कार्यवाही नहीं कर पाते। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए नक्सलवादी एक राज्य में आतंक फैलाकर दूसरे राज्य में छिप जाते हैं।

 

8. भूमि सुधार कार्यक्रम:

दुर्गम क्षेत्रों में तो भूमि से संबंधित मामलों का शीघ्र निपटारा होता है और ही भूमि सुधार संबंधी कोई योजना ही क्रियान्वित की जाती है। शासकीय भूमि में खेती या वन लगाने की अनुमति भी प्रशासन आदिवासियों को नहीं देता, जबकि नक्सलवादी अपने आतंक से आदिवासियों को यह सुविधा उपलब्ध करा देते हैं। इसी कारण नक्सलवाद को वृहद् स्वरूप धारण करने में मदद मिलती है।

 

9. दलीय एवं चुनावी राजनीति:

राजनीतिज्ञों का एकमात्र लक्ष्य ाा प्राप्ति होता है, जिसको ध्यान में रखते हुए ऐसा कार्य करते हैं या समर्थन देते हैं, जिससे या तो नक्सलवाद को समर्थन मिलता है, या उसके उन्मूलन में बाधा आती है।

 

10. अवैध शस्त्र निर्माण एवं शस्त्र भण्डार:

नक्सलवादी पुलिस थानों में आक्रमण कर शस्त्र इकट्ठा करते हैं एवं चलित शस्त्र निर्माण मशीनों द्वारा शस्त्रों का निर्माण करते हैं। विदेशी संबंधों के जरिये वे विदेशों से आधुनिक शस्त्र भी प्राप्त कर लेते हैं। ये शस्त्र नक्सलवादियों को अपनी भयावह कार्यवाही करने में सहायक होते हैं।

 

11. शोषण एवं अन्याय की प्रवृिा:

भारतीय सामाजिक एवं आर्थिक दशा लोगों के शोषण एवं अन्याय का आधार भी बन जाती है, जिसके कारण शोषित पक्ष विद्रोह के मार्ग पर चल पड़ता है। इससे नक्सल गतिविधियों का प्रोत्साहन मिलता है।

 

12. शासक एवं शासित के मध्य संवादहीनता की दशा:

नक्सलवादियों के कार्यस्थल वन, पहाड़ एवं दुर्गम क्षेत्र होते हैं, जहाँ शासकों एवं शासितों के मध्य संवादहीनता की दशा होती है। शोषित पक्ष की आवाज जब शासक वर्ग नहीं सुनता तो वह विद्रोह का सहारा लेता है, इससे भी नक्सलवाद को बढ़ावा मिलता है।

13. उच्च वर्ग को संरक्षण:

सामान्यतः चुनावी व्यवस्था के माध्यम से सामंतवादी जमींदार तथा आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्ति ही ाा प्राप्त करते हैं, जो अपने ही वर्गों को संरक्षित करने का प्रयास करते हैं तथा कमजोर वर्ग की ओर ध्यान नहीं देते, यह व्यवस्था भी व्यक्ति को विद्रोही बनाती है, जिससे नक्सलवाद को बढ़ावा मिलती है।

 

14. सुविधाओं का अभाव:

दुर्गम क्षेत्रों में आवास, चिकित्सा, शिक्षा, यातायात एवं संचार जैसी आधारभूत सुविधा का अभाव होता है, जिससे आदिवासियों में असंतोष आता है, इस दशा का नक्सलवादी अनुचित लाभ उठाकर उन्हें हिंसक रास्तांे में ले आते हैं।

 

15. जंगलराज वर्सेस प्रजातंत्र:

प्रजाताँत्रिक शासन व्यवस्था में आदिवासियों को जो नहीं मिल पाता, वह जंगलराज से उन्हें मिल जाता है। यह प्रवृिा नक्सली क्षेत्र को वृहद् बनाती है।

 

16. मीडिया की भूमिका सार्थक नहीं:

आधुनिक संचार व्यवस्था इतनी उन्नत हो गई है कि मीडिया किसी भी पक्ष का मनोबल घटा या बढ़ा सकती है, किन्तु आतंकी एवं नक्सली कार्यवाही एवं उनका वृहद् भयावह स्वरूप मीडिया आज पर्यन्त जनता के सामने प्रस्तुत नहीं कर पाई है, जिसके कारण इसका उन्मूलन नहीं हो पा रहा है।

 

17. प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार:

यद्यपि केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा दुर्गम क्षेत्रों के विकास के लिए पर्याप्त विाीय सहायता दी जा रही है, किन्तु प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कारण आदिवासियों को शासकीय सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाता। यह स्थिति व्यक्ति को हिंसात्मक रास्ते की ओर ले जाती है।

 

18. दलितों एवं आदिवासियों का शोषण:

दलित एवं आदिवासी का कई तरह से शोषण होता है। एक ओर तो इन्हें किसी प्रकार की सुविधा नहीं मिलती, रोजगार नहीं मिलता, स्व-रोजगार नहीं मिलता तथा उनके वनोपज का मूल्य भी उचित नहीं मिलता, परिणाम स्वरूप जीविकोपार्जन के लिए वे अनुचित साधनों का सहारा लेते हैं, ऐसे कमजोर पक्ष शीघ्रता से नक्सलियों के लुभावनों प्रयासों की ओर आकर्षित होते हैं।

 

19. विदेशों से सहायता एवं प्रोत्साहन:

नक्सलियों पर की गई छापामार कार्यवाही से विदेशी साहित्य, विदेशी हथियार एवं विदेशी मुद्रा प्राप्त की गई है जो इस बात का प्रमाण है कि नक्सलियों को विदेशी सहयोग एवं प्रोत्साहन मिल रहा है, जिसके कारण भी नक्सली गतिविधियाँ तीव्र गति से विस्तृत हो रही है।

 

 

निष्कर्ष:

दर्शनीय स्थलों आदिवासियों की अनोखी संस्कृति के लिए जाना जाने वाला बस्तर आहिस्ता-आहिस्ता नक्सलवादी इलाके के रूप में पहचान बना रहा है। ाीसगढ़ रूपी चाँद का ग्रहण नक्सलवाद है। नक्सलवाद रूपी विष वक्ष गरीबी की भूमि एवं अशिक्षा, बेरोजगारी, असुविधाओं रूपी खाद से फल-फूल रहा है। अतः केन्द्र एवं राज्य सरकारों को तथा विभिन्न राजनीतिक दलों को अपना निजी स्वार्थ का त्याग कर एकता के यज्ञ में सर्वस्व होम करना होगा, तभी यज्ञ से निकलने वाला प्रकाश नक्सलवाद के अँधकार को दूर कर पायेगा। अंत में यही कहा जा सकता है कि- शासन का लक्ष्य नक्सलवाद को समाप्त करना होना चाहिए, कि नक्सलवादी को समाप्त करना, क्योंकि पाप से घृणा करनी चाहिए, पापी से नहीं।

 

संदर्भ सूची

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Received on 03.05.2012

Revised on 15.05.2012

Accepted on 12.06.2012

A&V Publication all right reserved

Research J. Humanities and Social Sciences. 3(4): October-December, 2012, 509-513