कामकाजी महिलाएॅ: कार्य संतुष्टि

(कोरबा नगर के शासकीय अशासकीय संस्थानो के विशंष संदर्भ में)

 

हेमलता बोरकर1, श्वेता पाण्डेय 2

1वरिष्ठ सहायक प्राध्यापक, 2एम. फिल. शोधार्थी, समाजशास्त्र अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर

 

 

संक्षेपिका

अशासकीय संस्थानो मे कामकाजी महिलाओ को अक्सर नौकरी की समस्याओ से जूझना पड़ता है। शोध अध्ययन का उदे्दश्य कोरबा नगर के शासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं तथा अशासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के कार्य संतुष्टि पर केन्द्रित रखा है। संबंधित शोधो की समीक्षा के पश्चात शोध अध्ययन मे परिकल्पना, शासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं तथा अशासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के कार्य संतुष्टि में अंतर पाया जाता है, का निर्माण किया गया। अध्ययन मे उद्देश्यपूर्ण निर्देशन के माध्यम से 60 अशासकीय, 60 शासकीय कामकाजी महिलाओं का चयन किया। अध्ययन की प्रकृति के आधार पर अनुसूची का निर्माण करते हुए, औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनो प्रकार के साक्षात्कार के माध्यम से, तथ्यो का संकलन किया गया। अध्ययन मे वर्णनात्मक एवं अनुमानिक दोनो प्रकार के सांख्यिकी विश्लेषण विधियो का उपयोग किया गया, शासकीय संस्थानो मे कार्यरत महिलाओ का माध्य 11ण्4500 एवं अशासकीय संस्थानो मे कार्यरत महिलाओ का माध्य 8ण्5000 प्राप्त हुआ। परिकल्पना की जांच हेतु स्वंतत्र श्जश् परीक्षण का उपयोग किया गया, का मान 5ण्545 प्राप्त हुआ जो स्वतंत्रता की कोटि 118 पर 0.01 स्तर पर सार्थक हैं। शोध अध्ययन की उपकल्पना सिद्ध होती है। स्पष्ट है कि, श्शासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं तथा अशासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के कार्य संतुष्टि में अंतर पाया जाता है।

 

 

प्रस्तावना

जीवन स्तर पर व्यक्ति के आर्थिक स्थिति का प्रभाव पड़ता है। आपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जीविकोपार्जन मनुष्य की अनिवार्य आवश्यकता है। आर्थिक अभाव किसी भी व्यक्ति के प्रगति सुख में बहुत बड़ी बाधा है। जैन, मंजू 1994 के अनुसार नवीन आर्थिक संस्थाओं तथा औद्योगीकरण के फलस्वरुप महिलाओं में आर्थिक निर्भरता पनपी और वे घर की चारदीवारी से निकलकर बाह्य जगत से परिचित हुई। यह धारणा है कि, यदि नारी सार्वजनिक क्षेत्र में भागीदार होगी तो पारिवारिक संगठन बिखर जायेगा, मूलतः विकृत अवधारणा है। नारी द्वारा अर्जित आय परिवार की आर्थिक स्थिति में सहायक ही होगी, इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता। परिवार के स्तर में सुधार होना स्वाभाविक है, उत्तरोत्तर बढ़ती आवश्यकताओं पारिवारिक जीवन स्तर हेतु न्यूनतम वित्तीय योगदान भी अपेक्षित है। (मुकेश, चंद 2008) आज के इस भौतिकवादी युग में मंहगाई के कारण आर्थिक बोझ इतना बढ़ गया है कि, घर की आवश्यकताओं की पूर्ति एक कमाने वाले सदस्य के सहारे ठीक ढंग से नहीं हो पाता है। ऐसे में महिलाओं का यह दायित्व हो जाता है कि वे भी घर से बाहर निकलकर धनोपार्जन कर पारिवारिक संतुलन बनाए रखने में सहायता करें। परिवार के सदस्यो को यह स्वीकार करना चाहिए कि, महिला का जीविका संबंधी कार्य उनके व्र्यिक्तत्व विकास हेतु भी उतना ही आवश्यक है जितना परिवार तथा समाज के लिए आवश्यक है। पुरुष वर्ग और समाज की मनोवृत्ति में भी काफी परिवर्तन हो गया है। एक समय था, जब पुरुष द्वारा अपनी पत्नी को घर के बाहर काम पर भेजना उनकी शान और इज्जत के खिलाफ समझा जाता था।

 

 

कपूर, प्रमिला 1976 के अनुसार जीवन के खर्च में बढ़ोत्तरी होने के साथ-साथ किसी मध्यवर्गीय परिवार के लिए केवल पति की आमदनी में गुजारा कर पाना मुश्किल से मुश्किलतर होता जा रहा है। पुरुष की इस मनोवृत्ति में हुआ परिवर्तन स्वागत योग्य है। पुरुष मनोवृत्ति में हुए इस परिवर्तन में हुए इस परिवर्तन की पुष्टि, कापाडिया 1959, सेनगुप्ता 1960, रौस, कारमैक 1961, जौहरी 1970, रामानुजन, गोल्डस्टीन 1972 के अध्ययनों द्वारा भी होती है। राना डे और रामचंद्रन 1970 द्वारा दिल्ली में किए गए अध्ययन से पता चलता है कि कामकाजी महिलाओं के कुल रिशतेदारों में से 88 प्रतिशत रिशेतदार स्त्रियों की नौकरी के पक्ष में इसलिए भी थे क्योंकि वे ऐसा समझते थे कि इससे परिवार की इज़्ज़त बढ़ती है। वर्तमान में कार्यशील भूमिका निर्वाह के परिणामस्वरुप महिला, वेतन पारिश्रमिक के माध्यम से पारिवार की आर्थिक स्थिति में साकरात्मक बढ़ोत्तरी में सहायक बनने में समर्थ है। परंपरागत भारतीय समाज में मध्यम उच्च वर्ग की स्त्रियों का विशेषकर विवाहित स्त्रियों का विशेषकर विवाहित स्त्रियों का घर से बाहर नौकरी करना सम्मान जनक नहीं समझा जाता था। घोर आर्थिक आवश्यकता तथा कठिनाईयों में ही इन वर्गो की स्त्रियों ने घर से बाहर निकलकर नौकरी करनी शुरु की। आज की बदलती हुई आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में तथाकथित सम्मान का विचार अर्थहीन हो गया है। हाटे 1930, देसाई 1945 के अनुसार जो महिलाएॅ विशेष पद नियुक्त होती थी, उन्हे विवाह की अनुमति नहीं थी। इस प्रकार के सेवा नियमों में पूर्वाग्रह था कि, वैवाहिक स्थिति और रोजगार का मेल तो व्यावहिरक है ही स्वीकार्य। स्वतंत्रता के पूर्व अनेक सरकारी सेवाओं जैसे आई. एफ. एस. वायुपरिचारिका सेवा में विवाहित महिलाओं की नियुक्ति नहीं की जाती थी। वर्तमान में इन शर्तो में परिवर्तन कर दिया गया है। सत्यानंद कृष्णा 1973 के द्वारा किए गए अध्ययन से ज्ञात होता है कि परिवारों में स्त्रियों को नौकरी करने की सहमति तो दे दी जाती है, पर उन्हे अपनी आय को स्वयं रखने की स्वतंत्रता नहीं होती। परिवार के सदस्य चाहते हैं कि वह आय अर्जित करे और परिवार के सदस्यों को दे। उन्हें स्वयं अर्जित आय को रखने का भी अधिकार नहीं होता। इस स्थिति मे महिलाओं मे तनाव स्पष्ट रुप से देखा जा सकता है। लावानिया, उमा 2007 के अनुसार कामकाजी महिलाओें की योग्यता, अनुभव कार्यालय में पद के अनुरुप यदि उन्हे वेतन या पारिश्रमिक नहीं मिलता तो भी महिलाएॅ प्रभावित होंगी। यदि उनके पद या योग्यता के आधार पर उनसे कार्य अधिक लिया जाए वेतन कम दिया जाये तो भी उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती है। क्योंकि महिलाएं कार्य, आर्थिक मजबूरी, पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाने की इच्छा, आदि कारणों से करती है।

 

उद्देश्यः-

शोध अध्ययन को सुचारु रुप से संपादित करने हेतु शोध अध्ययन के निम्नालिखित उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं-

शासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं तथा अशासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के कार्य संतुष्टि का अध्ययन करना।

 

समस्याः-

क्या शासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं तथा अशासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के कार्य संतुष्टि मे अंतर पाया जाता है।

 

परिकल्पनाः-

1. शासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं तथा अशासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के कार्य संतुष्टि में अंतर पाया जाता है।

 

विधि

अध्ययन क्षेत्रः- प्रस्तुत अध्ययन के अंतर्गत कोरबा नगर के शासकीय अशासकीय संस्थानों में कार्यरत कामकाजी महिलाओं का चयन किया गया।

 

प्रयोज्यः- प्रस्तुत अध्ययन कोरबा नगर के शासकीय अशासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के संदर्भ में किया गया है। शोध अध्ययन हेतु 120 ारदाताओं का चयन उद्देश्यपूर्ण निदर्शन के द्वारा 60 शासकीय संस्थानों से तथा 60 अशासकीय संस्थानों से कामकाजी महिलाओ का चयन किया गया है।

 

शोध डिजाईनः- प्रस्तुत अध्ययन मे सर्वे शोध डिजाईन का उपयोग किया गया है।

 

उपकरण:- प्रस्तुत अध्ययन मे साक्षात्कार अनुसूची का निर्माण, अध्ययन की प्रकृति को ध्यान मे रख कर किया गया है।

 

प्रविधिः- औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनो प्रकार के साक्षात्कार के माध्यम से, तथ्य का संकलन किया गया।

 

परिणाम एवं व्याख्या

शोध अध्ययन मे वर्णनात्मक एवं अनुमानिक दोनो प्रकार के सांख्यिकी विशलेषण विधि का उपयोग किया गया।

 

वर्णनात्मक सांख्यिकी- औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनो प्रकार के साक्षात्कार के माध्यम से, अनुसूची मे प्रतिक्रिया ली गयी। उन प्रतिक्रियो को संख्यात्मक तथ्यों मे परिर्वतन करने के पश्चात् वर्णनात्मक सांख्यिकी विश्लेषण किया गया।

 

शासकीय संस्थानो मे कार्यरत महिलाओ का माध्य 11ण्4500 एवं अशासकीय संस्थानो मे कार्यरत महिलाओ का माध्य 8ण्5000 है। स्पष्ट है कि, माध्य के अनुसार शासकीय संस्थानो मे कार्यरत महिलाओ की तुलना मे अशासकीय संस्थानो मे कार्यरत महिलाओ मेे कार्य संतुष्टि कम है।

 

आनुमानिक सांख्यिकी- शासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं तथा अशासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के कार्य संतुष्टि में अंतर पाया जाता है। इस उपकल्पना की जांच हेतु स्वंतत्र श्जश् परीक्षण किया गया है।

 

सार्थकता (.01 स्तर)

5ण्545 118 सार्थक

 

का मान 5.545 प्राप्त हुआ जो स्वतंत्रता की कोटि 118 पर .01 स्तर पर सार्थक हैं। अतः स्पष्ट है कि शोध की उपकल्पना सिद्ध होती है।

 

जैन, मंजू (1994), मुकेश, चंद (2008), कपूर, प्रमिला (1976), कापाडिया (1959), सेनगुप्ता (1960), रौस, कारमैक (1961), जौहरी (1970), रामानुजन, गोल्डस्टीन (1972) राना डे और रामचंद्रन (1970) हाटे (1930), देसाई (1945), सत्यानंद कृष्णा (1973) ने भी शोध अध्ययन मे शासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं तथा अशासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के कार्य संतुष्टि में अंतर पाया।

 

वर्तमान अध्ययन मे शासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं तथा अशासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के कार्य संतुष्टि में अंतर प्राप्त होने का मुख्य कारण शासकीय कामकाजी महिलाओ को पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याएं कम होती है। अध्ययन मे शामिल शासकीय कामकाजी महिलाओ का मासिक आय उच्च है एवं परिवार के सदस्यो का धनात्मक सहयोग प्राप्त है। समाज से भी कामकाजी महिलाओ को सम्मान प्राप्त होता है। शासकीय संस्थानो मे नौकरी की स्थायित्व होना, उच्च कार्य संतुष्टि को बनाए रखता है।

 

निष्कर्ष

व्याख्यात्मक, आनुमानिक सांख्यिकी के पारिणाम एवं तथ्यो के आधार पर स्पष्ट है कि, शासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं तथा अशासकीय संस्थानों में कार्यरत महिलाओं के कार्य संतुष्टि में अंतर पाया जाता है।

 

संदर्भ सूची

 

जौहरी, प्रेमा, (1970) स्टेटस आॅफ वर्किग वीमन, पी.एचडी. थीसिस, लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ।

जैन, मंजू, (1994) कार्यशील महिलाएॅ सामाजिक परिवर्तन प्रिंटवेल प्रकाशन, जयपुर।

कापड़िया, के. एम. (1959) फैमिली इन ट्रांजिशन, सोशियोलाॅजिकल बुलेटिन

कारमेट,मार्गरेट एल. (1961) हिंदू वूमन प्रथम भारतीय संस्करण बम्बई, एशिया पब्लिसिंग हाऊस

कपूर, प्रमिला, (1976) कामकाजी भारतीय नारी राजपाल एण्ड संस कश्मीरी गेट नई दिल्ली।

लावानिया, उमा (2007) कामकाजी महिलाएं भूमिका, सामाजिक सहयोग, वर्ष 15 अंक 62-63

मुकेश, चंद, (2008) कार्यशील महिलाएॅ दोहरी भूमिका संघर्ष . प्र. सामाजिक विज्ञान अनुसंधान जर्नल, वर्ष 6 अंक-2

राॅय, एलीन डी. (1961) हिन्दू फैमिली इन इट् अर्बन सैटिंग बम्बई, आॅक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस।

रामचंद्रन, पी. आॅर रानाडे, एस. एन. (1970) वीमन एंड एम्पलायमेंट, बबंई, टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशल साइंजेज।

रामानुजन, बी. के. (1972) इंडियन फैमिली इन ट्रांजिशनः चैजिंग रोल्स एंड रिलेशनशिप्स, सोशल एक्शन।

सेनगुप्ता,पद्मिनी, (1960) वीमन वक्र्स इन इंडिया बम्बई, एशिया पब्लिसिंग हाऊस

Received on 13.12.2012

Modified on 20.12.2012

Accepted on 25.12.2012

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Research J. Humanities and Social Sciences. 3(4): October-December, 2012, 441-443