वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी युग में मीडिया का युवाओं पर प्रभाव

(जिला: जाँजगीर के उ.मा.वि. के छात्र/छात्राओं केविशेष संदर्भ में )

 

Dr. (Mrs.) Vrinda Sengupta

 

Asst.Prof. (Sociology), Dept.of Sociology, Govt.T.C.L.P.G. College, Janjgir (C.G.)

 

साराँश

प्रस्तुत शोध पत्र में जाँजगीर के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के 20 युवाओं का मैंने अनौपचारिक सम्पके मीडिया के उपयोग प्रभाव, परिणाम के संबंध में आँकड़े एकत्र किया है।

 

मीडिया आज के मानवीय जीवन का ज्वलंत विषय है, जिसमें शोध कार्य की सर्वाधिक सम्भावनाएँ है, ताकि मीडिया को अधिक महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान की जा सके। विगत वर्षों में मीडिया के उपभोक्ताओं की संख्या जिस तीव्र गति बढ़ी है, वह मानवीय जीवन में इसके महत्व को स्पष्ट करता है। इसी महत्व को ध्यान में रखते हुए इस विषय को शोध विषय वस्तु के लिए चयनित किया गया है। शोध क्षेत्र से संबंधित विविध वर्गों तथा विविध शैक्षणिक योग्यता वाले उारदाताओं से सम्पर्क कर उनकी भावनाओं को शोध पत्र के रूप में प्रस्तुत कर ऐसे सुझाव देने का प्रयास किया गया है, जिससे मीडिया प्रभावी बन सके।

 

आज का मानवीय जीवन मीडिया के बिना अधूरा है। मीडिया, सिनेमा, केबल, कम्प्यूटर, टेलीफोन, मोबाईल ई-मेल वे माध्यम हैं, जिन्होंने दो स्थानों एवं दो व्यक्तियों केेेेेेेेेेेेेेेेेे मध्य की दूरी को समाप्त कर भारत की इस उक्ति को चरितार्थ किया है, कि सारा विश्व एक परिवार है। कुछ समय पहले मनुष्य की जो विलासी या आरामदायक आवश्यकताएँ मानी जाती थीं, आज वे मानवीय जीवन का अनिवार्य अंग बन चुकी है और इसमें मुख्यतः जनसंचार के माध्यम ही है। वर्तमान समय में मुख्य रूप से मोबाईल, टेलीफोन, टी.वी., इंटरनेट, ई-मेल एवं कम्प्यूटर वे जनसंचार के माध्यम हैं, जो धीरे-धीरे मानवीय जीवन के आधार बन रहे हैं। आज इंटरनेट की मदद से हम विश्व के अनमोल साहित्य को अमरता प्रदान कर सकते हैं तथा जनसंचार माध्यम ही वे उपाय है, जिनसे शोध विषयवस्तु न्यूनतम समय, श्रम एवं पूजा से शोध कार्य को सकारात्मक स्वरूप प्रदान किया जा सकता है। ये जनसंचार माध्यम व्यक्ति के सामाजिक जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में सफल हुए हैं। आज जिस भू-मण्डलीयकरण, उदारीकरण एवं निजीकरण की सर्वाधिक चर्चा की जाती है, वह मीडिया के गर्भ से ही निकला है। अतः मीडिया का भावी स्वरूप मानवीय जीवन को सुदृढ़ता प्रदान करने वाला होगा।

 

आज के युग को मीडिया का युग कहा जाता है। आकाशवाणी, दूरदर्शन, फिल्म, समाचार पत्र, विडियो, कम्प्यूटर, ई-मेल, इंटरनेट आदि ने विश्व भर की मानव जाति को प्रभावित किया है। शिक्षा ने विज्ञान को जन्म दिया और विज्ञान ने मीडिया के आधुनिक साधनों को। जनसंचार शब्द अँगे्रजी के डंेे ब्वउनदपबंजपवद शब्द का पर्यायवाची है। जनसंचार के माध्यमों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:-

 

 

01. शब्द संचार माध्यम: इसके अंतर्गत समाचार पत्र-पत्रिकाएँ तथा अन्यत्रमुद्रण सामग्री।

02. श्रव्य संचार माध्यम:रेडियो, कैसेट तथा टेप रिकार्डर आदि।

03. दृश्य संचार माध्यम:दूरदर्शन, विडियो, कम्प्यूटर, फिल्म आदि।

 

जन संचार माध्यमों में समाचार-पत्र, रेडियो तथा दूरदर्शन का विशेष महत्व है। वर्तमान समय में विभिन्न समाचारों को जन-साधारण तक पहुँचाने में इनकी प्रधान भूमिका रही है। इसलिए समाचार की भाषा पर ही इसकी सम्प्रेषण शक्ति आधारित है। भाव अभिव्यक्ति के साधन को भाषा की संज्ञा दी जाती है।

 

प्रस्तावना:

मानव एक सामाजिक प्राणी होने के नाते तथा आर्थिक क्षेत्र मानव जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के कारण मानव सामाजिक विकास के लिए सर्वाधिक प्रयत्नशील रहता है। यदि भारतीय समाज की दशा का अवलोकन करें तो प्राचीन समय से भारतीय समाज एक उन्नत समाज रहा है, जो समाज के सभी वर्गों को महत्व देता है।

 

संचार माध्यमों से गाँव-गाँव में जागृति आई है, इसका सबसे बड़ा प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिलता है। शहरी क्षेत्र में तो महिलाएँ पारिवारिक दायित्वों के साथ नौकरी कर रही है तथा ग्रामीण महिलाएँ जो चार दीवारी में बन्द थीं, पुरूषों के समकक्ष आ गई है। संचार माध्यमों के कारण आज महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता आ गई है। वे अनेक सामाजिक, राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग ले रही हैं। संचार माध्यमों के कारण आज बच्चों का पढ़ाई के प्रति रूझान बढ़ा है, क्योंकि उन्हें कम्प्यूटर, इंटरनेट, दूरदर्शन, दूरभाष से बहुत अधिक जानकारी मिलती है। संचार माध्यमों ने व्यक्ति की सामाजिक स्थिति में बहुत परिवर्तन किया है। आज व्यक्ति का कार्य क्षेत्र एक व्यवसाय तक सीमित न रहकर अनेक भागों में बँट गया है।

 

सामाजिक दशा व दिशा:

मानव एक सामाजिक प्राणी होने के नाते तथा आर्थिक क्षेत्र मानव जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के कारण मानव सामाजिक विकास के लिए सर्वाधिक प्रयत्नशील रहता है। यदि भारतीय समाज की दशा का अवलोकन करें तो प्राचीन समय से भारतीय समाज एक उन्नत समाज रहा है, जो समाज के सभी वर्गों को महत्व देता है। एक ओर तो यहाँ नारी व पुरूष के बिना धार्मिक व अन्य कार्य अधूरे माने जाते हैं तो दूसरी ओर संयुक्त समाज, भारतीय समाज की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसके कारण भारतीयों में जो परस्पर घनिष्ठता थी, वह हमेशा विदेशियों के आकर्षण का केन्द्र रही है, किन्तु समाज की दशा वर्तमान समय में दिशाहीन रूप में परिवर्तित हो रही है, क्योंकि एक ओर संयुक्त परिवार टूट रहा है तथा दूसरी ओर मानवीय संवेदनाएँ भौतिक उपलब्धियों के नीचे दम तोड़ रही है। पहले किसी गाँव या कस्बे का प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे से परिचित रहा करता था, जबकि आज एक ही गली के व्यक्ति अपरिचितों की तरह जीवन-यापन कर रहे हैं। यह एकाकी जीवन सामाजिक जीवन के मूल को नष्ट कर रहा है। ऐसी दशा में जनसंचार माध्यम ऐसे रामबाण सिद्ध हो सकते हैं, जिसके संधान से टूटे रिश्ते को जोड़कर समाज में प्राणवायु लाई जा सकती है, ताकि समाज की दिशा अपनी दशा को प्राप्त कर सकें तथा उसमें उारोार वृद्धि भी कर सकें।

 

विषय का समाजशास्त्रीय महत्व:

आधुनिक युग सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। वर्तमान समय में मीडिया का प्रभाव जनमानस पर पड़ रहा है। इससे प्रत्येक वर्ग के लोगों का सामाजिक कार्य आसान होता रहा है।

 

देश या समाज आज अपने विकास के जिन ऊँचाई तक पहुँचा है, उसमें निश्चित रूप में संचार के अनेक माध्यमांे का प्रभाव रहा है। यदि संचार माध्यम निष्पक्ष रूप से अपने समस्त क्रियाकलापों को सम्पादित करते हैं तो उससे युवा वर्ग का समाजीकरण स्वस्थ रूप से होता है। किसी भी देश या समाज का उन्नति या अवनति का प्रभाव सबसे ज्यादा युवा वर्ग की साज-सज्जा और उनकी गतिविधियों पर आधारित होता है। सामाजिक क्षेत्र हो या राजनीतिक क्षेत्र, संचार के माध्यमों के कारण ही आज घर की चार दीवारी के भीतर भी निश्चित रूप से हर वर्ग के बच्चों या युवाओं का समाजीकरण होता रहता है।

 

समाजीकरण का सबसे महत्वपूर्ण साधन परिवार होता है, क्योंकि परिवार से ही बच्चों को समाज और बाहर की दुनिया के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। इसके बाद मित्र-मण्डली, शिक्षण संस्थाएँ भी निश्चित रूप से हर वर्ग के लोगों का समाजीकरण करने में अहम् भूमिका निभा रही है।

 

सूचना प्रौद्योगिकी के कारण बाजार, व्यापार एवं प्रशासन कार्य पद्धति में भारी क्रांति आई है। व्यापार क्षितिज इंटरनेट, वल्र्ड वाइट वेब (डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू) साइबर स्पेज, इन्फार्मेशन सुपर हाइवे आदि जैसे शब्दों से गुँजायमान है, जिसके कारण ग्राहकों से सम्पर्क स्थापित करने, आर्डर लेने एवं प्रक्रिया, नेटवर्किंग एवं व्यापार पद्धति के समन्वयन के तौर-तरीकों में बदलाव आ रहा है। इंटरनेट हजारों छोटे-छोटे नेटवर्क, लाखों कम्प्यूटरों एवं सूचना देने वालों लाखों मानव स्त्रोतों से सम्पर्क काम करता है। प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों के पूर्वानुमान के अनुसार इंटरनेट और वल्र्ड वाइड वेब व्यावसायिक जगत की धुरी बनेगा। संयुक्त राष्ट्र का मत है कि वर्तमान युग में दूर संचार, स्वास्थ्य कल्याण एवं साक्षरता के बढ़ते चरणों की तरह एक मानवीय अधिकार रूप ले रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी, साॅफ्टवेयर और हार्डवेयर दोनों ही उद्योग के प्रचुर मात्रा में उपभोक्ता होने के कारण बड़े पैमाने पर फैल रही है। विकासशील देशों में सबसे निर्धन देश भी सूचना एवं संचार तकनीकों द्वारा परम्परागत समस्याओं से छुटकारा पाकर आधुनिक सूचना युग में तब्दील हो सकती है।

 

शब्द कुँजी:

1. सूचना प्रौद्योगिकी

2. मीडिया का युवाओं पर प्रभाव

3. सामाजिक परिवर्तन

 

शोध उद्देश्य:

ऽ किशोर छात्र-छात्राओं के शैक्षणिक विका पर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया का प्रभाव ज्ञात करना।

ऽ किशोर छात्र-छात्राओं के सामाजिक विकास पर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया का प्रभाव ज्ञात करना।

ऽ किशोर छात्र-छात्राओं के नैतिक विकास पर प्रभाव ज्ञात करना।

ऽ शारीरिक विकास पर प्रभाव ज्ञात करना।

ऽ इलेक्ट्राॅनिक मीडिया का लिंग भेद पर प्रभाव ज्ञात करना।

ऽ मीडिया का माध्यम शिक्षित युवाओं के लिए है।

 

परिकल्पना:

प्रस्तुत शोध पत्र में शून्य परिकल्पना को आधार बनाया गया है। अतः इसी परिकल्पना के अनुसार शोध कार्य में अग्रसर हुई परिकल्पनाएँ निम्नलिखित है:-

 

किशोरावस्था के छात्र-छात्राओं के शैक्षणिक विकास, सामाजिक विकास, नैतिक विकास, शारीरिक विकास, लिंग भेद पर सार्थक प्रभाव नहीं पड़ता।

 

शोध विधि:

प्रस्तुत शोध पत्र में सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया है एवं साक्षात्कार अनुसूची के माध्यम से आँकड़ों का संकलन किया गया है। उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के किशोर छात्र-छात्राओं के 25 छात्राओं का चयन किया गया है।

 

वर्तमान में अधिकाँश युवा पीढ़ी शिक्षित बेरोजगार है, अपनी दिन भर की खर्च निकालने में उसे बड़ी परेशानी हो रही है। वर्तमान में युवा मीडिया के इलेक्ट्राॅनिक साधनों का उपयोग बहुत अधिक कर रहे हैं। वर्तमान युवा पीढ़ी पर मीडिया अपनी अमिट छाप छोड़ रही है।

 

 

सुझाव:

1. जनसंचार-माध्यमों की सफलता बहुत कुछ उचित प्रकार से नेतृत्व के विकास पर निर्भर करती है।

2. ग्रामीण क्षेत्रों मंे व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा को दूर किया जाए, ताकि ग्रामीण लोग मीडिया के महत्वों को समझें एवं साक्षरता का प्रचार-प्रसार किया जाए एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जनचेतना उत्पन्न की जाये।

3. ग्रामीण क्षेत्रों में यातायात एवं तीव्रगामी संचार-व्यवस्था, समाचार-पत्र, नवीन तकनीकी ज्ञान, नवीन कौशल से संबंधित विषयों से उन्हें अवगत कराया जाये।

4. मीडिया के सूचना पे्रषण मंे निष्पक्षता की भावना हो। मीडिया को किसी पार्टी या शासन का पक्षधर नहीं होना चाहिए। उसमें निष्पक्षता एवं स्पष्टवादिता होनी चाहिए।

 

निष्कर्ष:

मीडिया का उपयोग भारतीय समाज के विविध वर्ग विशेषकर युवा वर्ग अपनी आर्थिक क्षमतानुसार कर अपने बहुमुखी विकास की ओर उन्मुख हो रहे हैं। समाज का उन्नत वर्ग सभी विकसित मीडिया का उपयोग करते हैं, जबकि मध्यम एवं निम्न वर्ग उतने प्रभावशील तरीकों से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।

 

मीडिया के प्रचार-प्रसार से समाज में कृषि, वाणिज्य, व्यवसाय शैक्षणिक, उद्योग, कला, संस्कृति, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन आ रहे हैं, जिससे समाज अपने नये आयामों को प्राप्त कर रहे हैं। इसलिए यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मीडिया वे शिल्पकार हैं, जो समाज रूपी भवन को नवीनतम एवं आधुनिकतम स्वरूप प्रदान कर रहे हैं।

 

संदर्भ सूची:

1. अग्रवाल जी.के.- समाज शास्त्र- साहित्य भवन पब्लिकेशन।

2. बघेल डी.एस.- सामाजिक अनुसंधान- साहित्य भवन पब्लिकेशन।

3. प्रो. गुप्ता एवं शर्मा- यूनीफाईड समाजशास्त्र- साहित्य भवन पब्लिकेशन।

4. बाबूलाल फड़िया- राजनीति विज्ञान- साहित्य भवन पब्लिकेशन।

5- Agrawal Hema Society, Culture and mass communication, sociology of journalist, New Delhi and Jaipur, Rajwat Pub. 1995

6- Barker, L.Larry, Communication Vibration, United States of America Prentice Hall, 1974

7- Caps Many, Communication or Confliet New York, Association Press. 1960

 

Journals and Others:

1- Abraham Abu, Medium is the Mess Mainstream, August, 1985

2- Rose, A.B. The News Paper Reader in India Sociology Vol. 14, 1966

3- Yaspal, A new Role for for mass media, communication, Vol. XXI No. 3rd and 4th July-Oct. 1986

 

Received on 23.04.2012

Revised on 05.08.2012

Accepted on 14.08.2012

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Research J. Humanities and Social Sciences. 4(1): January-March, 2013, 22-26