बी.एस.टी.सी. (प्राथमिक स्तर के शिक्षक-प्रशिक्षणार्थी) में अध्ययनरत् शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण संबंधी अवधारणाओं का लिंग भेद के आधार पर अध्ययन

 

श्रीमती सुमन गर्ग, श्रीमती कमला वशिष्ठ, एवं नरेन्द्र कुमार गर्ग,

1ंव्याख्याता, डी.सी.एस. शिक्षक प्रशिक्षण महिला महाविद्यालय, जयपुर (राजस्थान)

2निदेशक, स्कूल आफ एज्यूकेशन, जयपुर (राजस्थान) .

3रीडर शिरडी साईं बाबा आयुर्वेदिक मेडिकल काॅलेज, रेनवाल (जयपुर ) राजस्थान .

 

शोध साार

पृष्ठभूमि आज विश्व में सबसे प्रचलित और महत्वपूर्ण शब्द है पर्यावरण। पर्यावरण आज जीवन दर्शन बन चुका है। पर्यावरण मानव अथवा समस्त प्राणी जगत के चारोंओर फैला हुआ वह प्राकृतिक, जैविक और सामाजिक आवरण है, जिसमें मनुष्य तथा समस्त जीव रहते है। पर्यावरण एक समष्टि है और मानव इस समष्टि का अंग है। दोनों का ही अस्तित्व स्वतंत्र नहीं है बल्कि दोनों का अन्योन्याश्रित संबंध है। उद्देश्य बी.एस.टी.सी. में अध्ययनरत शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण संबंधी अवधारणाओं का लिंग भेद के आधार पर अध्ययन करना।

न्यादर्श प्रस्तुत शोध अध्ययन में शोधार्थी ने जयपुर क्षेत्र के ग्रामीण व शहरी बी.एस.टी.सी. महाविद्यालयों के शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों को न्यादर्श के रूप में चुना है, जिनकी संख्या 120 है।

सांख्यिकी - मध्यमान मानक विचलन टी-परीक्षण काई वर्ग परीक्षण (2 बाई 2)

 

प्रदत्तों का विश्लेषण एवं निर्वचन

क ित्र 1 का काई तालिका मूल्य .05 एवं .01 स्तर पर क्रमशः 3.41 एवं 6.34 है। गणना करने पर काई का मूल्य .04 प्राप्त हुआ। यह मूल्य काई तालिका मूल्य के दोनों ही स्तरों से कम है। अतः निराकरणीय परिकल्पना बी.एस.टी.सी. में अध्ययनरत् शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण संबंधी अवधारणा के स्तरों में समानताऐं नहीं हैं, को स्वीकृत किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि बी.एस.टी.सी. में अध्ययनरत् छात्र व छात्राओं के पर्यावरण संबंधी अवधारणा में भिन्नताऐं नहीं है।

 

मुख्य शब्द - पर्यावरण अवधारणा, लिंग भेद के आधार पर अध्ययन

 

अध्यन विषय का परिचय

मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण कारक है, वह प्राकृतिक पर्यावरण तंत्र को विभिन्न हैसियत से विभिन्न रूपों में प्रभावित करता है चाहे वह जैविक या भौतिक मनुष्य के रूप में हो अथवा आर्थिक सामाजिक या औद्यौगिक मानव के रूप में हो।

 

इस परिप्रेक्ष्य में पर्यावरण शिक्षा के अंतर्गत पर्यावरण को सुरक्षित रखना पर्यावरण का निरंतर विकास व संवर्धन करना, हानिकारक कारकों का सफलतापूर्वक नियंत्रित करने का प्रयास करना, अधिक उपयोग में आने वाली पर्यावरणीय वस्तुओं का विवेकपूर्ण उपयोग करना एवं वनों की महत्ता आदि का समावेश शामिल है, जिसके फलरूवरूप आज छात्रों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता आयी है, परन्तु यह जागरूकता पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इस प्रकार से सिद्वांत पर्यावरण को समझा तो लेते हैं परन्तु पर्यावरण के प्रति व्यवहार द्वारा अर्जित ज्ञान से कुछ भिन्नता देखने को मिलती है। अतः आज इस बात की आवश्यकता है कि बालकों (छात्र/छात्राओं) को न केवल पुस्तकीय ज्ञान द्वारा सचेत किया गया जाये बल्कि उन्हें प्रायोगिक रूप से पर्यावरण की महत्ता का आभास कराया जाए, जिससे उन्हें अधिक से अधिक अपने पर्यावरण की अवधारणा को समझ सकें।

 

 

आज ऐसी संस्कृति के विकास करने की आवश्कता है, जिसमें प्राकृतिक संपदा का विवेकपूर्ण दोहन हो और उसका अपव्यय रूके। विनाश करके विकास की बात करना नितान्त कल्पना है। अतः हमें ऐसी शिक्षा नीति व्यवहार में लानी होगी जो आर्थिक एवं सामाजिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण का संरक्षण कर सके। हमें पर्यावरण का संरक्षण करना है, अतः जनसामान्य के निम्न स्तर से जागरूकता पैदा करनी होगी। स्वस्थ्य पर्यावरण विकसित करने के लिये शिक्षा के प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च स्तरों पर पाठ्यक्रमों को नवीन रूप से संगठित करने की आवश्यकता है, जिससे न केवल बालकों में बचपन से पर्यावरण के प्रति अपेक्षित ज्ञान का संचार हो , अपितु वे आगे चलकर पर्यावरण का उचित रूप से संरक्षण कर सामाजिक आर्थिक विकास कर सकें। हमें इस बात का ध्यान रखना होगा, कि जो कुछ भी हम अपने पर्यावरण से प्राप्त करते है, उन्हें हमें अपने पर्यावरण को वापस भी लौटाना होता है। इसके लिये स्वस्थ्य व शुद्ध विचार एवं नैतिकता का सहारा लेना होगा, क्योंकि जब तक हमारी सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक समृद्धि नैतिकता का सहारा नहीं लेगी, तब तक हमारा कल्याण नहीं हो पायेगा।

 

जाॅन डब्ल्यू. बेस्ट के शब्दों में-

यद्यपि संबंधित साहित्य एवं विषय सामग्री को ढूंढना तथा अध्ययन करना एक लम्बा तथा थका देने वाला कार्य है तथा इसमें काफी समय भी लग जाता है, किन्तु शोध कार्य में इसका अपना विशेष महत्व हे। इससे शोधार्थी लाभ उठाकर अपने क्षेत्र व सीमाओं का ज्ञान प्राप्त करता है।

 

गुड व हाट के अनुसार, एक न्यादर्श जैसे कि नाम से स्पष्ट है कि एक विस्तृत समूह का अपेक्षाकृत छोठा प्रतिनिधि है।पी.वी. यंग के अनुसार, एक सांख्यिकी प्रतिदर्श संपूर्ण समूह अथवा योग चयन का ही एक अति छोटा आकार का समूह है।

 

प्रस्तुत अध्ययन में न्यादर्श-

प्रस्तुत शोध अध्ययन में शोधार्थी ने जयपुर क्षेत्र के ग्रामीण व शहरी बी.एस.टी.सी. महाविद्यालय के शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों को न्यादर्श के रूप में चुना है जिनकी संख्या 120 है।

 

पर्यावरण अवधारणा उपलब्धि परीक्षण-

डाॅ. एस.के. बावा, इंदीरवीर कौर द्वारा निर्मित उपलब्धि परीक्षण (ई.सी.ए.टी.) द्वारा किया।

 

उपकरण का परिचय

सभी परिस्थितियों, शक्तियों एवं वस्तुओं में पर्यावरण एक मूल्यवान विषय है जो मनुष्य पर आवरण बनाये हुए है जिसके द्वारा मानव की सभी गतिविधियां नियंत्रित होती है दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि मनुष्य प्राकृतिक और सामाजिक, सांस्कृतिक पर्यावरण के द्वारा घिरा रहता है लेकिन वर्तमान पर्यावरण में बुरी तरह से प्राकृतिक संसाधनों के क्षय के कारण प्रभावित हो रहा है। किन्तु शिक्षा की भूमिका पर्यावरण को बचाने में ठीक नहीं रही है। इसलिए आवश्यकता है विद्यार्थियों को पर्यावरण की अवधारणा के बारे में जागृत करना।

 

संबंधित साहित्य के सर्वेक्षण की सीमाऐं

इसकी सीमाओं का ज्ञान होना भी अनुसंधानकर्ता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि संबंधित साहित्य का अध्ययन करते समय अनेक सावधानियां रखने में इससे सहायता प्राप्त होती हैं इस विषय की संबंधित प्रमुख सीमाओं का वर्णन निम्नलिखित है-

साहित्य के अध्ययनकर्ता पर साहित्य के लेखक की विचारधार अथवा चिन्तन का प्रभाव पडता है, जो कि अनुसंधान की दिशा ही असंतुलित कर देता है। अतः अनुसंधानकर्ता को साहित्य का अध्ययन करते समय निष्पक्ष रहना चाहिए।

 

प्रायः अन्य अनुसंधानकर्ताओं के द्वारा विभिन्न प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर ही अपने अध्ययन में प्राप्त निष्कर्षों की तुलना करते समय अनुसंधानकर्ता जिन महत्वपूर्ण तथ्यों की उपेक्षा कर देता है, वे अग्रलिखित हैं-

 

दूसरे अनुसंधान के परिणाम में न्यादर्श की क्या-क्या विशेषताऐं थी?

पूर्व में अनुसंधानकर्ताओं ने किस विचारधार का प्रयोग किया और क्यों?

उनके द्वारा प्रयोग में लाये गये उपकरणों की वैद्यता कितनी थी?

पूर्व अनुसंधानकर्ताओं ने निष्कर्षों को निकालने में किस सीमा तक सांख्यिकी तथा तार्किक विधियों का प्रयोग किया है?

 

पूर्व अनुसंधानकर्ताओं ने किन-किन परिकल्पनाओं का निर्माण किया था?

 

उपरोक्त सभी तथ्य संबंधित साहित्य के सर्वेक्षण की सीमाऐं मानी जाती हैं। अतः अनुसंधानकर्ताओं को अपने अध्ययन में इन तथ्यों को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।

 

लघु न्यादर्श

सबसे पहले इस उपकरण का प्रयोग 10 विद्यार्थियों पर किया गया उसमें जो कमियां रह गई थीं उसे समग्र न्यादर्श में पूरा करने का प्रयास किया।

 

वैधता

आठ विषय विशेषज्ञों से प्रत्येक कथन के बारे में राय मांगी गयी उन्होंने आनी राय दी 80 प्रतिशत कथन के प्रति सब सहमत हो गये।

 

विश्वसनीयता

विश्वसनीयता की बात आई तो इसमें मिली-जुली प्रतिक्रिया रही अर्द्धविच्छेद विधि द्वारा विश्वसनीयता ज्ञान की गई 0.61 प्राप्त हुई।

 

उपकरण का प्रशासन

पर्यावरण अवधारणा उपलब्धि परीक्षण को बी.एस.टी.सी. प्रशिक्षणार्थियों पर प्रशासित किया गया। इस परीक्षण से संबंधित आवश्यक निर्देश भी दिये गये तथा उन्हें आश्वस्त किया गया कि उनके उत्तर पूर्णतया गुप्त रखे जायेगें एवं इनका प्रयोग केवल लघु शोध कार्य के लिए ही होगा। विद्यार्थियों को प्रत्येक कथन पर अपनी व्यक्तिगत अनुक्रिया व्यक्त करने के लिए कहा गया। उपयुक्त समय पश्चात् परीक्षण प्रपत्र को एकत्र कर लिया गया।

 

सांख्यिकी

सांख्यिकी एक ऐसी विधि है जो किसी क्षेत्र से संबंधित संख्यात्मक प्रदत्तों का अध्ययन विश्लेषण तथा विवेचन इस प्रकार से करती है कि उसके द्वारा भूतकालीन तथ्यों की वर्तमान तथ्यों से तुलना की जाती है अथवा भविष्य के लिए अनुमान निकाले जाते हैं। यहां यह ध्यान रखने की बात है कि सांख्यिकी कोई विज्ञान नहीं है वरन् यह केवल एक वैज्ञानिक विधि है। सांख्यिकी एक वैज्ञानिक विधि होने के कारण अनुमान लगाती है, अनुमानों की सत्यता को ज्ञात करती है और अंत में उन्हें स्वीकार या अस्वीकार करती है।

अर्थात् हम कह सकते हैं कि सांख्यिकी वैज्ञानिक विधि की वह शाखा है जो प्रदत्तों का विवेचन करती है। सांख्यिकी का तात्पर्य केवल निरीक्षणों की प्राप्त राशि आदि प्रदत्त संग्रह करना और उनको भली प्रकार समझने हेतु सुसंगठित व सुव्यवस्थित करना है।

 

सांख्यिकी का अर्थ व परिभाषा

सांख्यिकी शब्द को अंग्रेजी में ैजंजपेजपब कहा जाता है। स्टैटिक्स लेटिन भाषा के शब्द स्टेट्स या इटली के शब्द स्टेटिस्टा से निकला है। इसका प्रयोग आरंभ में जन्म मरण की संख्याओं के विवरण का लेखा रखने के लिए किया गया था, परन्तु धीरे-धीरे यह राजनीतिक विषय ही नहीं रहा। इसका प्रयोग राज्य की आर्थिक व सामाजिक समस्याओं व परिस्थितियों तक फैल गया। वर्तमान में सांख्यिकी का प्रयोग विज्ञान, गणित, शिक्षा मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र आदि सभी ज्ञान के क्षेत्र में होता है।

 

लविट के अनुसार, सांख्यिकी संख्यात्मक तथ्यों के संकलन, वर्गीकरण तथा सारणीयन से संबंधित एक अध्ययन है जो संबंधित घटनाओं का विवरण, विवेचन एवं तुलना करती है।

 

ब्लमर्स तथा लिण्डाक्विस्ट के अनुसार, सांख्यिकी पद्धतियां वे प्रणालियां हैं जिनके द्वारा संख्यात्मक अथवा परिमाणात्मक प्रदत्तों का संकलन तथा विवेचन किया जाता है।

 

फरगुसन के अनुसार, सांख्यिकी का संबंध सर्वेक्षणों और परीक्षणों द्वारा प्राप्त होने वाली सामग्री के संकलन, वर्गीकरण और व्याख्या से है।

 

लाटे के अनुसार, सांख्यिकी अनुसंधान का एक उपकरण है जिसका संबंध अंकित तथ्यों के संग्रह एवं व्याख्या की विधियों से है।

 

अध्ययन में प्रयुक्त सांख्यिकी

अनुसंधान का आधार तथ्यों का संकलन, विश्लेषण व निर्वचन होता है। तीनों कार्यों को सुचारू रूप से एकत्रित करने के लिए सांख्यिकी ज्ञान का प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक शोधकार्य में सांख्यिकी विधियों द्वारा एकत्रित सूचनाओं व संकलित तथ्यों का विश्लेषण तथा व्याख्या की जाती है।

 

प्रस्तुत शोध में पूर्व निर्धारित उद्देश्यों के आधार पर सर्वेक्षण विधि का प्रयोग कर न्यादर्श का चयन किया गया है तथा परीक्षणों के माध्यम से संबंधित समंकों के विश्लेषण के लिए निम्नलिखित सांख्यिकी का प्रयोग किया गया-

 

प्रदत्तों का विश्लेषण एवं निर्वचन

शोध परीक्षण के प्रशासन तथा अंकन के पश्चात् प्रदत्तों का संकलन एवं व्यवस्थापन किया जाता है। संकलित प्रदत्त प्राप्त प्रदत्त के रूप में जाने जाते हैं। प्राप्त प्रदत्त जब तक अर्थपूर्ण नहीं होते जब तक कि उनका सांख्यिकी विश्लेषण नहीं किया जाता। प्रदत्तों के विश्लेषण का अर्थ प्राप्त प्रदत्तों को अर्थपूर्ण बनाना है अथवा उपयुक्त को प्राप्त करने के लिए प्रदत्तों के विश्लेषण की सहायता से परिकल्पनाओं का परीक्षण किया जाता है।

 

इस प्रकार प्रदत्तों के विश्लेषण के निम्नलिखित प्रमुख कार्य हैं-

प्रदत्तों को अर्थपूर्ण बनाना।

परिकल्पनाओं का परीक्षण करना।

सार्थक परिणाम प्राप्त करना।

अनुमान लगाना अथवा सामान्यीकरण करना।

1. परा-सांख्यिकी के संबंध में अनुमान लगाना।

एक शोधकार्य द्वारा संपन्न किए गए अनुसंधान के प्रति वैज्ञानिक अधिकांशतः दो तथ्यों की ओर अपनी आलोचना अभिव्यक्ति करते हैं।

 

आंकडें

आंकडों का निर्वचन

आंकडों के निर्वचन का संबंध यहां उनके संकलन, संकेतीकरण, संवर्गीकरण, सारणीयन तथा विश्लेषण से है। एक अनुसंधान समस्या के संदर्भ में जहां तक तर्क संगत तथा संबंधित आंकडों के संकलन का संबंध है, इस विषय पर इस तथ्य को अधिकांशतः बल दिया जाता है कि वैज्ञानिक अध्ययनों में जिन प्रयोज्यों के माध्यम से आवश्यक सूचना का संकलन सम्पन्न किया जाता है, उनका चयन यथासंभव यादृच्छिक प्रक्रिया पर आधारित करना चाहिए क्योंकि यादृच्छिकरण द्वारा चयन की गई इकाइयां ही अपनी संबंधित समष्टि का प्रतिनिधि होती हैं।

 

किसी भी शोधकार्य में विभिन्न उपकरणों की सहायकता से प्राप्त सूचनाओं का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता जब तक कि उनका विश्लेषण ना कर लिया जाए।

 

कुक के अनुसार, वैज्ञानिक विश्लेषण अध्ययन तथ्यों परिणामों तथा वैज्ञानिक ज्ञान के संबंधों की खोज करता है।

 

प्रसिद्ध फ्रेन्च गणितज्ञ आकाटे के शब्दों में, जिस प्रकार एक मकान पत्थरों से बनता है, उसी प्रकार विज्ञान का निर्माण तथ्यों से होता है परन्तु तथ्यों का केवल संकलन उसी भांति का विज्ञान नहीं है। जैसे पत्थरों का ढेर मकान नहीं है।

 

पी.वी. यंग के शब्दों में, वैज्ञानिक विश्लेषण यह मानता है कि तथ्यों के संकलन के पीछे स्वयं तथ्यों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन और कुछ भी हेाता है। यदि इन सुव्यस्थित तथ्यों को संपूर्ण अध्ययन से संबंधित किया जाए तो उनका महत्वपूर्ण सामान्य अर्थ प्रकट हो सकता है, जिसके आधार पर घटना को प्रमाणित की जा सकती है।

 

इस कथन से तात्पर्य है कि अनुसंधान या शोधकार्य में केवल तथ्यों को एकत्र कर लेने से ही अध्ययन स्पष्ट नहीं हो जाता तब तक कि उन तथ्यों का वर्गीकरण व सारणीयन करने से बिखरे हुए तथ्यों के ढेर को एक क्रमबद्ध व संक्षिप्त रूप नहीं मिल जाता है जिसके कारण उन्हें सरलता से समझा जा सकता है। सारणीयन की योजना अंतिम रूप में सामग्री के संकलन के 42 चात् निश्चित होती है। वास्तव में इसी के द्वारा घटनाओं की व्याख्या, विवरण तथा तुलना के लिए तथ्यों का संकलन, वर्गीकरण व सारणीयन किया जाता है। शोधार्थी ने इनको लक्ष्यानुसार विश्लेषण करने के लिए सारणी में वर्गीकृत किया है।

 

सारणीयन द्वारा आंकडों में सरलता तथा स्पष्टता आती है तथा वर्णनात्मक और अधिक व्यवस्थित होकर प्रदर्शन के योग्य बन जाते हैं। इसके अंतर्गत आंकडों को विभिन्न स्तम्भों तथा पंक्तियों में प्रस्तुत कर सकते हैं जिससे समझने में सुविधा हो जाती है।

इसलिए शोधकर्ता ने अपनी तथ्यांक सामग्री को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने तथा उसका विश्लेषण और व्याख्या करने का प्रयास भी किया है।

 

विश्लेषण तथा व्याख्या के लिए शर्तें-

शोधकर्ता को अपनी अन्तर्दृष्टि को स्पष्ट रखना चाहिए।

एक आलोचनात्मक एवं अनुशासित कल्पना शक्ति का विकास किया जाना चाहिए।

1. पक्षपातों एवं मिथ्या सुझावों से स्वयं को दूर रखना चाहिए।

 

तथ्यों के विश्लेषण एवं व्याख्या के लिए आवश्यक तैयारियां-

सूचनाओं को क्रम से लगाया।

1. उत्तरों की जांच।

2. अनावश्यक तथ्यों को हटा दिया, केवल वांछित सामग्री ही विश्लेषण किया गया।

 

तथ्यों का वर्गीकरण

समग्र तथ्यों के विस्तृत तथा ठोस वर्गीकरण पर ही बहुत कुछ अध्ययन की प्रभावशीलता एवं मूल्य निर्भर करता है। तथ्यों का वर्गीकरण होने से उनकी तुलना, उनमें जाने वाली समानाताओं व भिन्नताओं तथा पारस्परिक संबंधों का ज्ञान हो जाता है। अतः तथ्यों का विश्लेषण व्याख्या की आत्मा है। अगर अव्यवस्थित तथा बिखरे हुए आंकडे होगें तो व्यावहारिक रूप में ना विश्लेषण किया जा सकेगा और ना ही निष्कर्ष निकालना संभव हो सकेगा। अतः संभव बनाने के लिए शोधकर्ता ने तथ्यों के ढेर को व्यवस्थित व क्रमबद्ध रूप प्रदान किया है।

 

तथ्यों का सारणीयन

शोधकर्ता ने तथ्यों को इस ढंग से सारणी में व्यवस्थित किया कि उनकी तुलनात्मक अध्ययन सफलतापूर्वक किया जा सके।

 

सांख्यिकी विश्लेषण में प्रयुक्त प्रविधि-

शोधकर्ता ने प्रदत्तों के विश्लेषण में निम्नलिखित सांख्यिकीय प्रविधियों का सहारा लिया है।

मध्यमान

प्रामाणिक विचलन

टी परीक्षण

काई वर्ग परीक्षण

 

छात्र-छात्राओं की पर्यावरण संबंधी अवधारणा को प्रदर्शित करती तालिका

तालिका संख्या-1

समूह संख्या मध्यमान मानक विचलन ज. मान सार्थकता स्तर

छात्र 60 40 10.7 4.83 .01 =2.63

छात्राऐं 60 30 13.7 .05=1.98

क ित्र द1 ़ द2. 2

त्र 6060 . 2 त्र 118

 

उपरोक्त तालिका संख्या-1, चित्र -1एवं चित्र-2,बी.एस.टी.सी. के छात्र छात्रा की पर्यावरण अवधारणा से संबंधित है। क ित्र 118 का टी तालिका मूल्य .05 एवं .01 स्तर पर क्रमशः 1.98 एवं 2.63 है। गणना करने पर टी का मूल्य 4.83 प्राप्त हुआ। यह मूल्य टी तालिका मूल्य के दोनों ही स्तरों से अधिक है। अतः निराकरणीय परिकल्पना बी.एस.टी.सी. के छात्र एवं छात्रा प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण संबंधी अवधारणा के मध्यमानों में सार्थक अंतर नहीं है, को अस्वीकृत किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि बी.एस.टी.सी. में अध्ययनरत् छात्र व छात्राओं के पर्यावरण संबंधी अवधारणा में समानताऐं नहीं है।

 

आगे तालिका के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि दोनों ही समूहों के मध्यमान 40 30 हैं। मध्यमान यह स्पष्ट करते हैं कि बी.एस.टी.सी. के छात्र वनों की कटाई के संबंध में, जल प्रदूषण के संबंध में, वायु की शुद्धता के संबंध में एवं पहाडों के खनन के संबंध में छात्र छात्राओं की तुलना में अधिक सजग है।

 

चित्र -1

 

चित्र-2

 

साहू, के.सी. (1992), इनके शोध पर्यावरण शिक्षा की धारणाओं व नियमों का समालोचनात्मक अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य निम्न थे-पर्यावरण की धारणाओं व संघटकों का अध्ययन करना।पर्यावरण-मनुष्य संबंधों का अध्ययन करना।पर्यावरण की प्रगति व सुधार का अध्ययन करना।इस अध्ययन से निम्न निष्कर्ष प्राप्त किये गये-

पर्यावरण की अवधारणा मुख्य रूप से प्राकृतिक व मानव निर्मित में विभक्त है।

वनस्पति व पशु-जगत जैविक पर्यावरण के घटक हैं।

वायुमण्डल, जल मण्डल, थल मण्डल जैविक पर्यावरण के घटक हैं।

 

प्रहराज, बी. (1991) ने माध्यमिक स्कूला के सेवारत व सेवापूर्व शिक्षकों की पर्यावरण जागरूकता व पर्यावरणीय अभिवृत्ति का अध्ययन किया।इस अध्ययन के मुख्य उद्देश्य माध्यमिक स्कूलों में सेवारत व सेवापूर्व शिक्षकों में पर्यावरण के प्रति जानकारी व अभिवृत्ति का स्तर ज्ञात करना था। इन्होंने अपने अध्ययन में उडीसा के पुरी जिले के 50 माध्यमिक विद्यालयों के 302 सेवारत शिक्षक व 3 शिक्षक-प्रशिक्षण महाविद्यालयों के 416 सेवापूर्व शिक्षक लिए।इन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि सेवापूर्व शिक्षकों की तुलना में सेवारत शिक्षकों की पर्यावरण के प्रति अभिवृत्ति अधिक है।

 

भारत एवं ईरान के उच्च प्राथमिक कक्षा के शिक्षकों के बीच पर्यावरण अभिवृत्ति का एक प्रयोगात्मक अध्ययन (2008) मरियम लर्जानी एवं यशोधरा, शिक्षा विभाग मैसूर, वि.वि.। उद्देश्य भारत एवं ईरान के उच्च प्राथमिक स्तर के शिक्षक एवं शिक्षिकाओं की पर्यावरण (स्वास्थ्य एवं स्वच्छता, वाइल्ड लाईफ, वन, पर्यावरण प्रदूषक जनसंख्या विस्फोटक) वन्यजीव संबंधी अभिवृत्ति का अध्ययन करना।निष्कष अध्ययन में निम्न निष्कर्ष निकलकर सामने आये।ईरानी शिक्षकों की पर्यावरण के प्रति अनुकूल अभिवृत्ति थी।

 

भारतीय शिक्षकों की वन्यजीव पर्यावरण के प्रति अनुकूल अभिवृत्ति थी अन्य विषयों की अपेक्षा।

शहनवाज (1990) ने अपने अध्ययन माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों व शिक्षकों में पर्यावरण जागरूकता व पर्यावरण अभिवृत्ति का अध्ययन में अध्यापकों व छात्रों की पर्यावरण के प्रति जागरूकता व अभिवृत्ति का अध्ययन किया। जिसमें शोधकर्ता ने निम्न उद्देश्य निर्धारित किये-

 

अध्यापकों व छात्रों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता को पहचानना व विकास करना।

अध्यापकों व छात्रों की पर्यावरण के प्रति जागरूकता को पहचानना व विकास करना।

पुरूष व महिला अध्यापकों व छात्र-छात्राओं में पर्यावरण के प्रति ज्ञान के अंतर को जानना।इस अध्ययन से निम्न निष्कर्ष प्राप्त किये गये-

 

95 प्रतिशत अध्यापकों व 94 प्रतिशत विद्यार्थियों की पर्यावरण के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति है।पर्यावरण प्रशिक्षित अध्यापकों व अप्रशिक्षित अध्यापकों में पर्यावरण के प्रति अभिवृत्ति में अंतर नहीं है।अध्यापकों में छात्रों के मुकाबले पर्यावरणीय जागरूकता अधिक है।महिलाओं में पुरूषों की अपेक्षा पर्यावरणीय जागरूकता अधिक पाई गई।

 

रोली, सबलोक (1990) ने जिला जबलपुर के हाई स्कूल के शिक्षकों तथा छात्रों की पर्यावरणीय जागरूकता और अभिवृत्ति के संबंध में अध्ययन किया और पाया कि-

 

लडकियों और लडकों की पर्यावरण जागरूकता व पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति अभिवृत्ति सार्थक रूप से भिन्न है।शहरी तथा ग्रामीण छात्रों में पर्यावरणीय जागरूकता में सार्थक अंतर है। शहरी छात्र ग्रामीण छात्रों की तुलना में अधिक जागरूक हैं।

 

जोशी (1991) ने उच्च माध्यमिक स्तर के वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं धार्मिक दृष्टिकोण वाले विद्यार्थियों की पर्यावरणीय चेतना का तुलनात्मक अध्ययन किया।इन्होंने शोध निष्कर्ष में यह पाया कि उच्च वैज्ञानिक अभिवृतित्त वाले विद्यार्थियों की पर्यावरण वाले विद्यार्थियों की पर्यावरण चेतना कम होती है अर्थात् धार्मिक चेतना से पर्यावरण चेतना का ऋणात्मक संबंध है।

 

दिलीप पटेल (2001), ने अपने शोध गुजरात के दांग जिले के प्राथमिक शिक्षकों की पर्यावरण जागरूकता का अध्ययन में जिले के प्राथमिक शिक्षकों की पर्यावरण के प्रति जागरूकता का अध्ययन में जिले के प्राथमिक शिक्षा की पर्यावरण के प्रति जागरूकता का अध्ययन किया। उन्होंने गुजरात के दांग जिले के 150 प्राथमिक शिक्षकों को स्तरीय आदर्श चयन के लिए छांटा। उनके अध्ययन का मुख्य उद्देश्य दांग जिले के प्राथमिक शिक्षकों के पर्यावरण जागरूकता के स्तर को ज्ञात करना तथा इसको प्रभावित करने वाले कारकों में अध्यापकों का अनुभव ओर उनको शैक्षिक, योग्यता के प्रभाव का अध्ययन करना था। इस अध्ययन मेें स्वंय निर्मित उपकरण का उपयोग करके आंकड़े एकत्रित किये गये। आंकड़ो के विश्लेषण के लिए टी-टेस्ट का उपयोग किया गया।निष्कर्ष दांग जिले के प्राथमिक शिक्षकों का जागरूकता स्तर बहुत ऊँचा था। पुरूष शिक्षकों का जागरूकता स्तर महिला शिक्षकों की अपेक्षा ऊँचा था।अधिक अनुभवी अध्यापकों का जागरूकता स्तर कम अनुभवी अध्यापकों से अधिक था।उच्च शिक्षित शिक्षकों का जागरूकता स्तर दूसरों की अपेक्षा अधिक था।

श्रीमती शकुन्तला (2006), ने बी.एस.टी.सी. प्रशिक्षणार्थियों के पर्यावरणीय जागरूकता स्तर का तुलनात्मक अध्ययन विषय पर शोधकार्य किया। शोध का प्रमुख उद्देश्य बी.एस.टी.सी. प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना था। इस शोध के मुख्य निष्कर्ष निम्न प्राप्त हुए-62 प्रतिशत बी.एस.टी.सी. प्रशिक्षणार्थियों का जागरूकता स्तर औसत है। 8 प्रतिशत जागरूकता स्तर निम्न है, 30 प्रतिशत बी.एस.टी.सी. प्रशिक्षणार्थियों का पर्यावरण जागरूकता स्तर उच्च है। पुरूष व महिला बी.एस.टी.सी. प्रशिक्षणार्थियों का पर्यावरणीय जागरूकता का स्तर समान है।

 

निष्कर्ष

1 .बी.एस.टी.सी. के छात्र एवं छात्रा शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों का गणना मूल्य तालिका मूल्य से कम है। अतः छात्र एवं छात्रा प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण संबंधी अवधारणा के स्तरों में भिन्नताएँ नहीं है।

2. बी.एस.टी.सी. के छात्र एवं छात्राओं की पर्यावरण संबंधी अवधारणा में सार्थक अंतर पाया गया। तथापि मध्यमानों की तुलना करने पर बी.एस.टी.सी. के छात्रों में पर्यावरण संबंधी अवधारणा स्तर अधिक पाया गया है।

 

शैक्षिक निहितार्थ

प्रस्तुत शोध समस्या के अन्तर्गत कुछ उद्देश्य निर्धारित किये गये थे, जिनमें प्रमुख थे- ग्रामीण एवं शहरी शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों (छात्र एवं छात्राओं) में तुलनात्मक रूप से यह पता लगाना कि उनमें पर्यावरण के प्रति कितनी अवधारणा, जागरूकता एवं ज्ञान है? क्या पर्यावरणय की शिक्षा ने उनमें पर्याप्त जागरूकता एवं अवधारणा विकसित की है या नहीं? जिससे वे अपने पर्यावरण के साथ समुचित व्यवहार करके प्राकृतिक संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग कर सकते हो।

 

अध्यापकों को पर्यावरणीय शिक्षा का विधिवत् सेवाकालीन प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए एवं प्रशिक्षण में अनेक विषयों के अध्यापकों को शामिल करना चाहिए ताकि वह अपाने अपने विषयों के माध्यम से पर्यावरण चेतना के साथ न्याय कर सकें। कक्षा में इस विषय पर चर्चाएँ करायी जानी चाहिए। जब बालकों द्वारा स्वंय किसी समस्या विषय पर चर्चा की जाती है तो समस्या एवं समाधान के नये आयाम निकलकर सामने आते है। इसके अतिरिक्त सुन्दर प्राकृतिक स्थानों के भ्रमण द्वारा भी छात्रों को प्रकृति संतुलन से अवगत कराया जा सकता है और उन्हें प्रकृति को विनष्ट होने से बचाने की ओर प्रेरित किया जा सकता है।

 

परिसीमाएँ

1. बी.एस.टी.सी. में अध्ययनरत शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों के पर्यावरण संबंधी अवधारणा का ही अध्ययन किया गया है।

2. न्यादर्श के रूप में 120 शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों का चयन किया गया है।

3. तथ्यों के संकलन के लिये सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया है।

4. उपकरण में पर्यावरण अवधारणा ज्ञात करने के लिए एस.के. बाबा द्वारा निर्मित उपलब्धि परीक्षण का प्रयोग किया गया है।

5. सांख्यिकी में टी परीक्षण व काई वर्ग परीक्षण का प्रयोग किया गया है।

 

सारांशतः शिक्षा जगत में प्रस्ताविध शोध का निम्नलिखित योगदान हो सकता है।

1. पर्यावरण के प्रति जागरूकता के मापन के माध्यम से न केवल बी.एस.टी.सी. स्तर के विद्यार्थियों में पर्यावरणीय रूचि तथा जिज्ञासा उत्पन्न की जा सकती है, बल्कि उनके भावी जीवन में पर्यावरण संबंधी समस्याओं के समाधान हेतु वनों के महत्व को भी समझाया जाना प्रभावी होगा।

2. पर्यावरण शिक्षा के विभिन्न स्तरों के पाठ्यक्रमों में समाहित कर छात्रों को पर्यावरण के प्रति समालोचक प्रवृत्ति प्रदान करना उपयुक्त होगा।

3. पर्यावरणीय बोध के माध्यम से समाज के सभी वर्गो को पर्यावरण के संरक्षण एवं विकास हेतु जागरूक बनाया जाना वांछनीय होगा।

4. इस अध्ययन के द्वारा समाज के बड़े, मध्यम तथा निम्न वर्गो में एक नयी संस्कृति पर्यावरणीय संरक्षण संस्कृति का विकास किया जाना प्रभावी होगा।

5. पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिए विकल्पों का प्रयोग छात्रों े द्वारा कराया जा सकता है (जैसे-विद्यालय में प्रोजक्ट सेमीनार, सर्वेक्षण आदि आयोजित करना।)

6. अपनी परंपरा से जुड़कर प्रदूषण उद्योग, चिकित्सा रहन-सहन, स्वास्थ्य आदि अनेकानेक समस्याओं को पर्यावरणीय बोध के माध्यम से पूर्ण करना उपयुक्त होगा।

7. पर्यावरण को स्वार्थ सिद्ध हेतु विनिष्ट करने वाले लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता का मापन करके उनमें नयी चेतना का विकास करना परिणामस्वरूप होगा।

8. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदूषण फैलाने वाले विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों पर आरोप लगाने का तर्कयुक्त प्रत्युत्तर देने व समाधान करने में सहायता करना उपयुक्त होगा।

 

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Received on 04.04.2013

Revised on 25.05.2013

Accepted on 12.06.2013

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Research J. Humanities and Social Sciences. 4(3): July-September, 2013, 361-366