भारत में आंतरिक हिंसा के सामाजिक-राजनैतिक कारणः एक मानवशास्त्रीय विमर्श

 

जितेन्द्र कुमार प्रेमी1 एवं महेन्द्र कुमार प्रेमी2              

1असिस्टेंट प्रोफेसर, मानवविज्ञान अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़ 492010

2शोध-छात्र (पीएच. डी.), दर्शनशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़ 492010

 

सारांश

भारत में धार्मिक मान्यताओं के आधार पर लोगों को बाॅटकर उन पर शासन करने की नीति कोई नई नहीं है। अंग्रेजों ने तो इस नीति के बल पर कोई 200 वर्षो तक भारत पर राज किया किन्तु जिन्होने इस विष वृक्ष को रोपा था वे भारत पर लगभग 2000 वर्षांें तक अपना प्रभुत्व जमाये रहे। अब जब संविधान के द्वारा उक्त पाखंडतावाद को नकार दिया गया है, ऐसी स्थिति में इन ताकतों ने भारत के धार्मिक सौहार्द पर हमला बोलते हएु ; लोगों मे धार्मिक उन्माद पैदा कर, मासूम लोगों की चिता की आग से अपनी राजनीतिक रोटियाॅ सेेंककर ; सत्ता की मलाई खा रहे हंै। परिणामतः भारत की आंतरिक शांति छिन्न-भिन्न होती जा रही है। इसकी बानगी इस बात से जाहिर होती है कि बाबरी विध्वंस के बाद से लेकर अब तक लगभग 100 आतंकी हमले भारत में हो चुके हंै।

 

भारत में जिस समुदाय के साथ हजारों सालों से धार्मिक कारणों से अन्याय और अत्याचार होते रहे हंै उनकी सामाजिक दशा आज भी जस की तस बनी हुई है। फलतः ये समुदाय अब जब किसी गैर धर्म के प्रति अपनी आस्था प्रगट करते हुए अपनी सामाजिक स्थिति उन्नत करना चाहते हंै तो उड़ीसा के कंधमाल जैसे अमानवीय घटनायों से मानवता तार-तार हो जाता है। आप अपने समाज में तो इन्हे बराबरी का दर्जा देते नहीं; और जब कोई दूसरा इनको गले लगाना चाहता है तो इनका क्रोध इन पर कहर बनकर बरसता है। ऐसे कृत्य इस देश की धर्मनिर्पेक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हंै।

 

कुछ ऐसी ही स्थिति इस धरा के आदिवासियों की है, अंग्रेजों के आगमन के पूर्व ये अपने प्राकृतिक पर्यावास में अपनी संस्कृति के बल पर शांति और संतुष्टि का जीवन जी रहे थें किन्तु अंग्रेजों के आगमन के पश्चात् इन्हे जल, जंगल और जमीन से बेदखल कर इनपर अत्याचार और शोशण की एक अंतहीन प्रक्रिया प्रारंभ हो गयी जो बदस्तूर आज भी जारी है। परिणामतः इस समाज में माओवादी विचारधारा अपनी पैठ जमा चुकी है जिसकी फांस इतनी गहरी है कि यह समाज छटपटा भी नहीं पा रहा है । एक तरफ तो माओवादियों का आतंक तो दूसरी ओर सरकारी तंत्र्ा का आतंक, आखिर ये निरीह आदिवासी जाये तो जाये कहाॅ?

 

ग्रामीण भारत की भी स्थिति इनसे कुछ अलग नहीं है, किसानों की आत्महत्या की घटनायें ग्रामीण भारत की भयावह तस्वीर दिखाने के लिये पर्याप्त हंै। अंग्रेजीयत का बोलबाला दिनोदिन बढ़ते जा रहा है, शिक्षा पर सामंतवादी बाजारू व्यवस्था हावी हो चुकी है। जहाॅ एक ओर पंचसितारा पाठशालाओं में अंग्रेजी माध्यम से पढ़े नागरिक जो सभी सरकारी और गैरसरकारी अवसरों पर कुण्डली मारे बैठे हैं तो दूसरी ओर टिन-टप्पर के स्कूलों में पढने वाले हिन्दीधारी छात्र जो प्रतिभा संपन्न होते हुए भी मायूसी के साये में बेरोजगार घूमने अभिशप्त हंै। निष्कर्षतः उपर्युक्त उद्धृत परिस्थितियों में समय रहते बदलाव नहीं हुआ तो भारत की आंतरिक शांति को इसके गंभीर परिणाम भोगने पड़ सकते हंै। जरूरत इस बात की है कि इन समस्याओं के उन्मूलन के संबंध में सर्वकालिक ठोस उपाय तलाशने होगें जिसकी चर्चा इस शोध आलेख में विस्तार से की गयी है।

 

प्रस्तावना

धरती पर मानव सभ्यता के प्रादुर्भाव के पूर्व से लेकर आज पर्यन्त तक मानव समाज में हिंसा की अटूट परम्परा चली आ रही है, किन्तु यह उद्द्यृत करना आवश्यक है कि सभ्य या असभ्य मानव समाज की स्थापना का केन्द्र बिन्दू हिंसा मुक्त समाज की कल्पना ही है, और यही न्यायोचित भी है। निश्चित रूप  से हिंसा रहित मानव समाज ही एक सभ्य समाज का दर्जा पा सकता है। यद्यपि सभ्यता के अनेकानेक सिद्धांत व अवधारणा विद्मान हंै, उदाहरणार्थ मानवशास्त्रीय सिद्धांतो के अनुसार लिपि के ज्ञान की खोज को प्रसिद्ध अमेरिकन मानवशास्त्रीय मार्गन (1877) नेे सभ्यता की अनिवार्यता सिद्ध किया था। कई और समाज वैज्ञानिक इसे भौतिक वैभव या भौतिक विकासवाद जैसे-नगरीकरण, ©द्य®गिकीकरण इत्यादि के साथ जोड़कर देखते हंै वहीं इतिहासकार इसे लौह आवष्किार,मशीनिकरण इत्यादि  से जोड़कर देखते हैं।

 

सभ्यता संबंधी चाहे कोई भी अवधारणा या सिद्धान्त तब तक पूर्ण नहीं मानी जायेगीं जब तक उसमें हिंसा रहित सामाजिक व्यवस्था की अनिवार्यता न जोड़ी जाए। किन्तु अब यहाॅ यह सवाल उठता है कि क्या कभी मानव समाज हिंसा रहित हो सकता है या हो गया है या हो रहा है ? इस कथन का जवाब शायद कोई नहीं दे सकता, इस संदर्भ में केवल आशावादी हुआ  जा सकता है। जैसा कि हम जानते हैं कि मानव स्वभाव से एक प्राणी या जन्तु या दूसरे शब्दों में कहें तो एक जानवर है किन्तु यह जानवर अन्य जानवरों के मुकाबले बिलकूल अलग है क्योंकि इनके पास लाखों वर्षांे के सांस्कृतिक प्रयासांे से प्राप्त  पाँच विलक्षण शारीरिक विशेषताएँ हैं जो किसी अन्य जानवरों के पास नहीं हैं। इनमें हैं -सीधें खड़े होने की स्थिति, स्वतंत्रता पूर्वक घूमाये जा सकने वाले हाथ(इसमें अँगूठे की विशिश्ट स्थिति), तीक्ष्ण एवं केन्द्रित की जा सकने वाली दृष्टि, मेघावी मस्तिष्क और बोलने, लिखने या उसे  से संचरित करने की क्षमता। इन्ही पाँच अद्भूत शारीरिक विशिश्टिताओं के परिणामस्वरूप मानव संस्कृति का निर्माता हो सका और धरती पर केवल वह ऐसा अकेला प्राणी है जिसके पास संस्कृति है। इसी अर्थ में मानव को ’’सामाजिक प्राणी’’ चूंकि अब और कई अन्य सामाजिक प्राणियों की खोज हो चुके हंै तो अब मानव को ही ’’ सामाजिक - सांस्कृतिक प्राणी’’ कहा जाने लगा है, या उसें केवल  सांस्कृतिक प्राणी’’ कहा जा सकता है।

 

यह सर्वमान्य तथ्य है कि मानव अपनी समस्त गतिविधियाँ सांस्कृतिक संदर्भ में करता है; अर्थात उसे भूख मिटाने के लिए श्रम करना पड़ता है, निवास के लिए घर बनाना पड़ता है, यौन गतिविधियों के नियमन तथा संतति जनन के लिए विवाह करना पड़ता है। इन सभी गतिविधियों को मानव अहिंसात्मक तरीके से पूरा करता है जबकि इसके ठीक विपरीत मानव के अतिरिक्त अन्य प्राणी अपनी उपरोक्त आवश्यकता की पूर्ति हेतु हिंसा का सहारा लेता है जिसकी व्याख्या हम डार्विन (1859) के सिंद्धान्त “नेचुरल सेलेक्शन“ में देखते हैं। प्रसिद्ध शास्त्रीय उद्विकासवादी मानवशास्त्री हरबर्ट स्पेन्सर  (1864) डार्विन के नेचुरल सलेक्शन के सिद्धान्त केा मानव समाज के लिए भी उपयुक्त मानते हुए अपने सामाजिक उद्विकास की अवधारणा में कहतेे हैं कि मानवता, समाजवाद और समानतावाद के नाम पर समाज के कमजोर वर्गांे को आर्थिक-सामाजिक  सहायता दिया जाना मानव विकास के प्राकृतिक प्रक्रिया में बाधा डालने जैसा है। स्पेन्सर महोदय के उपरोक्त विचार सभ्य जगत के लिए निश्चित  तौर पर अस्वीकार्य ह®गा। चूंकि डार्विन का उद्विकास का सिद्धान्त सम्पूर्ण प्राणी जगत के लिए है जहाॅ सभ्यता अथवा संस्कृति जैसे साधनों के लिए कोई स्थान नहीं है वहाॅ शरीर ही साधन है और शरीर ही साध्य जबकि मानव समाज में संस्कृति साधन है और समाज साध्य। उदाहरण के लिए मनुष्य को भूख लगने पर किसी माँसाहारी जानवर की भाॅंति दूसरे प्राणी का आखेट नहीं कर सकता अथवा दूसरे मानव की संपत्ति छिन नही सकता ; इसके लिए उसे समाज के मान्य रीति-रिवाजो, प्रथाओं-परम्पराओं, नियमों, कानूनो तथा उपलब्ध और मान्य भौतिक साधनों द्वारा श्रम करना पड़ता है; इसे ही सांस्कृतिकक संदर्भ कहा जाता है। संस्कृति का परिष्कृत और परिपक्व स्वरूप ही सभ्यता है जिसके अहिंसा, समानता, और बन्धुत्व प्रमुख अनिवार्यताएँ हैैं।

 

यदि मानव सभ्यता के इतिहास पर नजर डालंे तो पता चलता है कि जैसे-जैसे मानव सभ्य होते गया वैसे-वैसे उसकी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में  अहिंसात्मक (प्रवृत्तियाॅ) गतिविधियां बढ़ती गयी। प्र्रारंभ में मानव को भोजन प्राप्त करने के लिए जानवरों का आखेट करना पड़ता था, आपस में लड़ना पड़ता था, यौन इच्छा की पूर्ति के लिए भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता था, दूसरे शब्दों में हिंसा का सहारा लेना पड़ता था इत्यादि। जैसे-जैसे वह सभ्य होते गया वह अपनी सभी आवश्यकताआंे की पूर्ति सांस्कृतिक संदर्भ में करता गया और हिंसात्मकता धीरे-धीरे क्षीण होते गयी, तब मानव समाज शनैः-शनैः सभ्य कहा जाने लगा। स्पेन्सर जैसे विचारधारा के कुछ लोग समाज में आज भी मौजूद हंै तथा इनकी संख्या लगातार बढ़ते जा रही है जो विकास के नाम पर समानता , बन्धुत्व, मानवता और अहिंसा को निरर्थक मानते हंै। यहीं कारण है कि ऐसे विचारधारा के लोग अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सभ्यता मूलक उपर्युक्त उद्द्यृत अनिवार्यताओं को मान्यता न देते हुए, अपने आप को तथा कथित सभ्य कहे जाने वाले ये लोग पाखण्डपूर्वक अहिंसा का स्वांग रचकर मानवता की छाती तार-तार कर ; अपने उद्देश्यों को पूरा करते हुए सम्पूर्ण मानव समाज को पाश्विकता की ओर पुनः धकेल रहें हैं।

 

उपर्युक्त चर्चा उपरांत अब यहाॅ यह स्पष्ट करना उचित होगा कि आखिर हिंसा क्या है ? इसकी क्या परिधि है ?/ इसकी पहचान क्या है ? इसे इस तरह समझा जा सकता हैः

 

हिंसा की अवधारणा

हिंसा के विविध आयामों के अनुसार वर्तमान भारत में कई तरह की  हिंसात्मक प्रवृत्तियाँ दिनो-दिन उत्तरोत्तर होते जा रही है। सरलता की दृष्टि से मेरे विचार से इसे हम निम्न वर्गांे में बाॅट सकते हैं जो एक दूसरे के पूरक आयाम है। उनमें प्रमुख हैं-  

 

सामाजिक हिंसा, आर्थिक हिंसा, राजनैतिक हिंसा और मानसिक हिंसा इन सब का सहचरी आयाम है, शारीरिक हिंसा ।  उपर्युक्त हिंसा के सभी आयामों क¨ मन, वचन एवं कर्म के रूप ब्यक्त किया जाता है। इसे हम एक प्रवाह आरेख से इस प्रकार समझ सकते हंै।

 

च्ूंकि वर्तमान श¨ध आलेख का मूल उद्देश्य हिंसा की व्याख्या करना नहीं है अतः इस पर ज्यादा चर्चा करना उचित नहीं होगा। फिर भी इस प्रवाह आरेख की मुख्य बिन्दुओं की संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार कर सकते हैंः सभी प्रकार की ंिहंसा के केन्द्र में हमेशा आर्थिक कारण ही होते हैं इसलिए इस आरेख में आर्थिक हिंसा को ज्यादा स्थान दिया गया है। अधिकाधिक आर्थिक उन्नति हेतु मानव समाज राजनीति का सहारा लेता है, राजनीति में सफलता के लिए सामाजिक विखण्डन अथवा सामाजिक एकता पर विचार करता है। वस्तुतः सामाजिक हिंसा को बढ़ावा देना, जो कि कई तरह के असंतोश को जन्म देता है तथा जो कालान्तर में हिंसा के विविध  रूप¨ं में प्रस्फुटित होते हंै।

 

भारत में आंतरिक हिंसाः एक सूक्ष्म दृश्टि

वर्तमान  भारत में व्याप्त समस्त प्रकार के आंतरिक हिंसा के विविध स्वरूपों को हम उपर्युक्त उद्द्यृत हिंसा की अवधारणा से समझ सकते हैं। आज भारत के आंतरिक हिस्सों में हिंसा के मूल स्त्रोत आर्थिक-राजनैतिक ही हंै। ‘‘आर्थिक आवश्यकता की पूर्ति संबंधी स्वेच्छाधारिता ही हिंसा को जन्म देती है, इसके लिए मनुष्य कल-बल-छल का प्रयोग करता है; कल से आशातित सफलता नहीं मिलने पर बल और बल में पूर्ण सफलता नहीं मिलने पर छल का सहारा लेना मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है और हिंसा की जननी भी।‘‘

 

भारत वर्ष की पारिस्थितिकीय वैभव विश्व के समस्त मानव जाति के आकर्षण का केन्द्र रहा है और यही कारण है कि यहाँ आर्य से लेकर यमन, हूण़, शक, कुशाण, तुर्क, अरब (मुगल), डच, पुर्तगाली, फ्राँसिसी और अंग्रेज तक की आक्रमण की एक थका देने वाली लंबी गाथा है, जो शायद विश्व में अस्तित्वशील किसी भी देश के लिए दुःस्वप्न की तरह है। जब इतने तरह के लोग यहाॅ आयेंगे तो स्वाभाविक है हिंसा का स्वरूप भी भयकर से भयंकर  और क्रूर से कुरतम हो सकता है। भारत का इतिहास इसका साक्षी है, जितनीे तरह की हिंसा का स्वरूप भारत में व्याप्त थी या आज व्याप्त है, विश्व में शायद ही कोई कोना ऐसा होगा जहाॅ इतनीे तरह की हिंसा के आयाम पाये जाते ह¨। स्वाभाविक है कि किसी एक आलेख  में इन सबकी व्याख्या संभव हो सके। यही कारण है कि वर्तमान आलेख में वर्तमान समय में भारत में व्याप्त कुछ अति ज्वलंत हिंसात्मक गतिविधियों की ओर ध्यान खींचने की कोशिश की है। जिन्हे हम इस प्रकार देख सकते हंै-

 

(1) सांप्रदायिक हिंसा

भारत में धार्मिक मान्यताओं के आधार पर लोगों को बाॅटकर उन पर शासन करने की परम्परा कोई नहीं नहीं है। उत्तर वैदिक काल के पश्चात इस तरह की कुत्सित प्रवृत्ति में उत्तरोत्तर बढ़ोत्तरी होती चली गयी जिसका परिणाम यह हुआ की इस देश का बहुसंख्यक समाज तात्कालिक अल्पसंख्यक लोगों के बुने जाल में फॅसकर जातिगत ऊॅच-नीच जैसे दकियानूसी अमानुषिक विचारों के उन्माद में आपस में लड़ते रहे; जबकि दूसरा तात्कालिक अल्पसंख्यक वर्ग बिना किसी शारीरिक परिश्रम के अकूत धन -संपदा और ऐश्वर्य अर्जित करते रहे। कालान्तर में अॅग्रेजों ने भारतीय समाज में व्याप्त इसी तरह की दुरभावनाओं को अपना हथियार बनाकर कोई 200 वर्षो तक भारत में राज करते रहे।

 

वास्तव में यह नीति कोई नयी नही थी, अॅग्रेजो ने तो इस नीति के बल पर केवल 200 वर्षो तक भारत मंे शासन किया किन्तु जिन लोगों ने इस विष वृक्ष को रोपा था वे भारत में लगभग 2000 वर्शांे तक राज करते रहे। अब जब भारत एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी देश के रूप में स्थापित हो चुका है, जहाॅ संविधान के द्वारा लोगांे को बाँटने वाले विचारों को नकार दिया गया है। ‘‘ऐसी स्थिति में इन अलगाववादी ताकतों ने भारत के धार्मिक सौहार्द पर हमला बोलते हुए लोगों में धार्मिक उन्माद पैदा कर, दंगे फसाद कराकर, मासूम लोगों की चिता की आग से अपनी राजनितिक रोटिया पकाकर, सत्ता की मलाई खा रहे हैं।‘‘ परिणामस्वरूप ऐसे ताकतों के दुष्कृत्यो से  भारत की आंतरिक शांति छिन्न-भिन्न होते जा रही है । इसकी बानगी इस बात से पता चलता है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंश के बाद से लेकर अब तक भारत में लगभग 100 जिहादी आतंकी हमले हो चुके हंै। जिससे इस देश के हजारो लोगों की जिंदगियाॅं छिन गई और उनके घर -बार वाले अनाथो और लाचारी की जिंदगी जीने को मजबूर हो गये हैं।

 

भारत में सांप्रदायिक हिंसा जिसे हम धार्मिक हिंसा के नाम से भी जानते हैं कि नींव तब पड़ी जब देश में अंग्रेजों के विरूद्ध स्वतंत्रता का आंदोलन बहुत तेज हो गया था और ऐसा प्रतीत हो रहा था  कि अब-तब अंग्रेज भारत को स्वतंत्र कर देंगे।  इस समय देश में सदियों से साथ-साथ, अपने-अपने धार्मिक दायरे में हिन्दू-मुस्लिम समुदाय शांतिपूर्वक सहजीविता निभा रहे थे ( यद्यपि बीच-बीच में औरंगजेब जैसे कुछ शासकांे ने भारत की पारंपरिक धर्मनिपेक्षता पर आघात करते रहे हैं ), बिना किसी खून-खराबा के भारत के दोनों बड़े सम्प्रदाय एक- दूसरे के सहअस्तित्व का सम्मान करते रहे हंै। किन्तु आजादी के कुछ दशक पूर्व भारत में कुछ ऐसेे धार्मिक संगठन उठ खड़े हुए जिनका दो प्रमुख उ६ेश्य था एक पाखण्डवाद के बल पर अतार्किक असमानतामूलक पारंपरिक प्राचीन मान्यताअ¨ं को पुर्नजीवित करना तथा दूसरा धर्म विश¢ष क¢ (अल्पसंख्यक) लोगों को अवश्यंभावी सत्ता या आजादी के अमृत का रसपान से वंचित रखना। परिणामस्वरूप धार्मिक अलगाववादी सोच¨ं का जन्म अ©र विकास, फिर भारत का विभाजन, और रूह कपा देने वाली बँटवारे के दौरान हुई खूनी मजहबी हिंसा । समय बितता गया जख्म भरते गये और फिर ऐसा लगने लगा कि अब सब ठीक-ठाक चल रहा है। तभी तथाकथिक राश्ट्रभक्त¨ंें को उनके पैर तले जमीन खिसकने की आहट सुनाई देने लगी, उनका राजनैतिक और सामाजिक वर्चस्व धीरे-धीरे क्षीण होने लगा तब वे जो स्वयं ऐतिहासिक रूप से कभी परदेशी थे (ब्रायन्ट, 2001) इतिहास की जड़े खोदने प्रारंभ कर अपनी राजनीति चमकाने लगे।

 

अन्तत्वोगत्वा भारत की अर्धसाक्षर धर्मभिरू भावुक जनता इनके बुने जाल में फॅंस गयी और  6 दिसंबर 1992 को अयोध्या का विवादित बाबरी मस्जिद ढहा दिया गया। बँटवारे के दिनों के बिसरे कड़वे घाव से फिर लहू बहने लगा और एक बार फिर भारत सांप्रदायिकता के आग में झूलसने लगा। इसके बाद मुम्बई, कोलकाता, जम्मू, दिल्ली, वाराणसी (द टाईम्स आॅफ इण्डिया ,2008) जैसे देश के ऊर्जादायी बड़े शहर सांप्रदायिक हिंसा से लहू-लूहान होते रहे । इसी बीच गोधरा जैसी घटना, फिर बेस्ट बेकरी जैसी जघन्य सांम्प्रदायिक हिंसा रूपी राक्षस के पंजे भारत के कोने-कोने में फैलने लगे। नये-नये हिंसावादी सांप्रादियक संगठन विकसित होनेे लगे जिसमें वे युवा भी शामिल हो गये जो कि कभी आईटी इंजीनियर या डाक्टर या प्रतिष्ठित व्ययसायी  बनने का सपना देख रहे थे। इस तरह अब भारत में सांप्रदायिक हिंसा का स्वरूप और भी भयावह हो गया है, क्योंकि कल तक ऐसा समझा जाता है कि इसमें कुछ कम शिक्षित जूनूनी लोग सम्मिलित होते ह¨ंगे किन्तु आज ऐसा नहीं है। सांप्रदायिक हिंसक संगठनों में उच्च शिक्षित युवाओं का जुड़ना भारत की आंतरिक शांति के लिए गंभीर खतरा है। अतः इस तरह की हिंसात्मक गतिविधियों को भारत से समूल नष्ट करने के लिए कुछ कठिन एवं कड़े कदम उठाने होगे। मेरे विचार से वे कदम कुछ इस तरह के हो सकते हंै-

1.   ऐसा कोई भी गैर राजनैतिक अथवा राजनैतिक संगठन जो किसी धर्म के आधार पर संगठित हो और जिस पर यह संदेह हो कि उसकी गतिविधियाॅ देश के धार्मिक सौहार्द एवं धर्म निरपेक्षता के लिए चुनौतियों खड़ी कर सकती हैं, ऐसे संगठन चाहे किसी भी धर्म से संबंधित हो, उन सभी ऐसे संगठनों पर कम से कम 10 वर्षांे के लिए कठोर प्रतिबंध लगा देना चाहिए तथा इनके कार्यालयों, प्रशिक्षणाालयो एवं प्रतिश्ठानों को सील कर देना चाहिए।

 

2.   चूंकि मानव विकास का इतिहास इसका गवाह है कि आज पूरे विश्व के संपूर्ण मानव समुदाय जो वे आज जहाॅ हैं वे वहाॅ पहले नहीं थे, तात्पर्य कोई 100 साल तो कोई 1000 वर्ष पूर्व किसी अन्यत्र स्थानों से प्रवासित हुए हंै। अतः ऐसी बातो पर चर्चा करना कि फलां जाति या धर्म, संप्रदाय या देश ने फलां स्थान पर चढ़ाई की या फलां स्थान से आव्रजक है; वर्तमान संदर्भ में निरर्थक है। अतः ऐसे विवादित ऐतिहासिक विषयों पर सार्वजनिक या राजनैतिक चर्चाओं एवं लेखन पर पूर्णतः रोक लगाने संबंधी कठोर कानून बनाने चाहिए। साथ ही साथ यदि अतिआवश्यक न हो तो अकादमिक समुदाय को भी ऐसी चर्चाओं एवं प्रकाशनों से बचना चाहिए। जबकि हमारे पास ऐसे मुद्दो के अलावा गरीबी, असमानता, अशिक्षा पिछड़ापन, स्वास्थ्य, पर्यावरण इत्यादि जैसे अति महत्वपूर्ण मानवतावादी मुद्दे जीवित हंै।

 

3.   विवादित धार्मिक स्थलों, भवनों, घाटो अथवा प्रस्तरो इत्यादि के संबंध में किसी भी प्रकार के निर्णय लेने से राज्य अ©र केन्द्र सरकार को बचना चाहिए। इसका निर्णय माननीय न्यायालयों के माध्यम से शीघ्रताशीघ्र कराया जाना चाहिए। न्यायालयों के निर्णयों की अवहेलना करने या उसके विरूद्ध बोलने वालों के विरूद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही करने का प्रावधान बनाया जाना चाहिए।

4.   केन्द्र एवं राज्य सरकार कानूनी रूप से कटिबद्ध हो जाए कि वे किसी भी प्रकार के धार्मिक आयोजनों जैसे पूजा-पाठों, जूलूसों, उत्सवों, यात्राआ,ें धार्मिक स्थानों या भवनों के विकास या निमार्ण पर परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सरकारी आर्थिक सहायता  न दे चाहे वह किसी भी धर्म से संबंधित क्यों न हो।

 

5.   स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों के अलावा किसी भी अन्य धर्मांे से संबंधित पर्वों पर सार्वजनिक अवकाश पर पूर्णतः रोक लगा देना चाहिए। इसके बदले में सरकारी कार्मिकों को पूरे वर्ष में दस दिन की एकमुश्त या टुकड़ों में विशेष अर्जित अवकाश (केवल धार्मिक कार्यांे हेतु) की व्यवस्था करने चाहिए। इससे दो लाभ होंगे- अव्वल देश का सरकारी कामकाज कभी भी ठप्प नहीं होगा तथा दूसरा किसी भी कार्मिक की धार्मिक भावना पर कोई आघात भी नहीं होगा।

 

(2) ’’जातीय-सांप्रदायिक हिंसा’’

भारतीय दलितों के साथ हजारो सालों से होते आ रही जातीय हिंसा की गाथा अन्तहीन और सर्वविदित है। वर्तमान शोध आलेख में इन दलितों के विरूद्ध हो रहे पारम्परिक जातिगत हिंसा के ऊपर प्रकाश नहीं डाला जा रहा है। इसका मूल कारण यह है कि भारतीय जनमानस व भारतीय दलित ऐसी जातिगत भावनाओं की गाथा सुनने की तथा वेदनाएं सहने क® अभ्यस्त हो चुकी है दूसरे शब्द¨ं में उनकी संवेदनाएॅं मर चुकी हैं। यहाॅ चर्चा करना चाहूंगा एक ऐसी नई वेदना की जिसका मूल आधार तो जातिवाद ही है किन्तु बाहरी आधार तथाकथिक धर्मान्तरण है। इस देश में जिस समुदाय के साथ हजारों सालों से अन्याय और अत्याचार होते रहा है, उसकी सामाजिक स्थिति आज भी जस का तस बनी हुई है यद्यपि आर्थिक रूप से हालात कुछ बेहतर जरूर हुए किन्तु सामाजिक स्थिति में कोई खास बदलाव नजर नहीं आया है। परिणामतः यह समुदाय  अब बेहतर सामाजिक स्थिति की उम्मीद में जब किसी गैर धर्म के प्रति अपनी आस्था प्रकट करने लगे हैं तो उड़ीसा के कंधमाल जैसे अमानवीय घटनाओं (इन्टरनेशॅनल हेराल्ड ट्रिब्यून ,2008; ह्मेन राइट वाॅच, 2008; द हिन्दू,, 2008) से मानवता तार-तार होने लगता है। आखिर ये लोग जायें तो कहाॅं जायें ? आप अपने समाज में तो इनको स्थान देतेे नहीं और जब कोई दूसरा इनको कुछ स्थान देना चाहता है,अपने गले लगाना चाहता है तो आपका क्रोध इन पर कंधमाल जैसे कहर बनकर बरसता है।संभवता यह घटना आजादी के बाद दलितों पर हुई अत्याचार के घटनाओं में सेे सबसे बड़ी घटना हो।

 

कंधमाल की घटना में बहस धर्मान्तरण का नहीं है बल्कि इसके पीछे की वजह वही है जिसकी चर्चा मैंने इस आलेख में पहले भी की है, कुछ यथास्थितिवादी इस देश में पाश्विक प्राचीन रूढ़िवादी मान्यता आधारित जातिगत व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हंै ताकि उनकी धर्म की दुकान चलती रहे और सामाजिक सोपान में वे अपनी सर्वोच्च पदवी (स्थिति) धारण किये हुए अघोषित आरक्षण का लाभ उठाते हुए इस देश में अपना प्रभुत्व बनाये रहें। यही उन अत्याचारियों की मूल पीड़ा है वे नहीं चाहते कि कोई दलित या पिछड़ी जाति के लोग पढ़े-लिखे  और अपने अधिकारों को पहचाने और उसे हासिल कर अपना विकास करंे। वे चाहते है कि ऐसे पददलित लोग हमेशा टुकड़ों में जीते रहें, अस्पृश्य कहलाये और अपमान सूचक संबोधनो से अलंकृत होते रहें ; वर्ना उनके घर जला दिये जायेंगे, स्त्रियों की इज्जत लूट ली जायेंगी। ऐसा नहीं है कि इस देश में केवल दलित लोग ही ईसाईत स्वीकार कर रहे हैं या किये हुए हैं। भारत में ईसाईत की शुरूआत तो इस देश के सामाजिक व्यवस्था में सर्वोच्च स्थान रखने वाली जाति से हुई है, केरल के ‘‘सीरियन क्रिस्चियन्स‘‘ की कहानी सर्वविदित है। जब केरल के इस उच्च जाति के लोगों ने ईसाईत स्वीकारा तो इस देश में कंधमाल जैसी किसी तरह का जलजला कभी नहीं आया। इनके अलावा इस देश के कई अन्य जातियों ने भी ईसाईत स्वीकारा है तब भी कोई दंगे-फसाद या शोर-शराबा नहीं हुआ। किन्तु जब इस देश का कोई आदिवासी या दलित अथवा अस्पृश्य जाति इसाईत स्वीकार करता है या स्वीकार करने की चेष्टा करता है तो उसकी परिणति कंधमाल जैसी बर्बर घटनाएँ होती हैं।

 

हमने कभी यह सोचने की कोशिश ही नहीं किया कि आखिर इस देश की जनजाति या अनुसूचित जाति ही धर्मान्तरित  होना क्यों चाहती है? ऐसा नहीं कि इन जातियों का धर्मान्तरण का इतिहास कोई हाल का है। इतिहास साक्षीे है जब-जब इन जाति के लोगों को हिन्दू धर्म के फंदे से मुक्त होने का मौका मिला वे बड़ी दिचस्पी के साथ इस धर्म का परित्याग करते रहे हैं। उदाहरणार्थ 14 अक्टूबर 1956 को बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर की अगुवाई में महार जाति के लोगों ने बौद्ध धर्म में धर्मान्तरित हुए। इसके पहले छत्तीसगढ़ के गुरू घासीदास की अगुवाई में सतनाम पंथ इसके और पहले संत कबीर दास के विचारो से प्रेरित कई नीची जाति के लोगांे द्वारा कबीर पंथ जैसे एक निर्गुण धर्म वाली विचार धारा में मिल जाना इत्यादि। इस तरह की अनगिनत घटनाएॅ भारत के इतिहास में दफन हैं ; मसला हमेशा एक ही रहा है जातिवादी अमानुषिक शोषण, अत्याचार एवं जहालत से मुक्ति।

 

कंधमाल जैसी निर्मम राक्षसी वारदात करने वाली अलगाववादी ताकतंे अपने दुष्कृत्य का दायरा उन राज्यों में ज्यादा फैलाते जा रहे हंै जहाॅ-जहाॅ इन्हे राजनैतिक प्रश्रय मिला हुआ है। आयेदिन समाचारों में यह आते रहता हैं कि एक धर्म विशेष के लोगो द्वारा की जा रही प्रार्थना सभा अथवा कार्यक्रम में फलां संगठन के लोगांे ने मारपीट किया या कार्यक्रम में व्यधान उत्पन्न किया। इस तरह की गतिविधियाॅ भारत की धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्नचिन्ह अंकित करता है तथा इस देश में फैल रहे एक खास किस्म के धार्मिक गुण्डाराज के सर उठाने की ओर इशारा करता है।

सुधारात्मक उपाय

कंधमाल जैसी हिंसा कि घटनाओं से निपटने के लिए वर्तमान लेख के सांम्प्रदायिक हिंसा के खंड में वर्णित पूरे पाॅच उपाय इस समस्या के समाधान के लिए अनिवार्यता लागू होते हैं , किन्तु यह समस्या सांम्प्रदायिक समस्या की तरह होते हुए कुछ अलग तरह की समस्या है जिसे हम ’’जातीय-सांम्प्रदायिक’’ हिंसा का नाम दे सकते हंै। इसलिए उन उपायों के अतिरिक्त कुछ और उपाय इस समस्या के सुधार  के लिए आवश्यक ह¨ सकते हंै जो निम्नानुसार हैं-

 

1.   संविधान के अनुच्छेद 341 में राज्य और केन्द्र को अनुसूचित जाति की पहचान करने का प्रावधान किया गया है जिसके पैरा 4 एवं 5 में यह व्यवस्था दी गई है कि अनुसूचित जाति के वर्ग में वही जाति सम्मिलित किये जा सकते हंै जो हिन्दु अथवा उससे संबंधित बौद्ध तथा सिंख धर्म के मानने वाले हांे। इस अनुच्छेद के पैरा 4 एवं 5 की व्यवस्था को संविधान संशोधन के द्वारा परिवर्तित करते हुए यह व्यवस्था दी जाने चाहिए की वे सभी जाति के ल¨ग जो अस्पृश्य अथवा दलित जाति से संबंधित हैं चाहे वे किसी भी धर्म के मानने वाले हों उन्हे अनुसूचित जाति वर्ग में सम्मिलित किया जाये तथा जो अन्य पिछड़े वर्ग से संबंधित हैं चाहे वे किसी भी धर्म के मानने वाले हों उन्हे अन्य पिछड़े वर्ग में सम्मिलित किया जाये। कुछ इसी तरह के सुझाव माननीय सच्चर समिति और माननीय रंगनाथ मिश्र समिति के प्रतिवेदनो (एन.सी. आर.एल.एम. , 2007) में भी सरकार को प्रस्तावित हंै। चुंकि संविधान धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार  केे आरक्षण का प्रावधान नहीं करता बल्कि संविधान के अनुसार समाज के कमजोर वर्गों विशेषकर अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़ी  जातियों के सामाजिक पिछड़ेपन एवं वंचित रहने के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था का प्रावधान है। अतः आरक्षण की व्यवस्था का लाभ ऐसे जातियों से संबंधित सभी जातियों के लोगों के लिए होना चाहिए चाहे वह किसी भी धर्म का मानने वाला क्यों न हों। धर्म बदल लेने मात्र से इनकी जातिगत सामाजिक पिछड़ेपन व वंचित रहने की स्थिति मिट नहीं जाति बल्कि जाति का अभिशाप इनके मृत्यु तक और मृत्यु के बाद भी जुड़ा रहता है। क्योंकि जाति का सिद्धान्त है जन्म से इति तक अर्थात जन्म से लेकर अन्त (मृत्यु) तक जाति व इससे जुड़ी पीड़ादायक अपमान, तिरस्कार, वंचित व पददलित बने रहना है। इन सब कारणों से ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि ऐसे ईसाई और मुस्लिम जो कि अनुसूचित जाति से संबंधित थे, इनकी जनसंख्या को अनुसूचित जाति की संख्या में जोड़कर जुड़ी हुई बढ़ी जनसंख्या के अनुपात में अनुसूचित जाति का आरक्षण बढ़ाते हुए ऐसे धर्मों  से संबंधित लोगों को अनुसूचित जाति के आरक्षण में से ही आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए। ठीक इसी तरह ऐसे ईसाई और मुस्लिम जो कि अन्य पिछड़े वर्ग से संबंध रखते थे की जनसंख्या को अन्य पिछड़े वर्ग की जनसंख्या में जोड़कर इनको अन्य पिछड़े वर्ग को प्राप्त आरक्षण के हिस्से के अनुपात में से ही इन्हें आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए। इस तरह की व्यवस्था का प्रत्यक्ष लाभ भारत के दलित  मुस्लिमों व पिछड़ा मुस्लिम¨ं एवं दलित ईसाईयों व पिछड़ा ईसाईयों को मिल सकता है जिससे इनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं मानसिक (भययुक्त वातावरण से मुक्ति ) स्थिति में विकास होगा, अन्तत्वोगत्वा इससे देश के विकास में भी तेजी आने के साथ-साथ शांति का वातावरण भी निर्मित होगा।

 

2.   हिन्दु धर्म ग्रन्थो में वर्णित अपमानसूचक जातिगत सूत्रो, वाक्यांशो और उद्धवरणांे को विलोपित कर देना चाहिए।

 

3.   जाति आधारित संगठनो अथवा संस्थाओ की स्थापना पर प्रतिबंध लगाते हुए पहले से स्थापित इस तरह की जातिगत संगठनों की मान्यता समाप्त कर देनी चाहिए। चूॅंकि भारत मंे जातिवाद को जीवित रखने में ऐसे ही संगठनो की भूमिका रही है। वर्तमान में ऐसे संगठनो का उपयोग राजनितिक हित साधने के तंत्र के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

 

4.   यद्यपि विवाह निहायतन एक निजी विषय है फिर भी चूॅकि जाति व्यवस्था की जड़ वैवाहिक व्यवस्था में ही टिकी हुई है और जातिवाद का सख्ती से पालन किसी क्षेत्र में किया जाता है तो वह है विवाह। अतः जातिवाद के उन्मूलन के लिए अंर्तजातिय विवाह के संवैधानिक प्रोत्साहन का प्रचार-प्रसार करने की  आवश्यकता है जिसके लिए उपाय क्रमांक 3 एक महत्वपूर्ण अस्त्र हो सकता है। इसके अलावा सभी प्रकार के वैवाहिक विज्ञापनो में जातिमूलक योग्यता संबंधी अनिवार्यताओ के प्रकाशनो पर पूर्णतः कानूनी प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

 

5.   ऐसे कानूनी प्रावधान किये जाए जिसमे यह व्यवस्था हो कि कोई भी भारतीय नागरिक अपने नाम के आगे जातिमूलक उपनाम (सरनेम) न लिखे।

 

(3) जनजातीय एवं माओवादी हिंसा

जनजाति, आदिम जाति, गिरीजन, मूलवासी, वन्यजन, पारम्परिक, आदिवासी, स्थानीय, देशज, इत्यादि कई नाम से पहचाने जाने वाले लोगों का समूह जिनमें से अधिकांश समूहों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के  प्रावधानों के अनुसार अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला हुआ है। उनके उदद्यृत आखिरी चार नामों पर गौर करें तो पता चलता है कि ये उन मानवों का समूह है जो इस धरती में न जाने कब से रह रहें हैं। आदिवासी शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, पहला  आदि = पहले का या प्रारंभिक तथा वासी = रहने वाले अर्थात वे मानव समूह जो इस धरती में दूसरे मानव समूहों की तुलना में पहले से निवास कर रहे हैं। इस आधार पर स्वाभाविक तौर पर जनजातियों का इस धरती पर पहला और ज्यादा हक होना चाहिए। किन्तु वास्तविकता ठीक इसके उलट है ; हक या अधिकार के मामले में इनका नंबर आखिरी और न के बराबर है। आदिवासियों या जनजातियों की समस्या दलितों और अल्पसंख्यकों की समस्या से बिल्कुल अलग है। इनकी मूल समस्या  पृथककरण या सामान्य भारतीय समाज व्यवस्था से हजारों सालों से अलग-थलग रहना है। हम चाहे कितने ही तर्क दें, कितनों ही माइथोलाॅजिकल संदर्भो का सहारा लें, इसके बावजूद भी इनकी धार्मिक गतिविधियों को हिन्दू धर्म से जोड़ा नहीं जा सकता। हिन्दू धर्म के धर्मग्रन्थ्रो में इनके विषय में कोई सपष्ट उल्लेख नहीं मिलते ; साथ ही साथ हिन्दू धर्म व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी “जाति व्यवस्था” में इस प्रकार का कोई भी उल्लेख नहीं मिलता कि आदिवासियो को हिन्दु जाति व्यवस्था के ब्राम्हण वर्ग में रखा गया है कि क्षत्रीय में, कि वैश्य में, कि शुद्र में । यह सर्वमान्य तथ्य है कि भारतीय  जनजातीयों में से अधिकांश टोटमवादी हंै या आत्मावादी। यहाॅ इन बातो का वर्णन करने का उद्देश्य जनजातीयों का संबंध हिन्दू धर्म के साथ होना या न होना साबित करना नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट करना है कि भारतीय जनजाति समूह सदियों से अपने पर्यावास में, आम दुनिया से दूर अपनी अलग प्राकृतिक दुनिया में स्वछंद, स्वतंत्र और निर्भयतापूर्ण जीवन जी रहे थे। अंग्रेजो के आगमन के पश्चात इनकी प्राकृतिक दुनिया में बाहरी दुनिया का हस्तक्षेप बढ़ने लगा। हस्तक्षेप का क्रम धीरे-धीरे शोशण, अत्याचार, बेदखली और लूट कि एक अंतहीन गाथा के रूप में प्रारंभ होकर आजादी के  64 वर्षो के बाद भी बदस्तूर जारी है। संवैधानिक प्रावधानों ने अवश्य रूप से इनके जीवन को सुगम बनाने और ऊॅचा उठाने में निर्णायक भूमिका अदा की है, फिर भी इन संवैधानिक प्रावधानों के होने के बाद भी जनजातियों के ऊपर पुलिस, वन अमला, शराबमाफिया, राजस्व अमला, जनजातिय विकास अमला, वनोपज ठेकेदार, साहूकर-महाजन, भूमाफिया इत्यादि जैसे सरकारी, गैरसरकारी तंत्रों द्वारा जुल्म और ज्यादती किया जाता रहा हैइन्हे इनके जल, जंगल और जमीन के नैसर्गिक हक से बेदखल किया जाता रहा है।

 

इन्ही सब अत्याचारों के बीच सशस्त्र विद्रोह के द्वारा इन मजलुमों को इनकी दांस्ता एवं जहालत से मुक्ति दिलाने के उद्देश्यों के साथ नक्सलवाद का उदय सन् 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलवाड़ी गाॅंव में चारू मजूमदार व कनु सान्याल तथा उनके साथियों द्वारा हुआ था। ये माओत्से तुंग के साम्यवादी विचारधारा से प्रेरित थे।  सन् 1972 में आन्ध्रप्रदेश में एक घोर माओवादी नक्सली नेता कोंडापल्ली सीता रमैया का उदय हुआ जिसने पीपुल्स वार ग्रुप (पी ़डब्ल्यू ़जी ़) बनाया।  वर्तमान में देश के 13 राज्यों के 200 से अधिक जिलों में यह दावानल धधक रहा है। इसके सर्वाधिक चपेट में छत्तीसगढ़, झारखण्ड, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा एवं बिहार इत्यादि राज्य हैं।  छत्तीसगढ़ में सर्वप्रथम सन् 1968 में बस्तर में नक्सली पर्चे वितरित होते देखे गए थे।  

 

नक्सलवादियों-माओवादियों का अब अन्तर्राष्ट्रीयकरण हो चुका है, ऐसी जानकारी मिल रही है कि 2001 में दक्षिण एशिया के लगभग दर्जन भर संगठनों ने मिलकर एक समन्वय समिति भी बना लिया है। इसमें नेपाल का माओवादी संगठन कम्यूनिस्ट पार्टी आॅॅफ नेपाल की मुख्य भूमिका है।  देश के दो ताकतवर नक्सली संगठन च्ण्ॅण्ळण् और डण्ब्ण्ब्ण् ;ब्ण्च्ण्प्द्ध  माओवादिय¨ं ने 2004 मे एकीकरण कर लिया है। आज इस नई एकीकृत पार्टी की सशस्त्र सदस्य संख्या लगभग 60000 से भी अधिक आंकी जा रही है। नक्सली देश के उन्ही राज्यों में पनप रहे हंै जहाॅं घोर गरीबी और बेरोजगारी व्याप्त है।  देश के आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद के पनपने के पीछे के कारणों पर हमें अवश्य विचार करना चाहिए। 1987-88 के सर्वे के अनुसार देश के दस बड़े राज्य आन्ध्रप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु एवं कर्नाटक इत्यादि राज्यों के 90 प्रतिशत ग्रामीण जनता गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती थी।  आज नक्सली देश के उन्हीं क्षेत्रों में पनपी है जहाॅं आज तक 90 प्रतिशत लोग गरीबी-रेखा के नीचे जीवन जीने मजबूर हैं।  इन क्षेत्रों में गरीबी के अलावा कर्ज, बीमारी, पीने के साफ पानी का अभाव, शोषण, सांस्कृतिक पहचान का संकट, धर्मांतरण (हिन्दु/ईसाई) की समस्या इत्यादि भी इस समस्या के पनपने के प्रबल स्त्रोत हैं।

 

भारतीय नक्सलवादी वर्तमान में अपने लक्ष्य व विचारधारा से भटक गये हैं; इसीलिये वे इन क्षेत्रों के निर्दोष आदिवासियों की हत्या करने से भी नहीं चूकते हैं। वे इन क्षेत्रों में विकास व निर्माण कार्य होने नहीं देते, यहाॅं तक कि अब वे दंतेवाड़ा जिलों के बासागुड़ा, आमपल्ली व उसूर आदि क्षेत्रों में आदिवासियों को खेती करने न देकर उनके जीने के अधिकार से वंचित कर रहे हैं। नक्सलवादियों और सरकारी तंत्र ने आदिवासियों के संास्तृतिक जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप किया है। आज निश्चित रूप से बैरियर एल्विन(1960) की तटस्थता की अवधारणा प्रासंगिक होते प्रतीत हो रही है साथ ही साथ यहाॅं पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू के जनजातियों में अतिप्रशासन से बचने के सिद्धान्त भी गौरतलब हंै। जहाॅं सरकारी तंत्र ने इनके बीच अतिप्रशासन किया वहीं नक्सलवादियों ने उनके सांस्कृतिक जीवन को छिन्न-भिन्न कर दिया। उनके टेबूस, प्रथा कानून तोड़ दिये गये, घोटूल के अस्तित्व को नष्ट कर दिया गया। नक्सली पंचायतों के द्वारा आदिवासियों को अमानवीय दण्ड दिया गया, जिसका परिणाम था सलवा जुडूम।

”सलवा जुडूम“ गोण्डी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ होता है शांति मार्च या शांति मिशन।  नक्सलवादियों के अमानवीय अत्याचार के प्रतिकार स्वरूप शांतिपूर्वक ढंग से उनके असहयोग के परिपेक्ष्य में  इस आन्दोलन का आरंभ जून 2005 में बस्तर के दंतेवाड़ा जिले में हुआ। सरकारी आॅंकड़ों के अनुसार जून 2005 में सलवा जुडूम प्रारंभ होने से अब तक दंतेवाड़ा जिले के 6 विकासखण्डों के 644 गाॅंवों के लगभग 100000 लोग अपने घर, जमीन व पशु छोड़कर इधर-उधर पलायन कर गये थे।  इनमें से लगभग 46000 लोग 27 सहायता शिविरों में अस्थायी निवास में रह रहे थे। यहाॅं पर इनके अस्थायी निवास घाॅंस-फूंूस व त्रिपाल इत्यादि से निर्मित थे।  इन स्थानों में ग्रामीण जीवन के निस्तारी हेतु तालाब व पोखरों का पूर्णतः अभाव  था जहाॅं वे अमानवीय वातावरण में जीवन जीने मजबूर थे।

 

यहाॅ दूर-दूर तक गंदगी फैलते जा रहीे थी।  ये अपने देवी-देवताओं एवं देव स्थानों से बेदखल थे तथा अन्तर-सांस्कृतिक जीवन जी रहे थे । जिसके कारण इनमें परसंस्कृतिकरण की समस्या बढ़ते जा रही थी। इन शिविरों में शरणार्थियों को दिये जा रहे भोजन पर्याप्त नहीं थे  साथ ही इसकी गुणवत्ता निम्न स्तर की थी।

 

सलवा जुडूम का सबसे बुरा असर शिक्षा पर पड़ा , कोन्टा के हायर सेकन्डरी स्कूल, दोंदरा के गल्र्स हाई स्कूल, कन्या आश्रम, बालक आश्रम इत्यादि को राहत शिविरों में बदल दिया गया। यहाॅं पर बच्चों को पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक तैयार नहीं थे।वहाॅ कृषि, तंेदूपत्ता तथा अन्य वनोपज संग्रहण जैसे तमाम आर्थिक गतिविधियाॅं स्थगित थे। केवल सरकार द्वारा उपलब्ध कराये गये सुविधाओं पर निर्भर थे। जब से सलवा जुडूम अभियान शुरू हुआ है, तब से नक्सली हिंसा तीव्र गति से बढ़ी है। अब तक लगभग 2000 से भी अधिक निर्दोष आदिवासियों की नक्सली गोलियों से जान जा चुकी है। 5 जून 2005 एवं 6 मार्च 2006 के बीच 138 सलवा जुडूम कार्यकर्ता नक्सलियों के द्वारा मारे जा चुके हैं। 644 गाॅंवों के विस्थापित लाखों आदिवासियों का पुनर्वास सरकार के लिये एक गंभीर चुनौती होगी। यह आन्दोलन अब ऐसे मोड़ पर पहुॅंच चुका है जहाॅं से लौटना जानलेवा होगा। शरणार्थी आदिवासी अपने गाॅंव नहीं लौट सकते, यदि वे ऐसा करते हैं तो शायद वे उसी पल नक्सलियों के हैवानियत के शिकार हो जायेंगे। सरकार कब तक राहत शिविरों में रह रहे आदिवासियों के लिए मुफ्त रोटी, कपड़ा और अन्य बुनियादी जरूरतों को पूरा करती रहेेंगी।

 

आखिर रास्ता क्या है?

गौतम, गाॅंधी एवं महावीर के इस देश में हिंसा के बदले हिंसा जैसी बातों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। हिंसा के रास्ते किसी समस्या का सर्वकालिक हल नहीं निकाला जा सकता। नक्सलवाद आज जिस मुकाम पर है वहाॅं से उसे दो ही तरीके से समाप्त किया जा सकता है। एक तो बड़े पैमाने पर सैनिक कार्यवाही द्वारा नक्सलियों का सफाया किया जाए जो कि जंगली हालात में संभव प्रतीत नहीं होता तथा दूसरा नक्सली-सरकार वार्ता।  मेरे विचार में दूसरा रास्ता ही नक्सलवाद के सर्वकालिक समाप्ति के लिए कारगर मार्ग है जो अत्यन्त दुष्कर जरुर है, परन्तु इरादे पवित्र हों तो कोई भी कार्य दुष्कर नहीं होता।  नक्सलवादियों का मकसद आखिर आदिवासियों को शोषण व अत्याचार से मुक्त कराना ही तो था ; यदि वे आदिवासियों के सच्चे हितैशी हैं तो हथियार त्यागकर सरकार से वार्ता के लिये तैयार हो जायें। इसी तरह यदि सरकार की मंशा इस समस्या को समूल नष्ट करने की है तो केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर नक्सलियोें से शांतिपूर्वक पुनर्वास के संकल्प के साथ वार्ता के लिए उन्हें आमंत्रित किया जा सकता है और निम्न माॅडल के अनुसार उनकी पुनर्वास प्रक्रिया प्रारंभ की जा सकती है।

 

नक्सलवाद के पूर्णकालिक समाधान के संदर्भ में माॅडल

संपूर्ण भारत में व्याप्त नक्सलवादी समस्या के सर्वकालिक समाधान के लिए प्रस्तावित इस प्रारूप के अनुसार पूरी योजना को दो भागांे में विभक्त किया गया है जिसमें ऊपरी भाग नक्सलवादियों के पुर्नवास से संबंधित उपाय हैं तथा निचला भाग जनजाति बहुल क्षेत्रों मेें रक्षणीय विकास या सतत विकास से संबंधित उपाय हैं ( प्रेमी, जितेन्द्र कुमार , 2007 ”“ एवं 2010 )

 

नक्सलवादियों का पुर्नवास

नक्लसवाद को यदि सर्वकालिक रूप से समाप्त करने के लिए उपर¨क्त माडल अनुसार निम्न उपायों को अपनाया जा सकता है-

 

1.   नक्सली- सरकार वार्ता

नक्सलवादिय¨ं तथा सरकार¨ं के बीच शांति वार्ता के लिए निम्नलिखित कदम उठाये जाने चाहिए-

 

1.1 सरकार द्वारा युद्ध विराम का अपील

इस संदर्भ में सर्वप्रथम केन्द्र एवं नक्सलवाद से प्रभावित राज्य सरकार आपस में बैठकर यह तय करे कि इस समस्या का समाधान केवल बातचीत के द्वारा ही निकाला जा सकता है और बातचीत के लिए जो भी आवश्यक राजनैतिक एवं सामाजिक वातावरण निर्मित किये जा सकने की आवश्यकता है उसे वर्तमान में प्रचलित सभी प्रकार के संचार माध्यमों के उपयोग के द्वारा किया जा सकता है। अनुकूल वातावरण निर्मित करने के प्रयासों के साथ ही साथ सरकार विश्वसनीय माध्यम के द्वारा यह घोषणा करने चाहिए कि सरकार अब इस नतीजे पर पहूॅची है कि इस समस्या का समाधान केवल शांति या बातचीत द्वारा किया जाना है। इसके पश्चात  सरकार क¨ सभी प्रकार के नक्सलविरोधी अभियानांे को स्थगित करने की घोषणा करनी चाहिए।

 

1.2 नक्सलवादियों द्वारा हिंसात्मक गतिविधियो पर रोक

सरकार के युद्धविराम तथा वार्ता संबंधी उपरोक्त घोषणा के उपरांत प्रत्युत्तर में नक्सलवादियों को चाहिए कि वे अपनी समस्त हिंसात्मक गतिविधियो पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाते हुए सरकार को शांति का संदेश देने के साथ-साथ सरकार का विश्वास अर्जित करे।

 

1.3 वार्ता का विधायी संकल्प पारित करना

नक्सलवादियों के उपरोक्त कदम के पश्चात सरकारों को केन्द्र संसद में एवं राज्य अपने-अपने विधानसभा¨ं में  नक्सलवादी समस्या के समाधान के संदर्भ में उनसे वार्ता करने तथा उनका पुर्नवास करने के संदर्भ में उन्हें विधायी संकल्प पारित करने चाहिए।

 

1.4 नक्सलवादियों द्वारा हथियारों का परित्याग

दोनांे ओर के उपरोक्त कार्यवाहियों के पश्चात वार्ता प्रारंभ होने के कुछ समय बाद नक्सलवादियों को चाहिए कि वे सभी प्रकार के हथियार जो उनके पास हैं उन्हे सरकार को समर्पित कर दें । हथियारांे को समर्पित करने के एवज में सरकार क¨ उन हथियारांे के अनुमानित राशि, प्रोत्साहन राशि के रूप में नक्सलवादियों को प्रदान करने चाहिए जिससे कि दोनो तरफ से विश्वास का माहौल सुनिश्चित हो सके।

 

1.5 नक्सलवादियों द्वारा समस्त नक्सली ठिकानों की जानकानरी

सरकार तथा नक्सलवादियों  के उपरोक्त कदम के बाद नक्सलवादियों से यह आशा कि जायंेगी कि वे उनसे जुड़े सभी प्रकार के देशी-विदेशी संगठनांे, सरकारी, गैर सरकारी संगठनों तथा व्यक्तियांे एवं ठिकानों इत्यादि की जानकारी सरकार को दें ताकि नक्सलवादियों के पुर्नवास के पश्चात और किसी भी प्रकार की नक्सलवादी या इस तरह के विचार से प्रेरित कोई भी गतिविधि फिर से प्रारंभ न हो सके।

 

2    नक्सलवादियों का पुर्नवास

इस हेतु निम्न कदम/उपाए किये जाने चाहिए-

2.1 आवास

नक्सलवादियों के पुर्नवास के संबंध में सबसे आवश्यक बात होगी कि उनका एक स्थायी आवास हो ,जिससे कि स्थायी जीवन के प्रति उन्हे प्रेरित किया जा सके। इसलिए उन सभी नक्सलवादियों को जो परोक्ष रूप से नक्सली गतिविधियो में सम्मिलित थे उन्हे यदि संभंव हो सके तो उनके पैतृक निवास स्थान के आसपास अथवा कहीं अन्य सुविधाजनक उनके मनपसंद स्थान में सरकार द्वारा निर्मित न्यूनतम आवश्यक सुविधायुक्त आवास आबंटित करनी चाहिए।

 

2.2 स्वरोजगार के प्रयास

आवास आबंटित करने के पश्चात उन्हे स्वरोजगार के लिए प्रेरित करना चाहिए इस दिशा में दो कार्य किये जा सकते है- सर्वप्रथम उन्हे उनके रूचि अनुसार कार्य करने के लिए आधुनिक प्रशिक्षण दिये जाए तत्पश्चात प्रशिक्षित नक्सलवादियों को स्वयं के रोजगार की स्थापना के लिए आवश्यक आकर्षक सब्सिडी सहित ऋण पर पर्याप्त आर्थिक सहायता बिना किसी आवश्यक कागजात या बंधन के दे देने चाहिए। इस बीच सरकार उनके व्यवसाय अथवा रोजगार का सतत माॅनीटरिंग करे तथा किसी को तकनीकी या आर्थिक आवश्यकता प्रतीत होने पर पुनः सहायता प्रदान करे। ऐसी माॅनीटरिंग कम से कम 10 वर्ष की अवधि तक की जानी चाहिए। इनमें से यदि कोई खेती करना चाहे तो इनके लिए आवश्यक संसाधनों सहित कृषि भूमि आबंटित की जानी चाहिए। यदि कोई आत्मसर्मपण किया हुआ नक्सली 

आगे शिक्षा प्राप्त करना चाहे तो उनके शिक्षा के लिए सभी प्रकार के प्रबंध सरकार द्वारा किया जाना चाहिए; पढ़े-लिखे आत्मसर्मपण किये हुए नक्सवादी यदि सरकारी नौकरी करने की इच्छा रखता हो तो उन्हें उनकी शैक्षिणिक योग्यता के अनुसार सरकारी नौकरियों में विशेशकर स्थानीय पुलिस में उनके लिए स्थान आरक्षित किया जाना चाहिए।

 

आलेख प्रवाह

रक्षणीय विकास ;ैनेजंपदंइसम क्मअमसवचउमदजद्ध नक्सलवाद के पूर्णकालिक समाधान के संदर्भ में माॅडल

 

 

2.3 सरकारी योजनाओं के निर्माण एवं क्रियान्वयन में पुर्नवासित इच्छुक नक्सलवादियों की भागीदारी

जहाॅ तक मैं समझता हूॅ कि नक्सलवाद के पनपने के सामाजिक एवं आर्थिक कारणों के साथ-साथ एक बड़ा कारण राजनैतिक एवं मानसिक  है। यह इस अर्थ में कि किसी विद्रोह का अंतिम लक्ष्य सत्ता में हिस्सेदारी अथवा सत्ता में नियंत्रण होता है, अतः ऐसे इच्छुक पुर्नवासित नक्सलवादी जो सत्ता तथा उसकी गतिविधियों में अपनी भागीदारी करने की इच्छा रखते हैं, उन्हे सरकार, विकास योजनाओं एवं कार्यक्रमों के निमार्ण से लेकर क्रियान्वयन तक की प्रक्रिया में एक वैधानिक मापदंड के अनुसार उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के आवश्यक ठ¨स उपाय कराने की व्यवस्था कर सकती है।

 

2.4 शासन में सहभागिता

जैसा कि उपर वर्णित है कि विद्रोह की महत्वकांक्षा सत्ता पर नियंत्रण या सहभागिता होती है। इस परिप्रेक्ष्य में सरकार नक्सवादियों की सहभागिता शासन में सुनिश्चित करने हेतु निम्न प्रावधान कर सकती है-

 

2.4.1 पंचायती राज में विशेष अधिकार (पेसा एक्ट का कठोरता से पालन)

नक्सली समस्या से प्रभावित कुछ राज्यो में यद्यपि पंचायत एक्सटेनशन एक्ट इन शेड्यूल एरियाश, 1996 अनुच्छेद 244(1) लागू तो किया गया है किन्तु इसका क्रियान्वयन कठोरता से नही किया जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण जनजातीय पंचायत प्रतिनिधियों का तथा सामान्य जनजातीय समाज का अपने इस अचूक एवं सशक्त अधिकार के संबंध में घोर अनभिज्ञता रखना है। अतः सभी सरकारी, गैर सरकारी संगठनो को चाहिए कि वे जनजातीयो को दिये गये इस संवैधानिक प्रावधानो के संबंध में विशेष जागरूकता अभियान चलाए तथा इनकी क्रियान्वयन की सतत माॅनीटरिंग भी कराएँ।

 

2.4.2 स्थानीय स्वशासन छठवी अनुसूची के अनुरूप

संविधान के छठवी अनुसूची में वर्णित अनुच्छेद 244(2), 275(1) के प्रावधानो के अनुसार पूर्वोत्तर के असम, मेघालय, मिसोरम ,त्रिपुरा और नागालैण्ड राज्यांे में आदिवासी क्षेत्रांे के प्रशासन के संबंध में इन राज्यांे की जनजातीयांे को स्वशासन हेतु कुछ विशेश अधिकार दिये गये है जिन्हे ’’संविधान के अंदर संविधान’’ का दर्जा दिया गया है। ठीक इसी तरह की व्यवस्था देश के समस्त नक्सली प्रभावित क्षेत्रो में करते हुए इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी 10 वर्ष की न्यूनतम अवधि के लिए पुर्नवासित नक्सलियों के साथ-साथ स्थानीय जनजातीय प्रतिनिधियों को सामूहिक रूप से सम्मिलित करते हुए दी जानी चािहए।

 

उपरोक्त दोनांे उपायांे के अलावा दो और व्यवस्था करनी चाहिए 1. जनजातीय जीवन और समस्याओं की समझ रखने वाले विशेषज्ञो की एक संवैधानिक अधिकार प्राप्त स्थायी समिति का गठन किया जाना चाहिए जिसमंे सामाजिक-सांस्कृतिक मानवशास्त्रीयों की सेवा अनिवार्य रूप से ली जानी चाहिए 2. इन राज्यों के राज्यपालांे की नियुक्ति के समय नियुक्त राज्यपाल¨ं को संविधान के 5वीं एवं 6वीं अनुसूची में प्राप्त राज्यपाल के संवैधानिक अधिकारांे तथा जनजातीय जीवन एवं समस्याओ के संबंध में समुचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि वे अपने प्राप्त अधिकारो का ठीक समय पर समुचित प्रयोग करते हुए पुर्नवास कि प्रक्रिया में अनावश्यक राजनितिक हस्ताक्षेप पर रोक लगाते हुए सशक्त योगदान दे सकें।

 

3.   औद्योगिकीकरण पर सामान्य स्थिति तक निषेध

जैसा कि सर्वविदित है कि भारतवर्ष का नक्सल प्रभावित समस्त क्षेत्र अकूत खनिज एवं वन संपदा से परिपूर्ण है और यही परिपूर्णता इन क्षेत्रो के लोगांे के शोषण और अत्याचार का प्रमुख कारण भी हैं। इस परिप्रेक्ष्य में नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रांे में पूर्ण शांति एवं सामान्य स्थिति बहाल होने तक सभी प्रकार के उद्योगों की स्थापना पर पूर्णतः प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

 

4.   रक्षणीय विकास

नक्सल प्रभावित क्षेत्रो में आम जनजीवन को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने के लिए रक्षणीय विकास के लिए प्रस्तावित इस प्रारूप को क्रियान्वयित करने की आवश्यकता होगी, जो (प्रेमी, जितेन्द्र कुमार , 2006 एवं 2007 ”“ के अनुसार)  निम्नानुसार है-

 

4.1 गरीबी उन्मूलन

रक्षणीय विकास का प्रथम एवं अनिवार्य लक्ष्य गरीबी उन्मूलन करना हैै । गरीबी उन्मूलन के किसी कार्यक्र्रम के निर्माण     एवं क्रियान्वयन में तीन बातेां का ध्यान रखना चाहिए पहला उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी दूसरा उस क्षेत्र की मानव जनसंख्या तथा तीसरा उस जनसंख्या की संस्कृति। इन बातों को ध्यान में रखते हुए नक्सल प्रभावित क्षेत्रो में गरीबी उन्मूलन की दिशा में निम्न प्रकार के कार्यक्रम क्रियान्वयित करने की आवश्यकता है-

 

4.1.1 भूमि सुधार

भारत में ग्रामीण एवं जनजातीय गरीबी का मूल कारण भूमि वितरण मंे ब्याप्त घ¨र असमानता तथा भूमि का कम उपजाऊपन है। इसलिए गरीबी उन्मूलन के लिए सामाजिक एवं भौतिक भूमि सुधार की आवश्यकता है। सामाजिक भूमि सुधार हेतु जनजातीय  भूमिहीन किसानांे को उसके आवासित गाँवो के आसपास उपलब्ध कृषि भूमि आबंटित करनी चाहिए। भौतिक भूमि सुधार हेतु भूमि का परीक्षण कराने के पश्चात आवश्यक जैविक एवं रासायनिक उपचार करने चाहिए।

 

4.1ण्2 संयुक्त कृषि

कृषि भूमि की अल्पउपलब्धता एवं आधुनिक कृषि साधनांे की अनउपलब्धता के मद्देनजर संयुक्त कृषि को बढ़ावा देने की आवश्यकता है जिसमें 2 या 2 से अधिक  जनजातीय कृषक मिलकर कृषि कर सकते हंै। जिससे भूमिहीन अथवा कम भूमिधारी किसान को भी समुचित लाभ मिल सकता है।

 

4.1.3 सामाजिक वानिकी

गरीबी उन्मूलन के लिए बंजर अथवा कम उपजाऊ तथा सड़को, रेल्वे पथो, नहरो के दोनो ओर छूटे परती भूमियों पर गरीब जनजातीय कृषकांे के द्वारा इमारती अथवा फलदायी वृक्ष लगाकर लाभ उठाये जा सकने की व्यवस्था करानी चाहिए।

 

4.1.4 परंपरागत कुटीर उद्योगांे की स्थापना

जनजाति समुदाय कई प्रकार के अपने परंपरागत कौशल जैसे लौह यंत्र बनाने, चटाई बनाने, बास्केटरी बनाने तथा कई प्रकार के कला एवं हस्तशिल्प में पारंगत होते हंै अतः इनकी इन योग्यताओं का उपयोग सरकारी आर्थिक सहायता के द्वारा आधुनिक प्रशिक्षण एवं कुटीर उद्योगो की स्थापना कर इनकी गरीबी दूर की जा सकती है।

 

4.1.5 अधिकाधिक स्वसहायता समूहो का गठन

सहकारिता पर आधारित इस तरह के संगठनों को आर्थिक एवं तकनीकी सहायता देते हुए उनके नृजातिगत गुणों के आधार पर स्वसहायता समूहों का गठन जनजातीय समाज मेें किया जाना चाहिए तथा इन संगठनांे के माध्यम से सरकार के कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन किया जाना चाहिए।

 

4.2 प्रकृति संरक्षण/ इको-फ्रेंडली कुटीर उद्योग

रक्षणीय विकास का सबसे महत्वपूर्ण विशेषता प्रकृति संरक्षण पर विशेष जोर देना है, दूसरे शब्दो में प्रकृति का इस तरह से दोहन करना जिससे कि प्राकृतिक संसाधनांे की उपलब्धता उत्तरोत्तर बनी रहे तथा प्रकृति पर किसी भी प्रकार का प्रतिकूल असर न पड़े। साथ ही साथ इस तरह के कार्यक्रमों के माध्यम से गरीबी का उन्मूलन के साथ-साथ विकास की धारा को बढ़ाया जा सके। इस दिशा में जनजातीय क्षेत्रांे में निम्न इको-फ्रेंडली कुटीर उद्योगों की स्थापना की जानी चाहिए-

1. वनोपज आधारित कुटीर (प्रसंस्करण) उद्योगांे की स्थापना

2. वनौषधि आधारित कुटीर उद्योगों की स्थापना

3. मछली /मुर्गी/बकरी/सुअर पालन इत्यादि

4. रेशम कीट पालन एवं इससे संबंधित कुटीर उद्योग

5. लाख पालन एवं इससे संबंधित कुटीर उद्योग

6. पारिस्थितिकीय विशेष में पाये जाने वाले संभावित अन्य जैविक-अजैविक घटकांे से संबंधित कुटीर उद्योगों की स्थापना।

 

 

(4) ग्रामीण भारत एवं किसानों की आत्महत्या

आज 21वीं सदी के उत्तरआधुनिक काल में भी भारत की लगभग 80 प्रतिशत आबादी गाॅवों में निवास करती हंै। इनमें से लगभग 60 से 80 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। जैसा कि यह सर्वविदित है कि भारतीय कृषि एक ’’मानसूनी जुआ’’ है। जब हम ये बात आज 21वीं सदी में कहते हैं या मानते हंै तो यह बात बहुत हास्यास्पद लगता है, किन्तु तसल्ली देने के लिए यह जुमला ठीक भी है। जब ऐसा मान ही लेते हैं तो यह भी मानना होगा कि देश के  लगभग 60 से 80 प्रतिशत लोग इस जुआ के भरोसे जीते हैं।

 

चाहे जुआ किसी भी प्रकार का हो जीत की गांरटी कम ही होती है, क्योंकि जुआ एक बुराई है तथा बुराई का अंजाम हमेशा बुरा ही होता है। यही कारण है कि साईनाथ (2011) के रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1995 से लेकर अब-तक लगभग 2,56,949 कृषक भारतीय कृषि रूपी जुए में हारने (कृषि में असफल) तथा इससे व्यूत्पन्न अन्य सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के कारण अपनी आत्महत्या कर चुके हैं। नागराज  (2008) के अनुसार वर्ष 1997 से लेकर 2008 तक देश में 1 लाख 99 हजार 1 सौ 32 कृषकों ने आत्महत्या कर अपनी इहलीला समाप्त कर ली है। आत्महत्या करने वाले कृषकों में से अधिकांश देश के 6 प्रमुख राज्यां;े क्रमशः महाराश्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ से संबंधित हैं।

 

उपरोक्त आॅंकड़ो के प्रकाश में यह सवाल उठता है कि आज 21वीं सदीं में भी क्यों भारत में कृषि तथा कृषकों की दशा इतनी दयनीय है? जबकि यह आज भी इस देश की आधी से अधिक आबादी के जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन है। विश्लेषण उपरांत इसके सैकड़ो कारण सामने आते हैं किन्तु सबसे प्रमुख कारणों में अग्रलिखित कारण ज्यादा विचारणीय हैं-1. कृषि भूमि का असमान वितरण- सामाजिक स्तर एवं आर्थिक स्तर पर, 2. सिंचाई सुविधाओं का अभाव, ऋण की सुविधाओं का अभाव, 3. औद्योगिकीकरण एवं विकास के नाम पर कृषि भूमि का अंधाधुंध अधिग्रहण, 4. कृषिगत जैव-प्रौद्योगिकी की सही और पर्याप्त जानकारी का आभाव, 5. उन्नत खाद व बीज की समस्या इत्यादि। जब-तक इन समस्या को दूर करने की दिशा में ठोस एवं ईमानदार प्रयास नहीं किये जायेगंे तब-तक भारत में किसानों की आत्महत्या जैसी हिंसक घटनाएं बढ़ती रहेंगी। भारत में कृषि तथा कृषकों की समस्या को निम्नलिखित उपायों से दूर किया जा सकता है-

 

1.   भूमि सुधार

इस लेख के जनजातीय एवं माओवादी हिंसा के खंड में प्रस्तावित उपायों के अनुसार भूमि सुधार सामाजिक एवं भौतिक सुधार के रूप में किये जा सकते हैं।

 

 

2.   संयुक्त अथवा सामुदायिक कृषि

यह सर्वज्ञात तथ्य है कि भारत में भूमि का वितरण अत्यन्त असमान है। सामाजिक आधार पर इसकी स्थिति और भी बुरी है। इसके साथ ही साथ यदि प्रति परिवार औसत कृषि भूमि के विरतण पर नजर डाले तो यह 1 एकड़ प्रति परिवार से भी कम है। ऐसी न्यूनता की स्थिति में कृषि उन्नयन से संबंधित कोई भी योजना या कार्यक्रम का क्रियान्वयन किया जाना कठिन है। यही कारण है कि कृषि से संबंधित अधिकांश योजनाएॅ असफल होते जा रही हंै। अब समय आ गया है कि एक बार फिर हम संयुक्त अथवा सामुदायिक कृषि को बढ़ावा दें। इसके लिए कृषकों को नियोजित ढंग से प्रशिक्षित परामर्शदाताआंे द्वारा सामाजिक परामर्श के माध्यम से उन्हे इस पद्धति को अपनाने के लिए पे्ररित करें।इसमे साथ ही साथ इस कृषि पद्धति को अपनाने वाले समूहों को विशेष आर्थिक व तकनीकी सहायता दिये जाने का प्रावधान किया जावें।

 

3.   सिंचाई की सुविधाा का विस्तार (पारिस्थितिकी अनुकूलन का आधार)

सिंचाई सुविधाओं का अभाव भारतीय कृषि व्यवस्था के सुधार में सबसे बड़ी बाधा है। ’’मानसूनी जुआ’’ कहे जाने की मुख्य वजह भी यही है। यदि किसी वर्ष मानसून ठीक-ठाक रहा भी तो इससे केवल एक बार ही अच्छी फसल होने की संभावना बनती है किन्तु भारत की बढ़ती जनसंख्या एवं आवश्यकता के हिसाब से एक बार के फसल से न तो इसमें किसानों का भला होगा और न ही देश का। इसके लिए आवश्यक है ऐसी सिंचाई व्यवस्था जो वर्ष में कम से कम दो फसल के लिए  पर्याप्त हो। इस परिप्रेक्ष्य में पूर्व में हमारे देश में कई बड़ी सिंचाई परियोजनाएॅ क्रियान्वयित की गयी है जो कि की केवल पंजाब व हरियाणा जैसे कुछ एक राज्यों को छोड़कर ़ बाकि स्थानों में  केवल सूखा से निपटने में ही सहायक सिद्ध हुए हंै। भारतीय कृषि की वर्तमान आवश्यकताएं इन बड़ी सिंचाई परियोजनाओं से पूरी होती नही दिखाई पड़ती। साथ ही साथ इन बड़ी परियोजनाओं से जुड़ी बड़े पैमाने पर होने वाली प्राकृतिक विनाश तथा इनकी सुरक्षा की बाते इन बड़ी सिंचाई परियोजनाओं की औचित्यत्ता पर प्रश्न उठाते हंै। ऐसी स्थिति में तात्कालिन सिंचाई की आवश्यकता को पूरा करने हेतु 3 तरह के उपाय करने आवश्यक हैं-

1.   नदियों, नालों, झरनों, झरियों इत्यादि पर स्टाप डेम, चेक डेम, एनीकट इत्यादि का निर्माण

2.   नये तालाबों की खुदाई एवं पुराने तलाबों का गहरीकरण

3.   सिंचाई हेतु सौर ऊर्जा एवं आण्विक ऊर्जा का उपयोग

भारतीय गंाॅवों की भौगोलिक स्थिति का अवलोकन करने पर एक महत्वपूर्ण तथ्य उभरता है कि यहाॅ के प्रत्येक गाॅव किसी न किसी तरह छोटे-बड़े नालों, झरनों, झरियो या नदियों से जुड़े हुए हैं या गाॅवो के आस-पास से बहते हंै ये जल स्त्रोत जो बरसात में तो उफान पर होते हैं किन्तु बरसात के पश्चात पूरी तरह से सूख जाते हैं। यदि ऐसे जल स्त्रोतों पर स्टाप डेम, चेक डेम, एनीकेट इत्यदि बनाकर बरसात के पानी को आवश्यकतानुसार इकट्ठा कर लें तो सिंचाई की समस्या बहुत हद तक दूर की जा सकती है। इसी तरह गाॅवांे में अधिकाधिक बड़े स्तर के बहुउद्देशीय तालाबों का निर्माण कराया जाना चाहिए तथा पुराने तालाबों का जिर्णोद्धार करते हुए उसका गहरीकरण एवं विस्तारीकरण किया जाना चाहिए।

 

उपरोक्त दोनों तरह के उपाय से एक साथ कई आवश्यकताएॅ पूरी हो सकती है। सर्वप्रथम इसमें भूमिगत जल का स्तर ऊंचा होगा, जैव विविधता में बढ़ोत्तरी होगी, मछली पालन तथा जलीय खाद्य पौधों के उत्पादन किये जा सकते हंै तथा इससे ग्रामीण एक से अधिक फसले ले सकेंगे साथ ही साथ इससे ग्रामीण निस्तारी की पारंपरिकता भी बनी रहेंगी इन सबके अलावा भूमिगत जल का स्तर भी बढे़गा।

 

ऐसे मैं, भूमिगत जल का उपयोग सिंचाई के लिए किये जाने के पक्ष में नहीं हूॅ फिर भी यदि उपरोक्त दोनों उपाय जिन ग्रामीण भौगोलिक-पारिस्थितिक हालात में संभव नहीं हो सके हांे, केवल उन्ही सीमित ग्रामीण क्षेत्र्ा®ं में भूमिगत जल का उपयोग सिंचाई के लिए की जानी चाहिए। इसके लिए ऊर्जा संबंधी आवश्यकता को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा को प्राथमिकता देनी चाहिए ; यदि सौर ऊर्जा का विकल्प पर्याप्त न हो तो आण्विक ऊर्जा का प्रयोग करने से परहेज नहीं करना चाहिए। आण्विक ऊर्जा ताप ऊर्जा की अपेक्षा ज्यादा पारिस्थितिकी मित्र होगा ।

 

कृषि ऋण व्यवस्था में सुधार

वर्तमान में भारत में क्रियान्वयित कृषि ऋण की सभी योजनाएं भारतीय किसानों की आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने में असफल रहे हैं। इसके चार मुलभूत कारण हैं- 1. ऋण की पात्रता न्यायोचित नहीं 2. ऋण लेने की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल 3. रिश्वतखोरी  4. जानकारी का आभाव। इनमें पहला और तीसरा कारण ज्यादा हानिप्रद है। सरकारी या सहकारी बैंकांे से कृषि ऋण लेने की पात्रता की कठोरता के कारण इसका लाभ केवल बड़े कृषक या कहें तो धनी कृषक ही उठा पाते हंै। छोटे व मॅझोले किसान इसके फायदे से वंचित रह जाते हैं, क्योंकि भारत में कृषि भूमि का असमान वितरण इस मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। दूसरा केवल वही किसान ऋण ले पाते है जो बैंक अधिकारियों को रिश्वत दे पाने के योग्य हैं। उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ राज्य में 0 एवं 3 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर प्रति एकड़ रुपये दस हजार के हिसाब से ऋण लेने के किसान पात्र होंगे । इस व्यवस्था के अनुसार जिसके पास एक एकड़ से पांच एकड़ जमीन हो तो उसे रुपये दस हजार से लेकर पचास हजार तक ऋण उक्त ब्याज दर पर दी जावेगी तथा जिसके पास इससे अधिक कृषि भूमि है तो उसे उक्त ब्याज दर से अधिक ब्याज दर दी जावेगी । इससे कम भूमि धारक किसान को कम ऋण की राशि अल्प मात्रा में ही मिल पायेगी जो कि उसकी कृषिगत जरूरतों को पूरे करने में असफल होंगे । मैदानी भागों में 5 एकड़ से अधिक भूमि पर मालिकाना हक रखने वाले की संख्या बहुत कम हैं।  इन्ही सब कारणों से इस तरह केे कृषक बैंको से ऋण न लेकर साहूकारों और माहजनांे के ऋण के चंगुल में फॅंस जाते हैं तथा एक बार फॅसने के बाद ताउम्र उसी फंदे में फॅसे रहते हैं या फिर आत्महत्या कर अपनी इहलीला समाप्त कर लेते हंै।

औद्योगिकीकरण एवं विकास के नाम पर कृषि भूमि का अंधाधुंध अधिग्रहण पर रोक

अॅंग्रेजो द्वारा सन् 1884 में बनायी गई शोषण कारी भू-अधिग्रहण नीति आजादी के 64 वर्षो के बाद भी नहीं बदली गई है। यह भारतीय राजनेताओं की छद्म देशभक्ति के प®लंे खोलने के लिए पर्याप्त हंै। इस नीति पर तत्काल निषेध लगाते हुए नई भू-अधिग्रहण कानून लाना चाहिए जिसमें निम्न प्रावधान अवश्य होने चाहिए-

1.   यदि संकटापन्न स्थिति न हो तब-तक कृषि भूमि पर कृषिगत उद्योगों को छोड़कर अन्य  सभी प्रकार के औद्योगिकीकरण पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। केवल बंजर और निर्जन भूमि पर ही औद्योगिकीकरण के लिए प्रयोग किये जावें।

 

2.   यदि कृषि भूमि पर अधिग्रहण अनिवार्य हो गया हो तो सर्वप्रथम भूमि के बदले भूमि, उसी जैसी गुणो वाली भूमि दी जानी चाहिए ; यदि यह संभव न हुआ तभी भूमि मालिक को उस भूमि का तात्कालिक बाजार मूल्य का कम से कम दस गुना मूल्य देने के साथ-साथ प्रभावित परिवार के एक सदस्य को उसके योग्यतानुसार नौकरी दी जानी चाहिए। यदि नौकरी दिया जाना संभव न हो सके तो पीड़ित परिवार को कम से कम 30-50 वर्षो तक उसके भूमि के मूल्य के अनुपात में आय का लाभांभ रायल्टी के साथ में दिया जाना चाहिए।

 

3.   यदि भू-अधिग्रहण से प्रभावितांे को विस्थापित होना पड़ रहा हो तो कंडिका 2 के अलावा इनको न्यूनतम सुविधायुक्त समुचित आवास की व्यवस्था करानी चाहिए। प्रभावितांे के बच्च® ंको कक्षा 12वीं तक की मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था करानी चाहिए।

 

राष्ट्रीय फसल बीमा नीति

सामान्यतः यह देखा गया है कि भारतीय कृषकों की आत्महत्या की घटनाओं में प्रमुख कारण प्राकृतिक -अप्राकृतिक आपदाओं के वजह से आशानुकूल फसल न होना। जैसे कभी कम तो कभी अधिक वर्षा, कभी बाढ़ तो कभी सूखा, कीट-पतंगो का आक्रमण, बिच©ेेेेेेेेलियों का शोषण, समर्थन मूल्य पर सही समय में फसल का विक्रय न होना इत्यादि। कृषि में इस तरह की अनियमितताएँ स्वाभाविक है, अतः इन अनिश्चितताआंे का एक ही समाधान है फसल बीमा। अतः प्रत्येक किसान को अपनी फसल का  पर्याप्त बीमा कराने चाहिए। चूंकि प्रत्येक किसान आर्थिक दृष्टि से इस योग्य नही होते कि वे अपनी फसल का बीमा करा सके। इसके लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा वर्तमान में लागू राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में सुधार करते हुए एक नई फसल बीमा के लिए राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए जिसमें निम्नांकित बाते अवश्य रखनी चाहिए-

1.   सभी प्रकार के फसलो का बीमा अनिवार्य हो

2.   फसल बीमा का नियंत्रण पूरी तरह सरकारी हो

3.   100 प्रतिशत प्रिमियम राशि का भुगतान सरकार द्वारा किया जाना चाहिए। इसके लिए सरकार बीना ब्याज के ऋण किसानों के नाम पर सीधे सरकारी बीमा कंपनी में जमा करायें।

4.   ऐसे बीमित फसल को किसी भी प्रकार की क्षति न होने पर प्रिमियम की राशि सरकारी कोष में स्वतः ही समयोजित हो जाये।

5.   फसलों के क्षति होने की स्थिति में प्रिमियम की ऋणित राशि काटकर शेष कूल बीमित राशि पीड़ित किसान को पन्द्रह दिवस के भीतर दिये जाने चाहिए।

6.   फसलों की बीमा की पूरी प्रक्रिया के निर्धारण के लिए प्रशिक्षित फसल बीमा कर्मिकों के द्वारा पूर्ण करायी जानी चाहिए।

 

(5) अन्य हिन्सोन्मुख गतिविधियाॅ

वर्तमान भारतीय समाज में ऐसे तो उपरोक्त वर्णित हिंसाजनक मुददों के अलावा भी कई अन्य मुद्दें हैं किन्तु इन अन्य मुद्दों में सबसे गंभीर समस्या शिक्षा केे  क्षेत्र में पनपती ऐसी बाजारू व्यवस्था जो सामंतवादी असामानतामूलक गैर प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। जहां केवल  न्यूनसंख्यक अभिजात्य (धनीय) वर्ग के बच्चों  के शिक्षा के अनेकोनेक अवसर खुलते जा रहे है, वहीे बहुसंख्यक निर्धन वर्ग के बच्चों के लिए सभी तरह की शिक्षा तथा इससे जुड़े अवसरों के द्वार बंद होते जा रहें हंै।

ट्यूशन और कोचिंग का गोरख धंधा बड़ी तेजी से फल-फूल रहा है। इन कोचिंग स¢ंटर¨ं से उन अभिजात्य वर्गीय छात्र-छात्राओ की बात बनी तो ठीक नहीं तो मैनेजमेंट कोटा है ही। तात्पर्य येन-केन-प्रकारेण अच्छी शिक्षा या कहें रोजगारोन्मुख शिक्षा का हक सिर्फ  पैसे वालों के लिए ही है और परम्परागत गैर तकनीकी  बेकारीमूलक शिक्षा गरीबों के लिए। एक मजदूर या निम्न आर्थिक वर्ग का बच्चा आई. एएस., आई.आई.एम. तथा आई.आई.टी. बनने या पढ़ने का सपना नही देख सकता।

 

वर्तमान 21वीं सदी जो ज्ञान आधारित आर्थिक व्यवस्था (ादवूसमकहम इंेमक मबवदवउल) पर टिकी हुई है। जहाॅं जिसके पास जितनी अच्छी शिक्षा होगी उसक¢ पास न©करी व ब्यावसाय क¢ उतने अधिक अवसर ह¨ंग¢ अतः वह उतना ही अधिक सुखी  और सम्पन्न  होगा ऐसी स्थिति में अवसर मूलक शिक्षा का धनाढ्य वर्गों तक केन्द्रित होते जाना एक गंभीर भावी खतरे की ओर इशारा करता है। इसस¢ बेकार, निराश बहुसंख्यक असंतोष निर्धन युवाओं का हिंसा जैसी अवश्यभावी परिणाम की ओर उन्नमुख होने की विवषता बढ़ते जा रही है। इसे रोका जाना जरूरी है, इसे रोके जा सकते हंै। इसके लिए एक समेकित राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाकर उसका क्रियान्वयन करना होगा, जो सबको सब प्रकार की शिक्षा बिना किसी भेदभाव के दे सकने में सक्षम ह¨। इसके लिए शिक्षा नीति में पहली बात यह होनी चाहिए कि देश में किसी भी तरह की समानान्तर शिक्षा व्यवस्था न हो, सभी प्रकार के निजी शिक्षणालयों (बिना लाभ के धर्मस्व उद्देश्यो के लिए स्थापित शिक्षणालयों को छोड़कर) पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाते हुए उसे सरकारी घोषित  किया जावे तथा इनमें कार्यरत योग्यताधारी कर्मिकों/शिक्षकों की सरकारी नियुक्ति की जावे।

 

निष्कर्ष

वस्तुतः आज न केवल भारत बल्कि समूचा विश्व बारूद के ढेर के मुहाने पर बैठा विनाश की प्रतिक्षा कर रहा है, जिसे पूंजीवाद (सांमतवाद), सम्प्रदायवाद, जातिवाद, प्रजातिवाद, भ्रष्टाचार, क्षेत्रीयतावाद, भाषावाद, नक्सलवाद इत्यादि जैसी विघटनकारी ताकतें हवा दे रहे हैं; आग सुलगते जा रहा है। समय रहते इन प्रलयंकारी विषैली हवाओं का मुख न मोड़ा गया तो भारत सहित इस संपूर्ण भू-लोक को शायद ही कोई बचा सके। जरूरत इस बात की है कि हम समय रहते इन बाॅतो को समझ जायें और इन्हें नाश करने की दिशा में हर संभव प्रयास कर¢ं। इसके लिए सर्वप्रथम ‘‘हमें हर किस्म के भेदभाव से रहित होना होगा, जन्म, जाति, लिंग, रंग,रूप, वंश, वर्ग, भाषा, क्षेत्र इत्यादि दकियानुसी मानसिक सरहदे तोड़कर केवल इतना ही याद रखंे ंकि हम सब एक हैं ’’मानव जाति’’ जिसके सभी के दो हाथ, दो पैर, दो कान, एक नाक है तथा हम सब के जिस्म में लाल रंग का ही लहू दौड़ता है, किसी और रंग का नहीं।‘‘ आज हमारा एक ही धर्म होना चाहिए मानवधर्म  अर्थात  बिना किसी भेद के जरूरतमंद मानव मात्र की सेवा, एक दूसरे के प्रति सच्चा प्रेम, सहिष्णुता व बन्धुत्व की भावना। ऐसी भावना केवल मानवों तक ही सीमित न हो बल्कि अनुकूलन के स्वाभाविक सिद्धांतांे के अनुसार नभ, जल-थल तथा इसके प्रत्येक सजीव-निर्जीव अवयवों से भी हो ताकि सदियों तक अक्षुण विश्व कायम रहे बिना किसी हिंसा के।

इसकी शुरूआत हमें अपने वतन भारत से करनी होगी क्योंकि इस श¨ध आलेख के उद्व्हरण¨ं अनुसार आज भारतवर्ष अनेकानेक हिंस¨न्मुख गतिविधिय¨ं की ओर अग्रसर हैं। हम भारतीय माने या ना माने पश्चिम के देशों ने कमोवेष मानवतावाद संबंधी उपर¨क्त बाॅतों को कुछ हद तक माना है और शायद इसलिए वे हमसे पहले धरती के सारे ऐश्वर्य  भोग  चुके हंै। मेरी दृष्टि से पश्चिम की सबसे बड़ी भूल पूंजीवादी व्यवस्था थी, जो आज लगभग धाराशायी होते दिख रही है। तुलनात्मक रूप में पश्चिमी देशों की अपेक्षा भारत में जाति, लिंग, धर्म, भाषा, क्षेत्र, पंत, समुदाय, तथा रंग-रूप इत्यादि आधारित भेदभाव और इनसे संबंधित हिंसा तो पहले से ही अधिक मात्रा में विद्यमान थी जिसकी चर्चा इस लेख के ऊपरी वर्णनो में हंै। आजादी के बाद इनमंेे कुछ कमी आयी जिसे कुछ परम्परावादी ताकतें अभी भी बाधित करने की कोशिश में लगे हंै। कहने को तो हमारी आजादी को आज 64 बरस हो चुके लेकिन क्या हम सच्चे मायने में अभी पूर्णतः स्वतंत्र हो पाये हैं। लोकतंत्र के सही मायने तो हम कुछ पिछले 20-25 वर्षो से समझ पाने की कोशिश कर रहे हंै क्योकि यहाॅ तो वंशवादी, जातिवादी, धर्मवादी, धनवादी, बलवादी लोगों की दबंगई चलती आई है; वे जिन्हें चाहें हैं वही राजा बनते आयेे हंै। दूसरे शब्दो में जो राजा थे वे आज भी राजा हंै , ऐसे में लोकतंत्र कहाॅ है? फिर भी  पिछले 20-25 वर्षो में कुछ बदलाव आया है। ठीक इसी तरह साम्प्रदायिकता और जातिवाद. की बाते हैं; भारतीय  मानस इन अमानवीय विकृतियों से अपने को अभी तक पूर्णतः मुक्त नही कर पाया है। आधुनिकवाद और वैश्वीकरण के ताकतों ने जरूर इस पर वार किया है, इन्ही कारण¨ं सेे इन अमानवीय विकृतियों में बदलाव देखा जा रहा है। यहाॅ भी वही पाखण्डवादी ताकतंे बीच में कुछ बाधा पैदा करते रहते हैं। पश्चिमी समाज इन बातों से भारत की तुलना वें कुछ हद तक मुक्त हो गया है और यही कारण है कि एक “अश्वेत” संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी महाशक्ति का राष्ट्रपति चुना गया है। मैं मानता हूं कि केवल राष्ट्रपति बनने से ही इसे ठीक नहीं मान सकते किन्तु यह सच है कि इसके अलावा भी वहाॅं सच्चे मायनों में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता कायम है। तभी तो वहाॅ लाखो भारतीयों सहित दुनिया के अनगिनत देशांे के लोग  न केवल अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हंै, बल्कि व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं राजनीति जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रांे में बढ़चढ़कर अपना योगदान दे रहे हंै। जबकि इसके ठीक विपरीत एक विदेश की बेटी ज¨ भारत में बहू बनकर  भारतीय परंपरानुसार भारतीय संस्कृति में घुल मिल चुकी है के देश के महत्वपूर्ण पद पर आसीन हो जाने  की संभावना के तारतम्य में कुछ लोग आत्महत्या करने को उतारू हो गये थे। यह कैसी विडंबना है कि जब भारतीय मूल का कोई व्यक्ति किसी विदेशी राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष या अन्य किसी अति महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किये जाते हैंे त¨ हम भारतीयो की छाती गर्व से फूल जाती है किन्तु जब वैसी ही बात हमारे देश में होने को होता है तो देश की राजनीति में तूफान आ जाता है। इसलिए यह तथ्य प्रस्फूटित होता है कि अमेरिका या यूरोपीय राष्ट्रो जैसे धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मूल्य¨ं तक भारत को पहुंचाने मेें अभी और वक्त लगेगा। समस्या यहाॅं यह है कि जिस एक बड़ी गहरी खाई पूंजीवाद ने पश्चिम को आज बर्बादी के मुॅहाने पर ला खड़ा किया है, भारत आज उसी सूरसारूपी पूंजीवाद के असीम मॅंूह की ओर अग्रसर है। पूंजीवाद  कभी भी समानतामूलक समाज की स्थापना नहीं कर सकता क्योंकि यहाॅ केवल एक ही लक्ष्य होता है ’’आमदानी’’ किसी भी कीमत पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जहाॅ कहीं भी किसी अतिवादी या अतिवाद ने सर उठाया है, एक समय के बाद वहाॅ कि आवाम ने एकजुट होकर उसका सर कूचल दिया है, चाहे वह लीबिया का तानाशाह हो या मिश्र, सीरिया या अन्य राष्ट्रो का। आज 21वीं सदी के संचार क्रांति के युग में अभिजात्य वर्ग की छद्म तानाशाही नही चल सकती। वैसे हमारे ही देश में अगस्त 2011 में एक गाँधीवादी समाजसेवी के नेतृत्व में एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन के द्वारा इस ओर संकेत जरूर दिया है कि अब भारत में छद्म तानाशाह बर्दाश्त नही किया जा सकता। वह तो भला हो कि इस आंदोलन का नेतृत्व एक शांतिप्रिय गाँधीवादी कर रहा था, कल्पना करे कि यदि ऐसे किसी राष्ट्रव्यापी आंदोलन का नेतृत्व माओवादी या इनके जैसे किसी अन्य चरमपंथी के हाथ में हो तो इसके अंजाम के अंदाजे से ही दिल दहल उठता हैै। इस परिप्रेक्ष्य में हमारे पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में व्याप्त माओवाद को एक उदाहरण के रूप में ले सकते हंै। ‘‘यदि इसी तरह कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार राजनीति इत्यादि क्षेत्रांे में इसी दर से असमानता पनपती रही तो वह दिन दूर नही जब माओवाद जैसी विचारधारा बिहड़ो एवं जंगलो से निकलकर भारत के सड़को में दिखाई पड़े तो इसमें कोई आश्चर्य नही होगा।‘‘

 

अतः अब समय आ गया है कि भारत पश्चिमी राष्ट्रांे की आर्थिक दशा से सबक लेते हुए और केवल वही मार्ग चुने जो देश में एक समतामूलक शांतिवादी समाज की स्थापना करने में सक्षम हो, जहाँ लोग केवल लेने के लिए ही नही बल्कि अपने में से किसी दूसरों को देने की बाते करने लगे। केवल दिखाने के लिए लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता न हो, भारतीय जनमानस को अब अपना दिल बड़ा करना होगा और इसे अपनी आम जिंदगी में अमल में लाना होगा जिससे जाति, लिंग, धर्म, भाषा, क्षेत्र, पंत, समुदाय, तथा रंग-रूप इत्यादि के संकीर्ण सीमाओं से मुक्त एक शांतिप्रिय समाज की स्थापना हो सके।

 

संदर्भ सूची

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Received on 30.06.2012

Revised on   09.10.2012

Accepted on 25.10.2012     

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Research J. Humanities and Social Sciences. 4(3): July-September,  2013, 293-308