राजनांदगांव जिले मंे जंगल सत्याग्रहः बदराटोला के विशेष संदर्भ में

 

एवलाल मेंश्राम

संविदा सहायक प्रध्यापकए इतिहास अध्ययन शाला पं रवि शंकर वि.वि. रायपुर (छ.ग.)

 

 

प्रस्तावना

रूस में 1917 ई. में हुई क्रांति ने विश्व में विभिन्न स्थनो ंपर हो रहे अत्याचारों व शोषण प्रवृत्तियों के विरुद्ध संघर्षरत जन समूहों की आवाज को और भी सशक्त बनाया । भारतीय जनता नें भी इससे प्रेरित होकर उन पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाई । भारतीयों नें इस समय अपना विरोध प्रकट करपे के लिए पारंपरिक तरिकों को नही चुना। उस समय तक भारतीय राजनीति पटल पर महात्मा गांधी का अविर्भाव हो चुका था और उन्होने भारतीयों कांे विरोध प्रदर्शित करने का एक नवीन मार्ग सुझाया ।यह मार्ग था सत्याग्रह ।यह पूर्णतया अहिंसात्मक तरीका था। सत्याग्रह की परिभाषा देते हुए स्वतः गांधी जी नें कहा था सत्य पर अटल रहना ही सत्याग्रह है ।सत्याग्रह असत्य को सत्य से व हिंसा को अहिंसा से जीतनें का नैतिक शास्त्र है इसका उद्देश्य धैर्य पूर्वक ,कष्ट सहकर ,अहिंसात्मक एवं उचित तरीके से सत्य को प्रकट करना , भूलों को सुधारना एवं भूल करने वालों का हृद्य परिवर्तन करना है।सत्याग्रह एक सरल किन्तु अचूक उपाय है ।

 

जब सारा देश स्वाधीनता आंदोलन के द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष कर रहा था ।वनो पर ब्रिटिश सरकार के दखल आदिवासीयों को स्वीकार नही था । ग्रामिणों और आदिवासीयों का मानना था कि वन और वनोपज पर वहां केनिवासियों का जन्म सिद्धअधिकार है, वहां प्रवेश से उन्हें रोकना उनके मूलभूत अधिकारो का हनन है । जंगल सत्ग्रहों का मुख्य उद्देश्य सुरक्षित व संरक्षित वनों की उपज का स्वतंत्रता पूर्वक उपयोग करने के लिए सरकार पर दबाव डालना था। जगल सत्याग्रहि सत्य व अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए जंगल कानूनों को भंग करते थे। जंगल सत्याग्रह का मूल कारण शासन द्वारा जंगल के निस्तारी हक पर प्रतिबंध जो आदिवासीयों, वनवासीयों का पैदायसी हक था। ब्रिटिश शासन ने ंवन प्रदेश और उसके उपयोग पर लाइसेंस लगा दिया था । इससे आदिवासियों व ग्रामिणों का आर्थिक जीवन पूरी तरह प्रभावित हुआ ।एक ओर तो उन्हें आरक्षित जंगलों में कम मजदूरी पर काम करना पड़ता था या बेगारी करनी पड़ती थी । दूसरी ओर अपनी खेती का विस्तार करने या एक टुकड़ा जलाऊ लकड़ी लाने का भी उन्हें अधिकार नहीं था। जंगल में मुफ्त मिलने वाली लकड़ी उन्हें खरीदनी पड़ती थी। इस तरह उनका दोहरा शोषण हो रहा था और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाना ही जंगल सत्याग्रह आंदोलन का उद्देश्य था।

 

नागपुर राज्य के शासक रघु जी तृतीय की मृत्यु के पश्चात् उसके राज्य को ब्रिटिश समा्रज्य में शामिल कर लिया गया। नागपुर राज्य के ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल किये जानें के साथ ही छत्तीसगढ़ का क्षेत्र भी अंग्रेजी शासन के अंतर्गत आ गया। इस राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में विलीन कर लेने के पश्चात वहां के प्रशासनिक व्यवस्था में अंग्रेजों द्वारा समय समय पर परिवर्तन किया गया ।ब्रिटिश सरकार नें भारतीय वन अधिनियम में परिवर्तन लाया। पूर्व भारत में भारतीय वन विधान 1878ई. प्रयोग में लाया जाता था।1927ई .के भारतीय वन अधिनियम के बनने के पूर्व इसमे चार संशोधन 1890 ,1901,1918और 1919ई. में हुए।

विधेयक के उद्देश्य एवं कारणों का प्रकाशन भारतीय राजपत्र 1926 खंड 5,पृष्ट 165 में दिया गया है। इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय वन अधिनियम 1926 है । इस अधिनियम द्वारा वनों को दो भागों में आरक्ष्ति वन एवं संरक्ष्ति वन में विभाजित कर दिया गया था ।धारा -2राज्य सरकार आरक्षित किसी वन भूमि या पड़त भूमि जो सरकार की संपत्ति है या जिस के जिस पर सरकार का अधिकार है या जिसकी वनोपज की पूरी अथवा किसी भाग की सरकार हकदार है । जिससे इसके पश्चात् उप-बंधित रीति से आरक्षित वन बना सकेगी। यह वन अधिनियम सन् 1887 ई धारा-3 के अंतर्गत वर्णित है । वन अधिनियम 1878 धारा -29के तहत राज्य शासन के किसी भी संरक्षित वन क्षेत्र या वन भूमि जो आरक्षित भूमि न हो उसे अपने संरक्षण में लेकर संरक्ष्ति वन घोषित कर सकता है । ऐसे संरक्षित वनों की कटाई ,वन वर्धन ,वृक्षारोपण आदि कार्य कराए जा सकते हैं ।

आरक्षित तथा संरक्षित वनों में वन ग्रामों की स्थापना किया गया था। नियम 1878 धारा म.प्र.वन ग्राम नियम:-(1) यह नियम भारतीय वन अधिनियम द्वारा म.प्र. राज्य में वन पर स्थापित वन ग्रामों में लागू होगे। ये नियम म.प्र. वन ग्राम नियम कहलायेंगे।(2) सभी विधान वन ग्रामों को इन नियमों से अधिसूचित किये जानें के दिनांक से नियम के अधिन वन ग्राम माना जाएगा ।(3) वन संरक्षक तथा अन्य वन अधिकारी वन ग्रामों की स्थापना के लिए प्रस्ताव तैयार करते समय न केवल किसी विशिष्ट क्षेत्र में व कार्यो के लिए श्रमिकों की आवश्यकता को ध्यान में रखेंगें ,बल्कि इन बातों का भी ध्यान रखेंगे ।फिर ऐसे ग्रामों में बसनें वाले व्यक्ति को कृषि या सहाय का व्यवसायों के माध्यम से उनको आजीविका उपार्जन के लिए पर्याप्त सुविधाएं प्राप्त हों ।(4) वन में आग लग जाने की स्थिति या आपात मामलों वन मंडलाधिकारी या उसके अधीनस्थ कर्मचारी वन ग्राम के आदिवासी या उसके परिवार के सदस्य को वन ग्राम के कार्यो ं में सामान्य मजदूरी पर काम करने के लिए रख सकेंगे।(5) आदिवासी उतनें ही पशु रखनें का हकदार होगा जितनें पशु राज्स्व ग्रामों के निवासी निस्तारी नियमों के अधिन रख सकतंें हैं। वह उसी मान पर चराई शुल्क का भुगतान करने ंके लिए उत्तरदायी होगा। भारतीय वन अधिनियम 1878 की धारा 26वी. उप धारा(2) के खण्ड (क) धारा 32के खण्ड(ट) तथा धारा 76 द्वारा प्रदत्त शक्तियों को प्रयोग में लाते हुए राज्य सरकार एत्द द्वारा संपूर्ण मध्य प्रंात में सरकारी वनों में चराई विनियमन करनें के लिए नियम बनाय।

 

भारतीय वन अधिनियम से उपजा असंतोष 1927 ई. के भारतीय वन अधिनियम से और गहरा गया ।जिसमें उपरोक्त नियम की विशुद्ध व्याख्या की गई थी और साथ ही उसके तत्कालीन कानून व्यवस्था को भी प्रभवित किया। एक्ट-ग्टप् ,1927 ई. के तहत संरक्षित और आरक्षित वन पूर्णतः शासनाधीन किये गये थे । जिन पर जनता का अधिकार नही था ।वनाधिकारी लकड़ी और वनोंपज पर कर लगाने व बढ़ाने के अधिकारी थे । तत्संबंधी नियम और कानून उन्ही के अधिन में आते थे । चराई नियम का कठोरता से पालन किया जाता था। किसी भी स्थिति मंे इस नियम का उल्लंघन करने पर कठोर दंड का प्रावधान था। वन अधिनियमों से स्पष्ट इंगित है कि प्रकृति प्रदत्त वनों को सरकारी संपत्ति घोषित किया गया था। जिस पर आम जनता का कोई अधिकार नही था ग्रामीण व आदिवासी जनता, जिनका दैनिक जीवन वनों द्वारा प्रभावित था। इसका विरीध होना ही था।

 

रोलेक्ट एक्ट ,जलियाँवाला हत्याकाण्ड और खिलाफत के प्रश्न ने गांधी जी को ब्रिटिश शासक का विरोधि बना दिया । सन् 1920 ई में कांग्रेस नें गांधी जी को ब्रिटिश शासन के खिलाफ अहिंसात्मक आंदोलन चलाने का अधिकार प्रदान कर दिया । इस प्रकार सन् 1920 ई का वर्ष असहयोग का संदेश लेकर , गांधी जी का 20 दिसंबर सन 1920ई में छत्तीसगढ़ आगमन हुआ । उनके आगमन से इस अंचल में राजनितिक हलचल तीव्र हो उठी ।गांधी दो दिन के छत्तीसगढ़ प्रवास में जनता जागृत कर गये । जंगल सत्याग्रह छत्तीसगढ़ में असहयोग आंदोलन के पूर्व ही दृष्टि गोचर होने लगी थी । लेकिन यह आंदोलन सविनय अवज्ञा आदोलन के दौरान कांग्रेस द्वारा विशेष रूप से अपनाया गया कांग्रेस ने जंगल सत्याग्रह आदोलन से ग्रामीण व आदिवासीयों को स्वतंत्रता आदोलन से जोड़ने के लिए कार्यक्रम बनाया था।

 

राजनांदगांव रियासत के जनता में पर्याप्त राष्ट्रीय जागृति आ चुकी थी । यहां कांग्रेस कमेटी का गठन हो चुका था इसका प्रथम अधिवेशन सन् 1939 ई में अंजोरा ग्राम में कामरेड रूईकर के नेतृत्व में हुआ था ।ठाकुर प्यारेलाल सिंह की सलाह पर जंगल सत्याग्रह करने का प्रस्ताव पारित किया गया । ब्रटिश शासन के विरोध से राजनांदगांव रियासत भी अछूता ना रहा । आजादी की लड़ाई में सभी रियासतों में राजनांदगांव और छुईखदान सदैव आगे थे।वर्तमान राजनांदगांव जिलें के छुरिया विकासखंड में एक छोटा सा गांव बादराटोला है। सन् 1939 ई. में ग्राम बादराटोला में अंग्रेजों के दमनकारी वननीतियों के विरोध में जंगल सत्याग्रह आदोलन करने का फैसला किया बुद्धू लाल साहू ,लोटनसिंह ठाकुर एवं रामाधीन गोंड़ के नेतृत्व में जंगल सत्याग्रह का घोंषण किया। जंगल सत्याग्रह के लिए बादराटोला के पास ही चेपटीडोगरी (जंगल) का चयन किया गया था।जंगल सत्याग्रह पर जाने की सूचना डोगरगांव कैंम्प में तहसीलदार सुखदेव राम देवाँगन को 19 जनवरी 1939 ई. को दिया गया। पूर्व लिये निर्णय के अनुसार 21 जनवरी 1939 को बुद्धू लाल साहू के नेतृत्व में आसपास के गांवों से सत्याग्रही बादराटोला में एकत्रित हुए ।

 

21 जनवरी 1939ई के दिन सोमवार को बादराटोला में जंगलसत्याग्रह चरम सीमा में थे ।प्रत्येक के दिल में आजादी की भावना थी । कोई पीछे हटनें के लिए तैयार न था।देशी रियासत और अंगे्रजी शासन की ओर से सत्याग्रहीयों पर दमनचक्र टूट पड़ा था। गांव में 4 बजें सत्याग्रह किया जाना था ।पूरा गांव एकत्र था सभी को चार बजने की प्रतिक्षा थी। जोश का सागर उमड़ पड़ा था,बार -बार वंदे मातरम के नारे बुलंद हो रहे थे। सब के हाथों में तिरंगे झंडे थे । इस वातावरण में ठीक एक बजे राजनांदगांव रियासत और अंग्रेजों के बंदूक-धारी सैनिक आ धपके साथ में घुड़सवार भी थे। इनका नेतृत्व तहसीलदार सुखदेवराम देवांगन व थानेदार रमादत्त पांडे कर रहे थे।शासन का अनुमान था कि बंदूक धारी सैनिकों कांे देखकर ग्रामवासी भाग जाएंगे,किन्तु ऐसा कुछ भी नही हुआ।

 

तहसीलदार के आदेश पर बुद्धू लाल साहू के गिरफ्तार कर प्राथमिक शाला में कैद कर दिया ।इसका सत्याग्रहियों एवं ग्रामीण आदिवसियों नें विरोध किया और प्राथमिक शाला के सामने ही धरनें पर बैठ गये। शांति पूर्वक प्रदर्शन कर रहे सत्याग्रहीयों पर अंग्रेजी रियासत द्वारा बल प्रयोग एवं लाठी चार्ज किया । गांव में धारा 144 लगा दिया।भीड़ नहीं हटने पर गोली चलानें की धमकी दिया। रामाधीन गोंड़ नें इस पर हुंकार लगाई और सीना तानकर सामने खड़ा हो गया ।सत्याग्रहियों का उत्साह बढ़ाने वंदेमातरम का गगन घोष किया।तहसील दार अपनें क्रोध पर काबू न रख पाया और उसने गोली चलाने का आदेश दे दिया।सीना तानें खड़े रामाधीन गोड़ के सीने में गोली लगी और वह वही पर भारत माता के लिए शहीद हो गया। इसके अलावा अन्य 6 लोंगों को गोलियाँ लगी जिसमें उदासा बाई के मस्तक में गोलियां लगी थी , सुगदी बाई के पेट में गोली लगी थी ,रेवती दास वैष्णव के पीठ मंें गोली लगी थी ,मुरहा गोड़ के जांघ में गोली लगी थी ,दुगदी बाई गोड़ीन के घुटने में गोली लगी थी तथा एक अन्य के पैर में गोली लगी। बांधाबाजार कार्यालय को चूचना देकर घायलों कों जिला चिकित्सालय दुर्ग भेज कर वहां उन्हें भर्ती किया।बुद्धू लाल साहू लोटन सिंह धन्नालाल जैन को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया । जिन्हें पांच माह बाद रिहा कर दिया गया।महिला सत्याग्रही गणेशा बाई ,जगोतिबाई, सावली बाई को गिरफ्तार कर जेल से एक सप्ताह बाद रिहा कर दिया गया।

 

स्वाधीनता का मूल्य केवल स्वाधीन आदमी ही जनता है ऐसे ही स्वाधीनता के पुजारीयों में अमर शहीद रामाधीन भी था। जो कि जंगल सत्याग्रह में अंग्रेज सैनिकों के गालियों का शिकार हुआ और इसी के साथ राजनांदगांव रियासत के इतिहास के पन्नों में अमर कर गया। रामाधीन अपने प्राणों का न्योछावर कर बादराटोला का नाम दतिहास में अमर कर दीया ।

 

आंदालनकारीयों के प्रति रियासति प्रशासन का रूख बड़ा कठोर था ।वे कठोर रूप अपनाकर आंदोलन कांे कुचल देना चाहते थे । जंगल आंदोलन का उग्र रूप राजनांदगांव शहर में मार्शल ला के रूाप में दिखाई देता है । रियासति एवं ब्रिटिस शासन के कठोर रूप के पश्चात भी यह जंगल सत्याग्रह 6 अप्रैल 1939 ई. तक चलता रहा । सत्याग्रह के दमन के विरुद्ध जिला कांग्रेस नें 5 मई 1939 ई को राजनांदगांव रेलवे स्टेशन के पास एक बड़ा आंदोंलन करने के लिए एक सभा रखी थी।किन्तु गांधी जी द्वारा भेजा एक तार वर्धा से सत्याग्रहियों को प्राप्त हुआ। जिसमें सत्याग्रह स्थगित करने की सूचना दी गई थी। इसके फलस्वरूप 5 मई की सभा स्थगित कर दिया गया।

 

शहीद स्थल पर रामाधीन गोंड़ का शहादत का स्मरण दिलाता शहिद स्मारक आज भी खड़ा है । उसके शहादत दिवस पर प्रति वर्ष 21 जनवरी को शहीद दिवस मनाया जाता है शहीद स्मारक में एक पुस्तकालय की स्थापना की गई है । बादरा टोलर के जंगल सत्याग्रह के पूरे घटना ने ग्रामीण एवं आदिवासीयों को अपने अधिकारों के प्रति जागृत किया ।इससे उनमें अपनी रक्ष के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा ली और अहिंसा के रास्ते पर चलने का अदम्य साहस का परिचय दिया । जंगल सत्याग्रह नें आदिवासीयों के नेतृत्व क्षमता को बढाया। उनकी जन्म जात साहस ,सत्यनिष्ठा के गुणों को प्रदशित करने का अवसर दिया।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची

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3ण् जी. पी .शर्मा, म.प्र. में राष्ट्रीय आंदोलन (छत्तीसगढ़ के विशेष संदर्भ में), 1989 नई दिल्ली।

4ण् भगवान सिंह वर्मा ,छत्तीसगढ़ का इतिहास राजनीतिक एवं सांस्कृतिक, म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी, पृ. क्र. 120

5ण् वी. आर .मार्टिन एण्ड डब्ल्यू. वी.चिलोटी ,ए.आई. आर. मेनवल, सिविल एण्ड क्रिमिनल,संस्करण 4,खण्ड 19 ,पृ.क्र.611

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7ण् जे. पी. श्रीवास्तव ,वही, पृ.क्र. 67

8ण् जे. पी. श्रीवास्तव ,वही, पृ.क्र. 146

9ण् वी. आर .मार्टिन एण्ड डब्ल्यू .वी. चिलोटी, पृ.क्र. 604

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11ण् भगवान सिंह वर्मा,वही पृ.क्र. 154-55

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16ण् राजकुमार शर्मा, समकालिन पत्रकार (डोंगरगांव) से प्राप्त हस्त लिखित नोंट्स ,पृ.क्र. 1

17ण् शरद कोठारी, सबेरा संकेत समाचार पत्र, अमर शहीद रामाधीन,(मेघनाथ कन्नौजे) पृ.क्र.4

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20ण् शरद कोठारी, सबेरा संकेत समाचार पत्र, अमर शहीद रामाधीन,(मेघनाथ कन्नौजे) पृ.क्र.4

21ण् सुमन लता साहू, राजनांदगांव रियासत में 1942 ई का स्वतंत्रता आंदोलन ,पृ.क.77

22ण् अजय दुबे, जंगल सत्याग्रह (शोध प्रबंध) ,पं. रवि शंकर शुक्ल वि. वि. रायपुर(छ.ग.) ।

 

Received on 05.02.2013

Revised on 25.02.2013

Accepted on 01.03.2013

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Research J. Humanities and Social Sciences. 4(3): July-September, 2013, 319-321