भारत में जनांकिकीय प्रवृत्तियाँ एवं उनका प्रभाव:

(साक्षरता एवं जन्मदर के विशेष संदर्भ में)

 

आर.पी सहारिया

विभागाध्यक्ष अर्थशास्त्र विभाग, शासकीय.जे.एम.पी. महाविद्यालय, तखतपुर, जिला बिलासपुर (छ.ग.)

 

सारांश -

किसी भी देश के आर्थिक विकास के निर्धारक घटकों में प्रमुख घटक साक्षरता है। देश के विकास हेतु प्राकृतिक, मानवीय संसाधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, परन्तु अभी भी देश में विकास हेतु आवश्यक कुशल एवं प्रशिक्षित जनशक्ति का आभाव है। शिक्षा एक ऐसा आर्थिक एवं सामाजिक घटक है जो व्यक्ति की उत्पादकता में वृद्धि के साथ साथ एक सुदृढ परिवार एवं समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

 

प्रस्तावनाः-

किसी भी देश के आर्थिक विकास में वहाँ की जनसंख्या का महत्वपूर्ण योगदान होता है। जनसंख्या राष्ट्र की सम्पत्ति होने के साथ साथ राष्ट्र का दायित्व भी होता है किसी भी देश का आर्थिक विकास तथा सुख समृद्धि एक बड़ी सीमा तक उस देश की जनसंख्या एवं उपलब्ध प्राकृतिक ससाधनों पर निर्भर करती हैं आज विश्व जनसंख्या का आँकलन करने पर हम यह पाते है कि आज संपूण्र विश्व की जनसंख्या में निरंतर तेजी से वृद्धि हुई हैं, जो सम्पूर्ण विश्व के लिये गंभीर चिंता का विषय है।

 

विश्व के साथ-साथ भारत की जनसंख्या में भी विभिन्न जनगणनाओं के आंकड़े उठाकर देखने पर ज्ञात होता है कि भारत की जनसंख्या में भी 1872 प्रथम जनगणना के बाद से वर्ष 2001 तक निरंतर वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2011 की जनगणना के परिणामों से यह खुशी अवश्य हुई है कि जहां जनसंख्या की वार्षिक वृद्धि दर वर्ष 2001 में 2.15 प्रतिशत, थी वह घटकर वर्ष 2011 में 1.76 प्रतिशत रह गई है तथा साक्षरता में वृद्धि के साथ-साथ साक्षरता की दर में भी वृद्धि हुई है। 2001 में साक्षरता 64.83 प्रतिशत थी, जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 74.04 प्रतिशत हो गई है तथा साक्षरता स्त्री-पुरूष असमानता में 4.91 प्रतिशत की कमी आई है। प्रस्तुत शोध पत्र के माध्यम से भारत में जनांकीय प्रवृत्ति एवं उनके प्रभावों को जानने का प्रयास निम्न उद्देश्यों से किया है।

 

शोध के उद्देश्यः-

1. भारत में जनसंख्या वृद्धि दर को ज्ञात करना?

2. शिक्षा व जनसंख्या वृद्धि की दर में संबंध को ज्ञात करना?

3. परिवार कल्याण कार्यक्रमों का जनसंख्या वृद्धि पर पड़ने वाले प्रभावों को ज्ञात करना?

4. जनसंख्या वृद्धि का खाद्यान्न उपलब्ध पर पड़ने वाले प्रभावों को ज्ञात करना।

5. जनसंख्या वृद्धि के अन्य प्रभावों को ज्ञात करना।

 

शोध प्रविधि:-

07 वर्ष और उससे अधिक आयु का व्यक्ति जो भाषा को समझ सकता हो उसे लिख और पढ़ सकता हो साक्षर कहलाता है प्रस्तुत शोध द्वितीयक समंकों पर आधारित है। समंकों के संकलन हेतु विगत दशकों की जनगणना जैसे 19814,1991,2001 एवं 2011 से संबंधित जनसंख्या पत्रिकाओं एवं विभिन्न शोध पत्रिकाओं, समाचारपत्रों का उपयोग किया गया है। संकलित समंकों का प्रतिशत, मानचित्र एवं आरेखों द्वारा प्रस्तुति करण किया गया है।

 

विश्लेषण:-

शोध उद्देश्यों को ज्ञात करने के लिये द्वितीयक समंकों का उपयोग किया गया है तथा प्रस्तुत शोध पत्र में जनसंख्या वृद्धि के सामाजिक व आर्थिक पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है। विशेष रूप से साक्षरता दर व जन्म दर को एक यंत्र के रूप में प्रयोग कर साक्षरता का जन्मदर पर पड़ने वाले प्रभावों का आकंलन किया गया है। साथ ही बढ़ती जनसंख्या का खाद्यान्न उपलब्धता व उत्पदकता पर पड़ने वाले प्रभावों को आंकने का प्रयास इस शोध पत्र में किया गया है जनसंख्या की दृष्टि से भारत का विश्व में दूसरा स्थान है। बढ़ती जनसंख्या किसी भी राष्ट्र के लिये चुनौती व परिसम्पति दोनों रूपों में होती है क्योंकि प्रत्येक राष्ट्र के पास प्राकृतिक संसाधनों का भंडार होता है उनका उचित दोहन उस देश की श्रम शक्ति पर निर्भर करता है स्वस्थ जनसंख्या देश को समृद्ध एवं खुशहाल बनाने में अपना सहयोग प्रदान करती है नई विकास योजनाओं को जन्म देकर दुनिया के अन्य राष्ट्र के सामने एक मिसाल कायम कर सकती है किन्तु दूसरा पहलू यह है कि तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या राष्ट्र के आर्थिक सामाजिक पर्यावरण पर बुरा असर भी डालती है। आज भारत की जनसंख्या 2011 की जनगणनानुसार 1,2,1,0,1,93,422 करोड़ आंकलित की गई है तथा यह माना जा रहा है कि 2001-2011 के दौरान भारत की जनसंख्या में ब्राजील की जनसंख्या वाला देश होगा। तथा वर्ष 2030 में भारत विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश होगा। इस प्रकार भारत की जनसंख्या में होने वाली निरंतर वृद्धि चिंताजनक है, किन्तु सुखद पहलू यह भी है कि भारतीय जनसंख्या में 65 प्रतिशत् जनसंख्या युवाओं की है (अर्थात् 35 से 50 वर्ष की उम्र के लोगो की) जो देश के विकास में अपना सकारात्मक योगदान प्रदान कर सकते है।

 

भारत की लगभग आधी आबादी ऊर्जावान है और उनकी क्षमता का भरपूर उपयोग किया जा सकता है। गुणात्मक एवं प्रतिभा सम्पन्न युवाओं का यह वर्ग भारत को विश्व का सबसे बड़ा मानव संसाधन निर्यातक एवं रोजगार आयातक दोनों ही बना रहा है।

 

उपरोक्त तालिका अनुसार विश्व में तेजी से बढ़ती जनसंख्या का 7 अरब को छूना जनसंख्या वृद्धि एवं जन्मदर की वृद्धि को दर्शाता है। जन्मदर में वृद्धि संभावित मानवीय क्षमता में वृद्धि का द्योतक है।

 

भारत में जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर एवं दशक में परिवर्तन की स्थितिः-

भारत की जनसंख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है। यह वृद्धि चिंताजनक है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 1,21,01,93,422 करोड़ थी, जो अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राजील, पाकिस्तान व बांग्लादेश की कुल सम्मिलित जनसंख्या के बराबर है किंतु इस जनगणना का सुनहरा पक्ष यह है कि पिछले दशक (1991-2001) की तुलना में जनसंख्या की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई है वर्ष 1991-2001 में जहां भारत में जनसंख्या की वृद्धि दर 21.15 प्रतिशत थी वह वर्ष 2011 के दौरान घटकर मात्र 17.64 प्रतिशत रह गई है। भारत में जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर को विभिन्न जनगणनानुसार निम्न तालिका द्वारा व्यक्त किया गया है।

सारणी व दण्ड चित्र के अवलोकन के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि भारतीय जनांकिकीय इतिहास को तीन कालों में विभाजित किया जा सकता है:-

(1) स्थायी जनसंख्याकाल।

(2) धीमी गति से अनवरत् बढ़ने वाली जनसंख्या का काल।

(3) विस्फोट गति से बढ़ने वाली जनसंख्या का काल।

 

1. वर्ष 1891 से 1921 की प्रथम अवस्था में भारत की जनसंख्या लगभग स्थिर थी।

2. वर्ष 1921 से भारतीय जनसंख्या में वृद्धि एक महत्वपूर्ण विभाजक है, क्योंकि 1921 के बाढ के काल से भारत की जनसंख्या में अनवरत् वृद्धि जारी है।

3. वर्ष 1921 से 1951 के बीच भारत की जनसंख्या में वृद्धि की दर अनवरत् धीमी या मध्यम रही है।

4. वर्ष 1951 के बाद (वर्ष 1961 1971) के दशक में भारतीय जनसंख्या में तीव्र वृद्धि दर रही। यह वृद्धि दर 24.8 प्रतिशत् रही है।

 

वर्ष 2001-2011 के दशक में भारत की जनसंख्या भले ही 18.70 करोड़ की दर से बढ़कर 121 करोड़ तक पहुंच गई हो, लेकिन नौ दशक में पहली बार देश की जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई है।

 

भारत में साक्षरता -

जनसंख्या के संबंध में जिन आधारों पर सूचना एकत्रित की जाती है उसमें साक्षरता सबसे महत्वपूर्ण है। किसी भी देश में वहां की कुशल एवं साक्षर मानवीय शक्ति अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करती है। साक्षरता एवं देश के सामाजिक आर्थिक विकास में धनात्मक सह सम्बंध पाया जाता है। साक्षरता की दृष्टि से भारत की स्थिति अभी भी अत्याधिक संतोष प्रद नहीं है। यद्यपि स्वतंत्रता के पश्चात् इस दिशा में व्यापक कार्यक्रम चलाये गये है। फिर भी यहां साक्षरता अनुपात विकासशीन देशों की अपेक्षा कम है 1901 से लगातार साक्षरता अनुपात में वृद्धि हो रही है। 1901 में कुल जनसंख्या था केवल 5.35 प्रतिशत भाग ही साक्षरता जो बढ़ते बढ़ते 2011 में 74.4 प्रतिशत हो गया है।

 

विभिन्न जनगणनाओं के आंकड़ो को देखने से स्पष्ट होता है कि भारत में महिला साक्षरता की दर में भी निरंतर वृद्धि हुई है तथा वर्ष 2011 की जनगणना में महिला साक्षरता की दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2011 में पुरूष साक्षरता का प्रतिशत 82.14 तथा महिला साक्षरता का प्रतिशत 65.46 हो गया है। स्वतंत्रता के बाद पहली जनगणना में कुल 18 प्रतिशत की साक्षरता की तुलना में 2011 में भारत की साक्षरता का प्रतिशत 74 तक जा पहुंचा है। पुरूषों की उपलब्धि 27 से 82 प्रतिशत तक रही।

 

भारत में महिला साक्षरताः- महिला साक्षरता का प्रतिशत 1951 में मात्र 8.86 प्रतिशत था जो वर्ष 2011 की जनगणना में बढ़कर 65.46 प्रतिशत पहुंच गया है आज प्रत्येक 3 में से 2 महिलायें साक्षर है। स्त्री-पुरूष साक्षरता अनुपात की यह खाई 1971 से कम होना शुरू हो गई थी। 2001 की तुलना में 2011 में पुरूष साक्षरता दर में 6 प्रतिशत् की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि महिला साक्षरता दर में 12 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जिसे निम्न मानचित्र द्वारा दर्शाया गया है।

साक्षरता दर एवं जनसंख्याकी दशकीय वृद्धि दरः-

साक्षरता व जनसंख्या वृद्धि का घनिष्ठ संबंध है। शिक्षा से सोचने समझने का दायरा बढ़ता है। शिक्षित स्त्रियाँ अपने परिवार के आकार को सीमित रखना चाहती है वह बच्चों के लालन -पालन में बार-बार नहीं फंसना चाहती। उनकी इस अनिच्छा का जन्मदर पर प्रभाव पड़ता है तथा परिवार नियोजन के साधनों को अपनाने में मदद मिलती है। अतः भारत के उन राज्यों में जिनमें साक्षरता का प्रतिशत अधिक है जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर में कमी देखी गई है। विशेष रूप से सर्वाधिक महिला साक्षरता वाले राज्यों में जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर कम देखी गई है। केरल राज्य इसका सबसे श्रेष्ठ उदाहरण है। वहां स्त्री साक्षरता का प्रतिशत अधिक होने से जन्म दर में भी कमी देखी गई है।

 

भारत में स्त्री साक्षरता दर केरल में सबसे अधिक 91.98 प्रतिशत है, गोवा में 63.15 प्रतिशत व त्रिपुरा 83.15 प्रतिशत है। इन राज्यों में जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर 4.26, 8.17 14.75 है। इसके विपरीत सबसे कम महिला साक्षरता वाले राज्यों में राजस्थान में साक्षरता का 52.66 प्रतिशत, बिहार मंे 55.33 प्रतिशत, झारखंड 56.21 प्रतिशत व जम्मू कश्मीर 58.01 प्रतिशत है। इन राज्य में जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर अधिक देखी गई है।

 

अतः स्पष्ट है कि साक्षरता की कमी के कारण निरक्षर लोग परिवार कल्याण जैसे सामाजिक दायित्व के प्रति सचेत नहीं होते। खासकर स्त्रियों की शिक्षा/साक्षरता उन्हें छोटे परिवार के प्रति जागरूक बनाती है। वे विवाह भी जल्दी में नहीं करना चाहती है तथा परिवार को नियोजित करने हेतु सचेत रहती है। यही कारण है कि केरल जैसे शिक्षित राज्य में महिलायें केवल मात्र 2 बच्चों को ही जन्म देना चाहती है, जबकि पिछड़े राज्यों में, जैसे बिहार जैसे कम साक्षरता वाले राज्य में महिलायें 4 या अधिक बच्चों को जनम देती है। अतः साक्षरता का जन्म दर से सीधा संबंध है। तमाम जनजातियों व अनुसूचित जातियों में साक्षरता का जन्म दर से सीधा संबंध है। तमाम जनजातियों व अनुसूचित जातियों में साक्षरता का प्रतिशत कम होने से उनके परिवार का आकार बड़ा देखने को मिलता है।

 

उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि भारत में जिन राज्यों में शिक्षा का प्रतिशत अधिक है वहाँ पर जनसंख्या की प्रति वर्ष की प्रजनन दर में कमी देखी गई हैं जैसे केरल, गोवा, त्रिपुरा राज्यों में प्रजनन दर में वर्ष 2010 की तुलना में वर्ष 2013 में और भी कमी आई है। साथ ही राजस्थान, झारखंड व उत्तर प्रदेश राज्यों की जनसंख्या की प्रजनन दर में भी कमी आई है। इसका कारण यह है कि भारत में 12 वीं पंचवर्षीय योजना में प्रजनन एवं प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के एक व्यापक ढांचे के तहत् परिवार कल्याण कार्यक्रम के प्रतिस्थापन, विवाह एवं मातृत्व की उम्र बढ़ाकर बच्चों के जन्म में अन्तर का असर 2011 की जनगणना में परिलक्षित हुआ। वर्ष 1911-1921 के अपवाद को छोड़कर भारत में जनगणना के इतिहास में 2001-2011 का दशक वह पहला दशक है जब 10 साल की अवधि में जनसंख्या में निर्वाध वृद्धि पिछले दशक से कम रही है।

 

बिहार, राजस्थान झारखंड, उत्तर प्रदेश की जनसंख्या वृद्धि दर में प्रर्याप्त कमी आई है। इसके पूर्व इन राज्यों में प्रजनन दर ऊॅंची रही है। इन राज्यों में 20 से 24 वर्ष के समूह की महिलाओं की शादी 18 वर्ष की उम्र में हो गई। इन महिलाओं का प्रतिशत 47.4 है। बिहार में यह प्रतिशत 69 है व झारखंड में 63.3 प्रतिशत है। इस प्रकार परिवार कल्याण कार्यक्रम एवं प्रजनन क्षमता का सीधा संबंध है।

 

जनसंख्या वृद्धि के दुष्प्रभावः-

भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्या के सामाजिक, आर्थिक व पर्यावरणीय प्रभावों को जानना भी बहुत जरूरी है। भारत में तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या ने भारत की जनता के लिये संसाधनों की पूर्ति व प्रबंध की भी बहुत बड़ी चुनौती पैदा की है।

 

जनसंख्या वृद्धि ने अनेकानेक आर्थिक व सामाजिक समस्याओं को जन्म दिया है। देश से गरीबी हटाने की तमाम योजनायें जनसंख्या वृद्धि के सामने बौनी साबित हुई है विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार देश की 42 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है। बढ़ती जनसंख्या ने बेरोजगारी की गंभीर समस्या उत्पन्न की है जिसके परिणाम 7.8 प्रतिशत बेरोजगारी दर के रूप मंे सामने है साथ ही बढ़ती जनसंख्या के कारण उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का तीव्र दोहन हुआ है, भूमि की उर्वराशक्ति, खनिज सम्पदा, भूमिगतजल ऐसे संसाधन है जिसकी भरपाई मुश्किल है। कृषि जोत का सिमटता आकार हमारे उत्पादन को प्रभावित कर रहा है। जिससे खाद्यान्न संकट की स्थिति पैदा हुई है सन् 1980 -81 में जहां प्रतिव्यक्ति कृषि जोत 0.27 हेक्टेयर थी वही सन् 2004-2005 तक घटकर 0.17 हेक्टेयर हो गई तथा प्रतिव्यक्ति अनाज की उपलब्धता में कमी आई है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या विभाग व खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 1950 में विश्व की आबादी 2 अरब 54 करोड़ थी । तब खाद्यान्न उपलब्ध का 63 करोड़ 10 लाख थी प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता 348 कि.ग्रा. प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष थी। लेकिन 1990 के बाद विश्व की कुल खाद्यान्न उपलब्धता 334 कि.ग्रा. प्रतिव्यक्ति रह गई । जिसका परिणाम यह है कि बड़ी संख्या में लोग कुपोषण का शिकार हुये है भारत में भूख व कुपोषण से प्रभावित लोगों की संख्या विश्व में सर्वाधिक 23 करोड़ 30 लाख है।

 

एक रिपोर्ट के अनुसार 2007 में विश्व का कुल खाद्यान्न उत्पादन बढ़ा है लेकिन विश्व की आबादी 6 अरब 60 करोड़ हो जाने के कारण प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता महज 314 कि.ग्रा. रह गई है। जनघनत्व की दृष्टि से देखा जाये तो वर्ष 2005 में जनसंख्या घनत्व 34 व्यक्ति प्रतिवर्ग कि.मी. था जो 2025 में 440 हो जाएगा। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के सर्वे के अनुसार देश की दो तिहाई शहरी आबादी को 2030 तक शुद्ध पेयजल प्राप्त न हो सकेगा। वर्तमान में पानी की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1525 घनमीटर है वहीं 2030 में यह उपलब्धता मात्र 1060 घनमीटर रह जाएगी।

 

जंगलों को विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये काटा जा रहा है जिससे करीब एक प्रतिशत क्षेत्रफल हर वर्ष रेगिस्तान में तब्दील हो रहा है। इस प्रकार जनसंख्या का बढ़ता दबाव आर्थिक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से देश को गहरी क्षति पहुंचा रहा है।

 

सुझाव:-

1. भारत वह पहला देश है जिसने जनसंख्या नियंत्रण की नीति अपनाई है। अतः जनसंख्या नियंत्रण हेतु कठोर व प्रभावी कदम सरकार द्वारा उठाये जाने चाहिये तथा चीन (1979) की तरह भारत में भी एक संतान की नीति को अपनाया जाना चाहिये।

 

2. शिक्षा जो विकास की कुंजी है, वह महज मात्रात्मक एवं संख्या का सूचक मात्र न रह जाये बल्कि गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा का विकास होना चाहिए तथा महिला साक्षरता की दर में वृद्धि हेतु और प्रभावी कदम उठाये जाने चाहिये।

 

3. महिलाओं को आर्थिक दृष्टि से अधिकार संपन्न बनाया जाना चाहिये।

 

4. परिवार कल्याण कार्यक्रमों को अपनाने हेतु प्रभावी कदम उठाये जाने चाहिये तथा ऐसे कार्यक्रमों व नीतियों का निर्माण करना चाहिये जो लोगों को सीमित परिवार रखने के लिये प्रोत्साहित कर सकें।

 

5. विद्यार्थी जीवन में जनसंख्या शिक्षा अनिवार्य की जानी चाहिये ताकि विद्यार्थी यह समझ सके कि परिवार का आकार छोटा होना चाहिये। परिवार का आकार छोटा होगा, जनसंख्या कम होगी तो प्रत्येक व्यकित को अपने जीवन स्तर को बनाये रखने में सहायता मिलेगी।

 

6. समय-समय पर जनसंख्या शिक्षा व जागरूकता हेतु संगोष्ठीयों व सभाओं का आयोजन किया जाना चाहिये तथा बढ़ती जनसंख्या के परिवार, समाज व राष्ट्र पर पड़ने वाले प्रभाव की व्याख्या की जानी चाहिये।

 

7. परिवार कल्याण कार्यक्रमों का समय-समय पर प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिये तथा इनके उपयोग हेतु जन मानस को तैयार किया जाना चाहिए।

 

8. जनसंख्या के दुश्चक्र को तोड़ने में महिलाओं की अहम् भूमिका को स्वीकार जाना चाहिये। विकासशील देशों में महिलाओं को जितनी मदद मिल रही है उससे कहीं ज्यादा मदद की जाए ताकि जिन प्राकृतिक संसाधनों पर वे निर्भर है उनका वे संरक्षण कर सकें और अपने स्वास्थ्य व शिक्षा में सुधार ला सकें जो उनकों छोटे और अधिक स्वस्थ्य परिवारों के लिये प्रेरित् करे।

 

रिपोर्ट से स्पष्ट है कि भारत के केरल और श्रीलंका के कुछ भागों में ऐेसे समुदायों ने उिन्हें बेहतर प्रौद्योगिकी स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा सुलभ है, संसाधनो का संरक्षण करने और सक्षम ग्रामीण समाज का निर्माण करने के लिये इन साधनों का अच्छा प्रयोग किया है। इन समुदायों की विशेषता है स्त्री-पुरूष असमानता में कमी, बिलंवित विवाह, निम्न प्रजनन दर और कम आय के बावजूद जनसंख्या वृद्धि की कम रफ्तार देखी गई है।

 

9. ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिये।

 

10. जितने मुँह उतने हाथ वाले जन-मानस को बदलना होगा तथा लोगों में नई सोच का विकास करना होगा।

11. 2010 तक देश में लगभग 20 हजार स्वास्थ्य उपकेन्द्रों की कमी ग्रामीण क्षेत्रों मे ंदेखी गई साथ ही प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 2433 केन्द्रों पर चिकित्सकों का अभाव पाया गया। इन केन्द्रों पर 25 प्रतिशत् नर्स एवं सहायकों की आवश्यकता है। अतः इन कमियों को दूर करके ही जनसंख्या नियंत्रण को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।

 

निष्कर्षः-

भारत में विगत दशकों की तुलना में साक्षरता स्तर में वृद्धि हुई है। भारत देश में साक्षरता का प्रतिशत उन राज्यों में अधिक है जहा औद्योगीकरण एवं नगरीकरण में तीव्र वृद्धि हुई है। मध्यम जनसंख्या साक्षरता का प्रतिशत भारत के उन राज्यों में है जहां औद्योगीकरण की ओर रूझान बढ़ाया है। जिससे शिक्षा के प्रति रूची उत्पन्न हुई तथा साक्षरता को प्रोत्साहन मिला देश में निम्न साक्षरता का क्षेत्र आदिवासी जनजातियों के निवास स्थल है जो आदमी शब्द का से परे वनाचंल क्षेत्र है वहां विद्यालयों की कमी है। देश के कुछ राज्यों में नक्सलवाद भी समस्या है जिससे साक्षरता प्रभावित हुई है फिर भी देश में साक्षरता दर में वृद्धि से ही कुशल जनशक्ति के निर्माण हेतु शिक्षण एवं प्रशिक्षण कार्यशालाओं एवं संस्थाओं का विकास हो रहा है जिससे नागरिकों में साक्षरता जागरूकता की भावना का संचार हो रहा है।

 

संदर्भ सूचीः-

1. देवेन्द्र उपाध्याय,: जनसंख्या विस्फोट सं. - कल्याणी शिक्षा परिषद् दरियागंज नई दिल्ली - 110002

2. डी.एस. बघेल, जनांकिकीय- विवेक प्रकाशन, जवाहर नगर, दिल्ली, 110007

3. सम - सामयिकी वार्षिकी - 2012 अहरिअंत मीडिया प्रोमोटर्स,कांलिदी, टी.पी. नगर मेरठ 250002

4. योजना - 2011 भारत की जनगणना, 538 योजना भवन, संसद मार्ग, नई दिल्ली 110001

5. रोजगार और निर्माण भोपाल दिनांक 08.07.2013 से 14.07.2013

1-       Indian States Ranking by Fertitlity Rate - Wikipedia the Free Encyclopedia

 

Received on 25.06.2014

Revised on 22.07.2014

Accepted on 05.08.2014

A&V Publication all right reserved

Research J. Humanities and Social Sciences. 5(3): July-September, 2014, 336-342