सूर्यबाला की कहानियों में निम्नवर्ग का यथार्थ चित्रण

 

श्रीमती कुमुदिनी घृतलहरे] मधुलता बारा

शोध-छात्रा, साहित्य एवं भाषा अध्ययनशाला पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ

वरि. सहा. प्राध्यापक, साहित्य एवं भाषा अध्ययनशाला पं. रविषंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ

सार

विश्व का कोना-कोना सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित है, अमीर-गरीब के बीच भेदभाव करना उसे आता ही नहीं, उसे तो बस जीवन में उजियारा फैलाना है। सूर्यबाला अर्थात् सूर्यपुत्री की क़लम ने भी उच्च वर्ग से निम्न वर्ग तक अपनी संवेदना पहुँचाई है। गाँव से नगर, महानगर होते हुए विदेशी धरा तक को अपनी कहानियों में पिरोया है। वे जीवन-मूल्यों को विशेष महत्व देती हैं, इसलिए उनकी कहानियों के पात्र दुःख, अभाव, भय के बीच जीते हुए भी साहस के साथ उनका सामना करते हुए जीवन में सुकुन की तलाश कर ही लेते हैं। विद्रोह की भावना कहीं नहीं है।

 

प्रस्तावना

हिंदी कथा-लेखन में महिला कथाकारों ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है। कहानीकार, उपन्यासकार, व्यंग्यकार के रूप में सूर्यबाला विशिष्ट और अलग अंदाज के साथ उपस्थित हैं। वे जीवन, समाज, परंपरा एवं उनसे जुड़ी समस्याओं को अपनी मुक्त दृष्टि से देखने का प्रयास करती हैं। किसी आंदोलन में शामिल न होकर अपना मार्ग स्वयं बनाती हुईं चुपचाप सृजन-प्रक्रिया में लीन हैं। उनकी कहानियाँ कल्पना की धरातल पर नहीं वरन् अनुभव की ठोस धरातल पर खड़ी हैं, जहाँ जीवन के प्रत्येक स्पंदन को महसूसा जा सकता है। रोजमर्रा की सामान्य सी ज़िंदगी से भी सामाजिक विडंबना व त्रासदी को सूर्यबाला की सूक्ष्म व पारखी नज़रें ढूँढ़ निकालती हैं। सारिका में अक्टूबर 1972 में छपी पहली कहानी से अब तक प्रकाशित तेरह कहानी-संग्रह, पाँच उपन्यास, चार व्यंग्य-संग्रह एवं बालकथा ने उनके साहित्य-लेखन को समृद्ध किया है। किसी विमर्श के फेर में नहीं पड़ने वाली सूर्यबाला की कहानियों में रिश्तों की आत्मीयता महसूस होती है।

 

कहानियों में निम्नवर्ग की यथार्थता

मध्यमवर्गीय परिवेश से होने के नाते सूर्यबाला की कहानियाँ मध्यम वर्ग की प्रतिनिधित्व करती हैं, किंतु उन्होंने निम्नवर्गीय जीवन-शैली को भी गहराई से महसूस किया है। वे निम्नवर्गीय पात्रों के साथ बौद्धिकता मात्र से नहीं बल्कि पूरे मार्मिकता के साथ जुड़ी हुई हैं। इसलिए इनके जीवन की यथार्थता को गहरी संवेदना के साथ अभिव्यक्त किया है।

 

रहमदिल कहानी का निम्नवर्गीय पात्र रहमत अली इतना रहमदिल है कि स्टेशन में टी.सी. और पुलिस वालों के शोषण का शिकार होकर भी वह इस बात से अनजान है और स्वयं निर्दोष होते हुए भी वह भ्रष्ट पुलिस वालों के उपकार तले दबा होकर सुकून की साँस लेता है- अल्लाताला की बड़ी मेहरबानी..... कि बेदाग़ बच आया, नहीं तो फँसा बड़ी बुरी तरह था कानून के शिकंजे में.... वो तो पुलिसवाला रहमदिल निकला, जो छुड़वा दिया बेचारे ने, अल्ला भला करे उसका....।1

 

 

ऊँचे-पूरे कद की, मर्द की तरह डील-डौल वाली महिला पर केंद्रित कहानी आदमकद में लेखिका ने नारी की कर्मठता, सहृदयता, सहनशीलता एवं ममतामयी रूप का चित्रण किया है। रिश्तेदारों के आसरे पर पलने वाला नकारा आदमी पति के रूप में मिला, इसलिए औरत ही घर का बोझ, मजदूरी करके उठाती है। कड़ी मेहनत से संवारे गए घर को नशेड़ी पति बर्बाद कर देता है, पर वह हिम्मत नहीं हारती और बच्चे की अच्छे भविष्य हेतु फिर से जीवन का नए सिरे से शुरुवात करने का ज़ज़्बा रखती है।

 

चिथड़ों में लिपटे नौकर को देख लोग हमें क्या कहेंगे, इसलिए काम पर आए बालक चंदू को नए कपड़े सिला कर दिए गए, सख्त हिदायत के साथ कि काम पर आओ तो इसे ही पहनो। एहसान करने के गर्व से फूली मेमसाहब को सूर्यबाला ज़मीन पर पटक देती हैं। जब उसे पता चलता है कि जिन फटे कपड़ों में चंदू को आने से मना किया था, वो कपड़े भी उसने दूसरे से उधार लिए थे, काम पर आने के लिए। इस कहानी से स्पष्ट है कि गरीब बच्चे भी पढ़ाई की चिंता करते हैं, तभी तो फीस के पैसे जुटाने हेतु चंदू छुट्टी के दिनों में घरेलू काम पर लग गया। घर का खर्च भी उसके जुटाए पैसों से चलता है- जी, मैं तीन दिन और काम करूँ ?...... क्यों ? स्कूल खुलेगा न ? .....सोमवार से इखट्टे चला जाऊँगा।.... पिछली फीस बकाया है, इम्तहानी फीस भी जमा नहीं होगी तो नाम कट जाएगा।2 लेखिका ने निम्न वर्ग की मजबूरी व मेहनत का यथार्थ चित्र खींचा है।

 

वयोवृद्ध कव्वाली उस्ताद के जर्जर व्यथा की कथा है एक इंद्रधनुष जुबेदा के नाम। बेटी जुबेदा के आने की खबर से वह बेटी, दामाद व नातिन के लिए कपड़े व अन्य जरूरी सामान लाने हेतु पैसों के जुगाड़ में लग जाता है। आसमान के इंद्रधनुष के समान उसके मन में भी सतरंगी आशाएँ उभर चुकी हैं। उधार के कपड़े पहनकर वह अपने शागिर्द जो आज मशहूर कव्वाल है, के मजलिसों में जाकर पीछे की पंक्ति में बैठ कर उसका भरपूर साथ देता है। दोबारा पुराने उस्ताद को वाहवाही मिलते देख आज का उस्ताद ईष्र्या व भावी खतरे को भांप कर वृद्ध उस्ताद को भविष्य में किसी भी कार्यक्रम में आने से मना करवा देता है- ..... आप तकलीफ न करें। बुढ़ापे में दम-वम उखड़ जाएगा..... आराम की जरूरत है आपको.....।3 आसमान से लुप्त होते इंद्रधनुष की तरह उसके मन की आशाएँ भी सपाट व उदास हो गईं। इस प्रकार लेखिका ने पिता की तंगहाली से उपजे दर्द व विवशता का जीवंत चित्रण किया है।

 

अत्यंत दीन-हीन दशा में भी सहजतापूर्वक जी रही सुमितरा की बेटियाँ पिता के दूसरे विवाह के विरोध स्वरूप दुल्हा-दुल्हन की जाती गाड़ी के पीछे में मुट्ठी भर रेत फेंक कर अपने जीवित पिता के लिए खेल-खेल में मिट्टी से कब्र का प्रतीक बना कर बहुत खुश हैं- ढ़ोढ़े मर गया, उठी लहासा।4 मानो वे अपने अतीत को गाड़ कर जीवन की नई शुरुवात के लिए तैयार हैं।

 

नीली थैली वाला पैराशूट बड़े घर की नखरीली तान्या बेबी की कहानी है। आलीशान घर व मँहगे विदेशी खिलौनों के बीच घिरी तान्या बेबी एक गरीब चार साल के बच्चे द्वारा उड़ाई जा रही प्लास्टिक थैले को ललचाई दृष्टि से देख उसे पाने की ज़िद करती है और प्राप्त होने पर उसे पैरों तले रौंदकर गर्व का अनुभव करती है, किंतु वह गरीब बालक प्रतिकार स्वरूप रेत का बवंडर उड़ाकर भाग गया। कौशल्याबाई जो अपने घर में ज्वर से पीड़ित नातिन को अकेला छोड़ तान्या बेबी की खिदमत कर रही है, को भी सुकुन दिला गया। वह छोटी मेमसाहब यानी तान्या बेबी के नखरों से काफी परेशान है। अपनी बढ़ती उम्र से वह भयग्रस्त है, क्योंकि आजकल अंग्रेजी बोलने वाली युवतियाँ आया के रूप में सहजता से उपलब्ध हैं, इसलिए वह भी सही-गलत जैसा भी हो अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करने लगी। सूर्यबाला ने उच्चवर्गीय मानसिकता को उद्घाटित किया है कि उन्हें जो चीज़ पसंद आ गई उसे प्राप्त करके ही दम लेते हैं, खासकर कमज़ोर वर्ग को रौंदने में वे गर्व अनुभव करते हैं।

 

दीवाली उत्सव न होकर अब सामथ्र्य प्रदर्शन का माध्यम बन गया है। अपनी हैसियत का दंभ भरने वाले अमीर वर्ग शान-ओ-शौकत को ही लक्ष्मी-पूजन मानता है। इस कहानी में इस बार कीमती उपहार न मिलने पर भौतिक सुविधाओं से संपन्न पति-पत्नी तनावग्रस्त हैं, उनकी दीवाली बिगड़ गई। दूसरी तरफ उनकी नौकरानी जिसका पति मर चुका है, उसे चाँदी के देवता से कोई लेना-देना नहीं है। वह अपने बेटे के साथ अनार फोड़ कर उत्सव मना रही है, ....एक अँधेरी सी झोपड़ी के सामने सुनहरे, हरे और सफ़ेद बूटोंवाला छोटा सा अनार छूट रहा था और उसमें घुली सी दो मुक्त-मगन खिलखिलाहटें।5 दोनों वर्गों को आमने-सामने लाकर लेखिका ने रेखांकित किया कि जीवन का असली सुख उन गरीब लोगों को प्राप्त है, जो आडंबर रहित सहज भाव से जीवन जीते हैं। जो मिला उसे सहर्ष स्वीकारा व खुश रहे, जो नहीं मिला उसका मलाल नहीं।

 

भुख्खड़ की औलाद गरीबी और विवशता की कहानी है। बैजनाथ जैसे असंख्य मजदूर महानगर में काम करके भी रिते-के-रिते रह जाते हैं। कुछ कर गुजरने की चाह महानगर तक पहुँचा तो देती है, लेकिन अपना घर-परिवार, खेत-खलिहान की यादें पीछा नहीं छोड़ती। मेहनत से जो भी कमाया उसे गाँव जाकर खर्च दिया, उसके टीन के बक्से में कुछ भी न था। सिर्फ मक्की के दानों की एक गंदी सी पोटली थी....।6 यह दरिद्रता मेहनत करने पर भी पीछा नहीं छोड़ती, क्योंकि आमदनी कम और आवश्यकता ज़्यादा है।

 

महानगर घुमाने के नाम पर गाँव से लाए गए बाल-श्रमिक की कथा है मटियाला तीतर। समय के साथ देबू की तेज बुद्धि गृहस्वामिनी की मंशा समझ चुकी थी। गाँव का स्वतंत्र, उन्मुक्त जीवन, माँ, बहन का आकर्षण उसे खींच रही थी। देवा की घुमंतू प्रवृिा व बढ़ते गलत कार्यों की वजह से माँ ने मन मारकर बंबई भेजा था, बड़ी मुश्किल से पटाया इसकी माँ को..... गरीब होने पर भी औलाद को आँखों की ओट करने को तैयार नहीं हो रही थी, इसकी माँ।7 लेकिन महानगर में देवा को बहला-फुसलाकर कितने दिनों तक क़ैद रखा जा सकता था। एक दिन अवसर देखकर वह घर से उड़ गया मटियाला तीतर की तरह, जीवन के इस महासमर में जूझने के लिए, परतंत्रता व छल उसे पसंद नहीं था।

 

बिहिश्त बनाम मौजीराम की झाड़ू कहानी मौजीराम की है, जो विशालकाय रहवासी काॅम्प्लेक्स में मँहगी कारें और उसमें उतरते-चढ़ते साहब-मेमसाहब के बीच झाड़ू लगाते हुए खुद को धन्य समझता है। ऊँची नस्ल के कु, यूनिफार्म में सजे नौकर, गवर्नेस, यह सब उसे चमत्कृत कर देती है, उसे लगता है कि यदि कहीं स्वर्ग है तो यहीं और वह खुश व संतुष्ट है। अमीरों की मानवीय असंतुष्टि, अतृप्त भावना (कथा-नायिका) ने उन्हें तनावग्रस्त बना दिया है, वहीं निम्नवर्गीय पात्र अपनी हैसियत को समझता है और वो उसी में संतोषप्रद, खुशहाल है।

 

अन्य कहानियाँ सुखांतकी मेें भूख के आगे विवश आदमी का पत्नी का क्रिया-कर्म करके आने पर सहज भाव से माँग कर भोजन करना परिस्थिति की विवशता को उजागर करती है। सिंड्रेला का सपना, सुनंदा छोकरी की डायरी, अंतरंग बालश्रमिक बालिकाओं पर आधारित कहानियाँ हैं। काग़ज़ की नावें चाँदी के बाल, मातम कहानी में भी निम्नवर्गीय पात्रों की यथार्थ, सहज, सरल, संवेदनशील भावनाओं का चित्रण है।

 

निष्कर्ष

अंततः हम देखते हैं कि कथा-सृजन को सिर्फ नारेबाजी न मानने वाली सूर्यबाला अपनी गहन अंतर्दृष्टि से कहानियों में निम्नवर्गीय पात्रों की यथार्थ स्थिति को बड़े ही मार्मिकता के साथ अभिव्यक्त करती हैं। उच्चवर्ग के सामने निम्नवर्गीय पात्रों को लाकर उनके संतोषप्रद जीवन का चित्रण किया है, जो गरीबी और विवशता का साहस के साथ सामना करते हुए जीवन-यापन करते हैं। उनकी कहानियों में दुख, संत्रास हम जिसे जानते हैं उसकी पुनर्परिभाषा नहीं होती, अपितु बिल्कुल नए ढंग से उद्घाटित होती है।

 

 

सदर्भ-ग्रंथ

1. सूर्यबाला. 21 श्रेष्ठ कहानियाँ. नई दिल्ली: डायमंड पाॅकेट बुक्स (प्रा.) लि., सं. 2009, पृ. 33.

2. वही. गौरा गुनवन्ती. नई दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ, दूसरा संस्करण 2011, पृ. 26.

3. वही. एक इंद्रधनुष जुबेदा के नाम. नई दिल्ली: विद्या विहार, सं. 2008, पृ. 128.

4. वही, 21 श्रेष्ठ कहानियाँ. पृ. 171.

5. वही. कात्यायनी संवाद. नई दिल्ली: ग्रंथ अकादमी, सं. 2011, पृ. 69.

6. वही. पाँच लंबी कहानियाँ. वही, पृ. 53.

7. वही, पृ. 84.

 

 

Received on 17.07.2014

Revised on 20.08.2014

Accepted on 11.09.2014

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Research J. Humanities and Social Sciences. 5(3): July-September, 2014, 283-285