प्रवासी आदिवासी महिलाओं की समस्याएं एवं समाधान

(जिला-जांजगीर चाम्पा के संबंध में)

Dr. (Smt.) Vrinda Sengupta1, Dr. K.P. Kurrey1

1Asistant Professor (Sociology), Govt T.C.L..P.G. College, Janjgir

 

 

सारांश

भारत एक विकासशील देश है देश के सर्वागींण विकास के लिए जन जातियों जिनकी हमारे देश में बरहुल्यता है, जिनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय है, के विकास पर ध्यान देना जाना चाहिए। भारत में लगभग 300 (तीन सौ) प्रकार की जनजातियां पाई जाती है, जिनमें भील, गोड़, संथाल आदि प्रमुख जन जाती हैं। जिनकी जन संख्या 40 लाख से भी अधिक है। 1991 की जनगणना के आधार पर भारत में अनुमानतः 6.78 करोड़ आदिवासी निवास करते हैं। जीवन-यापन अधिक व्यवस्थित रुप मे करने के लिए व्यवसाय की खोज में आदिवासी व्यक्तिगत या सामूहिक रुप में अपनी मूल स्थान से किसी दूसरे स्थान पर प्रवास की, जन संख्या में परिवर्तन का तीसरा कारक कहा गया है । प्रथम दो कारक जन्म और मृत्यु दर है। आदिवासी समुदायों का अपनी जमीन व मूल निवास स्थान से गहरा भावनात्मक संबंध रहता है। इसलिए जनजाति प्रवास सामान्य परिस्थितियों में नहीं होता। जनजातिय प्रवास के दो पहलू हो सकता है।

(1) वे पहलू जो आदिवासी समूह को बाहर की ओर धकेलते हैं, जैसे सामाजिक, आर्थिक शोषण, भुखमरी, बिमारी, बाढ़ व सूखे जैसी प्राकृतिक विपदाओं आदि।

(2) वे पहलू जो आदिवासी समूह को अपनी ओर खींचते हैं जैसे रोजगार के बेहतर अवसर व अधिक मजदूरी जिनके कारण बहुत सी जनजाति प्रवासी बन जाते हैं।

 

शब्द कुंजी प्रवास, नगर, अशिक्षा, रोजगार ।

 

प्रस्तावना

आदिवासी के जीवन में प्रवास बहुत महत्वपूर्ण घटना है आदिवासी वर्ग का सारा जीवन प्रवास में बीत जाता है जिससे उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति कमजोर होती जाती है, उनका व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन बहुत स्थिर हो जाता है कटोर परिश्रम और पौस्टिक भोजन के अभाव में उनका स्वास्थ्य गिर जाता है, जिससे वे अनेक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। इसके कारण उनकी कार्य क्षमता में कमी आ जाती है, उनके बच्चे स्कूल नहीं जा पाते है और प्रायः अशिक्षित रह जाते है, इसी कमी को वे अज्ञानतावश समझ नहीं पाते हैं।

 

समस्याः-

प्रवास में सबसे अधिक कष्ट महिलाओं को होता है, गर्भावस्था में भी वे अपने घर से दूर जाकर मजदूरी करती है, जिससे उनकी देखभाल नहीं होती है, प्रसव कहां होगा, यह भी निश्चित नहीं होता है । जिससे उन्हें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उचित देखभाल और पौष्टिक भोजन के अभाव में वे एनीमिया, कुपोषण जैसी भयंकर बीमारियों का शिकार हो जाती है।

 

प्रवास के कारणः-

प्रवास का सबसे प्रमुख कारण आर्थिक होता है, प्रवास को प्रोत्साहित करने वाले आर्थिक कारण इस प्रकार है- काम का अभाव, औद्योगिकीकरण, आर्थिक स्थिति में सुधार, जोतों का अधिकार छोटा होना एवं कृषि स्त्रोतों की कमी आदि। आदिवासी क्षेत्रों में किसी प्राकृतिक प्रकोप बाढ़, सूखा, भूकम्प, किसी बीमारी का प्रकोप आदि कारणों से उन्हें प्रवास की आवश्यकता होती है।

 

प्रवास के प्रकारः-

(1) स्थाई प्रवास:- स्थाई प्रवास वह कहलाता है, जिसमें व्यक्ति पूरी तरह गांव छोड़कर शहरों में निवास करने लगता है।

(2) दैनिक प्रवासः- यह प्रवास गांवों से नगरों की ओर प्रतिदिन होता है।

(3) मौसमी प्रवासः- यह प्रवास अस्थाई रुप से होता है, यानि कृषि कार्य के अतिरिक्त समय में ये लोग शहरों में आकर मजदूरी करती है एवं फसल काटने एवं बोने के समय वापस चले जाते हैं। इसलिए इसे मौसमी प्रवास कहते है।

 

प्रवास के लाभः-

प्रवास से आर्थिक लाभ, भूमि पर जनसंख्या के भार में कमी, स्वास्थ्य की दृष्टि से हितकर, नगरीकरण के लाभ आदि होते हैं।

 

 

 

प्रवास की समस्याएॅः-

प्रवास से कार्यक्षमता में ह्ास, श्रम संघों के विकास में बाधा, प्रवास पश्चात् आवास की समस्या, नैतिक पतन एवं शिक्षा पर प्रभाव आदि।

 

अध्ययन के उद्देश्यः-

(1) प्रवासी आदिवासी महिलाओं के प्रवास के कारणों का पता लगाना।

(2) आदिवासी प्रवास के प्रकार एवं स्वरुप के कारणों का पता लगाना।

 

अध्ययन की आवश्यकताः-

प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में आदिवासी मजदूरी की तलाश में अपने ग्राम छोड़कर बाहर जाते हैं। शहर में आकर कहीं भी अपनी-अपनी बस्ती बनाकर रहने लगते हैं। जहां इन्हें गंदगी, कूड़ा-करकट एवं हानिकारक पििरस्थितियों में रहना पड़ता है, जिससें उन्हें अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

उपकारण एवं तकनीक:- प्रस्तुत शोधपत्र तैयार करने के लिए द्धैतीयक सामग्री संकलन के लिए पत्र-पत्रिकाओं एवं शा. प्रलेखों का अध्ययन किया गया है।

 

निष्कर्षः-

प्रवासी आदिवासी महिलाओं में प्रवास आर्थिक कारणों से होता है। 93ः परिवारों ने आर्थिक कारणांे से प्रवास किया हैं।

 

प्रवास से 0-11 वर्ष के बच्चे अधिक प्रभावित होते है।

 

प्रवासी महिलाओं को स्वास्थ्य के ऊपर दुष्प्रभाव स्पष्ट देखा जा गया है।

 

प्रवासी महिलाओं को मजदूरी के अलावा और कुछ भी नहीें दी जाती है।

 

प्रवास के दौरान आवास समस्या, गंदी बस्तियों की समस्या, पीने की पानी की समस्या, शिक्षा की समस्या, रोजगार की समस्या होने के बावजूद भी ये लोग प्रवास करते हैं और बेहतर जीवन है ऐसा बोलते है।

 

सुुझााव:-

उनमें स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता लाना।

 

आदिवासी क्षेत्रों में पानी की कमी के कारण एक फसल ही हो पाती है अगर सिंचाई के साधन हो, तो दो फसलें ले सकेंगे और प्रवास हतोत्साहित होगा।

 

प्रवासी आदिवासी क्षेत्रों में प्रवास करके आते हैं जहां वे कृषि करते हैं, कृषि की उन्नत तकनीक, बीज आदि के बारें में लोंगों को जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि वे पैदावार बढ़ा सके। और प्रवास को कम किया जा सके।

 

संदर्भ गृन्थ सूची

सक्सेना, आदसी: श्रम समस्याएं एवं श्रम कल्याण पुस्तक प्रकाशन, निकट कोतवाली, मेरठ 1987,

श्रीवास्तव, प्रदीप: भारत का जनजातीय जीवन , प्रियंका पब्लिकेशन, बिलासपुर 1999

 

Received on 28.05.2015

Modified on 22.06.2015

Accepted on 09.08.2015

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Research J. Humanities and Social Sciences. 6(3):July- September, 2015, 175-177